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डेयरी का चुनाव हारकर भी पीछे नहीं हटी फडणवीस सरकार, अमूल-नंदिनी के बाद अब गोकुल पर नजर क्यों?

18 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र में कोल्हापूर जिल्हा सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (गोकुल डेयरी) का चुनाव हुआ. इस चुनाव में दूध उत्पादकों ने BJP को हरा दिया. इसके बाद BJP ने डेयरी बोर्ड में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए गोकुल डेयरी से जुड़े नियम बदल दिए.
नए नियम के मुताबिक, बोर्ड में चार निदेशकों को शामिल कर 12 की संख्या को 16 कर दिया गया. इस तरह सरकार ने गोकुल बोर्ड में बहुमत हासिल करने की कोशिश की. इस मामले में कांग्रेस ने कहा, "यह दूध उत्पादकों के वोटों की चोरी और जनादेश के साथ छेड़छाड़ है. बीजेपी सत्ता बचाने के लिए हर जगह किसी भी हद तक जाने को तैयार है. दूध उत्पादकों के वोट चुराने वालों को याद रखना चाहिए कि किसान कभी भूलते नहीं हैं.” इस स्टोरी में जानते हैं कि गोकुल डेयरी के चुनाव में हुआ क्या और BJP डेयरी राजनीति पर कब्जा क्यों करना चाहती है?
गोकुल डेयरी के मुद्दे पर राहुल गांधी का पोस्ट पढ़िए-
दरअसल, हाल ही में हुए चुनाव में कांग्रेस नेता सतेज पाटिल के गठबंधन ने 25 में से 13 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था. वहीं, सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को 12 सीटें मिलीं. लेकिन चुनाव के बाद अब ऐसा मोड़ आया है, जिसने इस पूरे नतीजे को और भी दिलचस्प बना दिया है.
कैबिनेट के फैसले से पलट सकता है गेम
चुनाव में 13 सीटें जीतकर कांग्रेस समर्थित 'राजर्षि शाहू शेतकरी समविचारी अघाड़ी' ने बहुमत हासिल कर लिया था. लेकिन बुधवार (4 नवंबर) को महाराष्ट्र कैबिनेट ने ऐसा फैसला लिया, जिससे पूरा गेम पलट सकता है. कैबिनेट ने गोकुल डेयरी के बोर्ड में 5 सरकारी निदेशकों को शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इनमें से 4 को वोट देने का अधिकार भी होगा. ऐसे में 13-12 का चुनावी समीकरण बदल सकता है.
आखिर डेयरी पर क्यों रहती है पॉलिटिकल पार्टियों की नजर?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट संजय कुमार के मुताबिक, अमित शाह और शरद पवार जैसे कई बड़े नेता को-ऑपरेटिव सोसाइटी से जुड़कर राजनीति में आगे बढ़े हैं. इसकी बड़ी वजह है कि इन संस्थाओं का सीधा जुड़ाव आम लोगों से होता है. खासकर किसानों, दूध उत्पादकों और ग्रामीण परिवारों से. इनके जरिए नेताओं को बड़ी आबादी तक पहुंच बनाने का मौका मिलता है. यही वजह है कि सहकारी संस्थाएं सिर्फ कारोबार का केंद्र नहीं, बल्कि राजनीति में आगे बढ़ने का एक मजबूत रास्ता भी बन जाती हैं.
संजय कुमार ने बताया कि गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में को-ऑपरेटिव सोसाइटी बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार देती हैं. इनका अपना कारोबार और मजबूत नेटवर्क होता है. इससे इनके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ जाते हैं. कई बार इनका नेटवर्क किसी राजनीतिक पार्टी के कैडर से भी ज्यादा मजबूत हो जाता है. चुनाव के समय इन संस्थाओं के बड़े पदों पर बैठे लोग अपने समर्थकों को प्रभावित कर सकते हैं. वे अपने हिसाब से राजनीतिक एजेंडा भी आगे बढ़ा सकते हैं. यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियां इन संस्थाओं पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहती हैं.
नंदिनी ब्रांड को लेकर BJP और कांग्रेस में क्यों हुआ था विवाद?
नंदिनी (Nandini) कर्नाटक का मशहूर डेयरी ब्रांड है. यह किसी प्राइवेट कंपनी का ब्रांड नहीं, बल्कि कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (KMF) का ब्रांड है. KMF एक सहकारी संस्था है, जो राज्य की दूध उत्पादक सहकारी समितियों के नेटवर्क के जरिए काम करती है. इसका मतलब है कि नंदिनी का कारोबार सीधे किसानों और दूध उत्पादकों से जुड़ा है. गांवों में दूध इकट्ठा करने से लेकर उसकी प्रोसेसिंग और बिक्री तक का काम इसी सहकारी नेटवर्क के जरिए होता है.
नंदिनी ब्रांड के पीछे KMF है जिसका नेटवर्क राज्य के करीब 24 हजार गांवों तक फैला है. इस पर किसी एक पार्टी का हमेशा दबदबा नहीं रहा है. अलग-अलग समय पर कांग्रेस, जनता दल (सेक्युलर) और बीजेपी से जुड़े नेताओं का प्रभाव रहा है.
साल 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले नंदिनी और गुजरात के अमूल ब्रांड को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. इसे 4 प्वाइंट में आसानी से समझें.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अमूल और नंदिनी के बीच सहयोग की बात कही थी.
कांग्रेस और जेडीएस ने आरोप लगाया कि बीजेपी नंदिनी को अमूल के साथ मिलाना चाहती है.
बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज किया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने भी नंदिनी के अमूल में विलय की बात से इनकार किया था.
कांग्रेस ने नंदिनी को कर्नाटक की पहचान से जोड़कर इस मुद्दे को चुनाव में उठाया था.
साल 2023 में किसने क्या कहा?
कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने एक्स पर लिखा था, ‘वो हम कन्नड़ लोगों की सभी संपत्ति को बेचने में लगे हैं. हमारे बैंकों को बर्बाद करने के बाद वे अब हमारे किसानों के बनाए नंदिनी दूध ब्रांड को खत्म करना चाहते हैं.’
उस वक्त के कर्नाटक के कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने कहा था, ‘हमारी मिट्टी, पानी और दूध बहुत मजबूत है. हम अपने किसानों और दूध को बचाना चाहते हैं. हमारे पास नंदिनी है जो अमूल से अच्छा ब्रांड है.’
JDS नेता व पूर्व CM एचडी कुमारस्वामी ने कहा था, ‘केंद्र सरकार अमूल को पिछले दरवाजे से कर्नाटक में लाना चाहती है. अमूल के जरिए BJP कर्नाटक मिल्क फेडरेशन यानी KMF और किसानों का गला घोंट रही है.'