Saturday, 7 November 2026
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दीपावली पर पशुओं के सींगों पर सिंदूर, बड़कागांव में ऐसे मनाया जाता है सोहराय

INT News7 November 2026 at 09:19 pm

बड़कागांव: हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड के विभिन्न गांवों में दीपावली का पर्व सोहराय के रूप में भी मनाया जाता है. यह पर्व मनुष्य और पालतू पशुओं के बीच प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक है. इस दिन किसान अपने बैल, भैंस और अन्य पशुओं की पूजा-अर्चना करते हैं. उन्हें सात प्रकार के अनाज से बने पकवान खिलाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी गांवों में जीवंत है.

खेती में अहम भूमिका निभाने वाले पशुओं की होती है पूजा

बड़कागांव के अधिकांश किसान खेती-बारी पर निर्भर हैं. खेती के काम में बैल और भैंसों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यही वजह है कि सोहराय पर्व पर पशुओं को माता लक्ष्मी के समान मानकर उनकी पूजा की जाती है. किसान इस दिन बैल और भैंसों की पूजा कर परिवार में धन-संपत्ति और सुख-समृद्धि बढ़ने की कामना करते हैं.

दीपावली के दूसरे दिन शुरू होता है सोहराय पर्व

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी दीपावली के दूसरे दिन सोहराय पर्व मनाया जाता है. इसकी तैयारियां पहले से ही शुरू हो जाती हैं. किसान अपनी गौशालाओं की गोबर और मिट्टी से लिपाई-पुताई करते हैं. घरों को भी आकर्षक ढंग से सजाया जाता है.

आदिवासी समुदाय की महिलाएं घरों की दीवारों पर पशुओं के चित्र उकेरती हैं. सोहराय कला से सजे ये चित्र बेहद आकर्षक होते हैं. पर्व के दिन पशुओं को नहलाकर उनकी तेल मालिश की जाती है. उनके शरीर पर लाल रंग से गोलाकार आकृतियां बनायी जाती हैं. सींग और माथे पर सिंदूर का टीका लगाया जाता है. इसके बाद विधि-विधान से पूजा की जाती है.

सात अनाज के पकवान खिलाकर चरवाहों को भी करते हैं सम्मानित

सोहराय के दिन पशुओं को सात प्रकार के अनाज से बने दाने और पकवान खिलाये जाते हैं. वहीं, पशुओं की देखभाल करने वाले चरवाहे या गोरखिया को नये कपड़े देकर सम्मानित करने की भी परंपरा है. मान्यता है कि इस समय तक साल की पहली धान की फसल तैयार हो चुकी होती है. इसके बाद सोहराय मेले का आयोजन भी किया जाता है.

खेरा या पंखेवा खिलाने की है खास परंपरा

खैरातरी निवासी मुकेश कुमार बताते हैं कि दीपावली के साथ ही सोहराय पर्व की शुरुआत हो जाती है. महापर्व से करीब एक सप्ताह पहले से ही पालतू पशुओं के सींगों पर तेल लगाया जाता है. दीपावली के दूसरे दिन विधिवत सोहराय मनाया जाता है.

इस दिन गौशाला की लिपाई-पुताई कर विभिन्न रंगों से कोहबर चित्र बनाये जाते हैं. दुधी माटी से पारण किया जाता है, जिसे गौशाला से लेकर मचान तक बनाया जाता है. इसके बाद गाय, बैल और भैंसों को नहलाया-धुलाया जाता है. उनके सींगों पर दोबारा सरसों का तेल लगाकर सिंदूर लगाया जाता है.

इसके बाद मकई या अरवा चावल से खीर तैयार की जाती है. इसे खेरा या पंखेवा कहा जाता है. केले के पत्तों पर रखकर यह पकवान पशुओं को खिलाया जाता है.

इस्को की गुफाओं में आज भी मौजूद हैं सोहराय कला के नमूने

बड़कागांव और आसपास के क्षेत्रों में सोहराय पर्व तथा इससे जुड़ी कला की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. क्षेत्र की इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखने को मिलते हैं. बताया जाता है कि कर्णपुरा राजा और रामगढ़ राजा ने इस कला को काफी प्रोत्साहित किया था. उनके संरक्षण में यह कला गुफाओं की दीवारों से निकलकर लोगों के घरों की दीवारों तक पहुंची.

शादी-विवाह और त्योहारों पर आज भी महिलाएं बनाती हैं सोहराय चित्र

बड़कागांव की सोमरी देवी, पचली देवी, सारो देवी, पातो देवी और रुकमणी देवी आज भी शादी-विवाह और पर्व-त्योहारों के अवसर पर सोहराय कला बनाती हैं. इस कला के पीछे एक ऐतिहासिक परंपरा भी जुड़ी हुई है, जिसकी जानकारी आज भी बहुत कम लोगों को है.

महिलाओं के अनुसार, कर्णपुरा राज में जब किसी युवराज का विवाह होता था, तब नवविवाहित जोड़े के पहली बार मिलने वाले कमरे की दीवारों पर यादगार के तौर पर विशेष चिह्न बनाये जाते थे. इन चिह्नों को सफेद, लाल और काली मिट्टी के साथ गोबर से तैयार किया जाता था. इस कला में कुछ विशेष लिपियों का भी इस्तेमाल होता था, जिन्हें वृद्धि मंत्र कहा जाता था.