Friday, 6 November 2026
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बुलंदशहर के किसान का कमाल, बिना रासायनिक खाद के उगा रहे फसलें, अब दूसरे किसानों को भी दे रहे ट्रेनिंग

INT News6 November 2026 at 08:26 pm

UP News: उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक किसान ने साबित कर दिया है कि खेती में बड़ा बदलाव लाने के लिए महंगी मशीनों और रासायनिक खाद की नहीं, बल्कि हुनर, मेहनत और नई सोच की जरूरत होती है. बीबी नगर के निसुखा गांव निवासी संजीव शर्मा बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं. खास बात यह है कि आईटीआई से सीखे तकनीकी हुनर को उन्होंने खेती में उतारा और अपनी जरूरत के कई कृषि यंत्र खुद बना डाले. धान की रोपाई से लेकर बीजों की बुआई और गुड़ तैयार करने तक के लिए उन्होंने देसी तकनीक विकसित की है. अब संजीव खुद खेती में नए प्रयोग करने के साथ दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं.

आईटीआई की पढ़ाई को बनाया खेती का हथियार

संजीव शर्मा ने आईटीआई से फिटर ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है. इसी तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल उन्होंने खेती में किया. बाजार से महंगे उपकरण खरीदने के बजाय अपनी जरूरत के मुताबिक कई मशीनें और यंत्र तैयार किए. इनमें धान की रोपाई के लिए मार्कर, छोटे-बड़े बीजों की बुआई करने वाली मशीन, पौधे लगाने के लिए पौधा गन और निराई-गुड़ाई में इस्तेमाल होने वाली बीज गन शामिल हैं. इसके अलावा गुड़ बनाने के लिए सांचे और विशेष कढ़ाव भी उन्होंने खुद तैयार किए हैं. इन उपकरणों से खेती के काम में आसानी होने के साथ मजदूरी और मशीनों पर होने वाला खर्च भी कम हुआ है.

खुद के तैयार कढ़ाव में बनाते हैं अलग-अलग किस्म का गुड़

संजीव शर्मा ने गुड़ तैयार करने के लिए भी अपनी तकनीक विकसित की है. उनके बनाए कढ़ाव को तैयार करने की प्रक्रिया में धुली उड़द की दाल के आटे और गन्ने के रस का लेप लगाकर सुखाया जाता है. इसके बाद अरंडी का तेल लगाकर उसकी सिकाई की जाती है. इस प्रक्रिया से कढ़ाव की सतह को खाद्य सामग्री तैयार करने के अनुकूल बनाया जाता है. इसी में वह सामान्य गुड़ के साथ हल्दी, सहजन और अश्वगंधा मिश्रित गुड़ तैयार करते हैं. हल्दी और सहजन की पत्तियों को सुखाने के लिए उन्होंने खुद का ड्रायर भी बनाया है.

पानी बचाने के लिए अपनाई अलग सिंचाई तकनीक

मिश्रित फसलों की खेती में संजीव शर्मा एक गूल छोड़कर सिंचाई करते हैं. जिन नालियों में पानी नहीं पहुंचाया जाता, उनमें खरपतवार, घास और फसल के अवशेष बिछा दिए जाते हैं. इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और सिंचाई के लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है. फसल अवशेषों का उपयोग होने से खेत में जैविक पदार्थ भी बने रहते हैं.

एक ही वाटिका में उगा रहे कई तरह की सब्जियां

उन्होंने अपने खेत में प्राकृतिक तरीके से शाक वाटिका विकसित की है. इसमें अलग-अलग क्यारियां और बेड बनाकर मटर, बाकला, मूली, शलजम, गोभी, चना, सहजन, खट्टा, देसी पालक और सोया शाक जैसी फसलें उगाई जा रही हैं. मिश्रित खेती के इस तरीके से एक ही स्थान पर कई तरह की सब्जियां उपलब्ध हो रही हैं. इससे परिवार को पौष्टिक भोजन मिलने के साथ अतिरिक्त उपज से आमदनी का रास्ता भी खुलता है.

पराली से तैयार करते हैं आलू की फसल

आलू की खेती में भी संजीव शर्मा ने पारंपरिक तरीके से हटकर प्रयोग किया है. वह खेत की मिट्टी में आलू दबाने के बजाय जमीन की सतह पर रखकर उनके ऊपर धान की पराली की परत बिछाते हैं. आलू के आसपास और बीच में बाकला की बुवाई भी करते हैं. इसके बाद करीब तीन इंच मोटी पराली की परत डाल दी जाती है. इस तकनीक से खेत की जुताई का खर्च बचता है और धान की पराली का उपयोग भी हो जाता है. आलू की फसल तैयार होने के बाद उसी खेत में बेल वाली फसलें लगाकर अतिरिक्त कमाई की संभावना भी बनाई जाती है.

देसी और पारंपरिक बीजों का भी कर रहे संरक्षण

संजीव शर्मा के पास कई पारंपरिक किस्मों के बीजों का संग्रह है. गेहूं में बंशी, सोना मोती, पैगम्बरी और खपली जैसी किस्में हैं. धान में लालमणि, काला नमक, रामभोग और तिलक चंदन के बीज उपलब्ध हैं. इसके अलावा चावल की गांठा किस्म और मोटे अनाज में रागी, सांवा, पीली कंगनी, लाल कंगनी और चैन जैसे बीजों को भी उन्होंने सहेज रखा है. पेड़ पर उगने वाली सेम की तलवार बीन्स भी उनके बीज संग्रह का हिस्सा है. उनका प्रयास पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखने और किसानों तक पहुंचाने का है.

गुरु की सलाह से शुरू किया प्राकृतिक खेती का सफर

संजीव शर्मा बताते हैं कि उन्हें रासायनिक मुक्त खेती की प्रेरणा अपने गुरु रामकिशन गुप्ता से मिली. गुरु ने उन्हें ऐसी गेहूं की फसल उगाने की सलाह दी थी, जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न हो. इसका उद्देश्य जमीन की उर्वरता बनाए रखने के साथ लोगों को स्वस्थ अनाज उपलब्ध कराना था. इसके बाद उन्होंने वर्ष 2012 में जैविक खेती की शुरुआत की और करीब दो साल तक इस पद्धति पर काम किया. अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने पर उन्होंने सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती मॉडल को अपनाया. धीरे-धीरे प्रयोग करते हुए उन्होंने खेती के अपने तरीके विकसित किए.

किसानों को प्रशिक्षण देकर बढ़ा रहे जागरूकता

अब संजीव शर्मा केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती से जोड़ने में जुटे हैं. इसके लिए वह तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं. शिविर में रात के समय किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांत और तकनीकी जानकारी दी जाती है, जबकि दिन में खेतों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण कराया जाता है. उनका प्रयास है कि किसान कम लागत में खेती कर सकें, मिट्टी की सेहत बनी रहे और लोगों को रसायनमुक्त खाद्यान्न मिल सके. अपने तकनीकी कौशल और खेती में किए गए प्रयोगों के जरिए संजीव शर्मा क्षेत्र के किसानों के लिए एक नई राह दिखा रहे हैं.

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