समाचार · मध्य प्रदेश
बर्फ से जख्म, गोलियां और ‘अल्लाह हू अकबर’ का नारा:कैप्टन खान ने बताई- 5.5 हजार फीट ऊंची जुवैद हिल फतह की कहानी, बोले- मौत सामने थी
देश 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर हम आपको कारगिल युद्ध में जुवैर हिल पर कब्जे की लड़ाई लड़ने वाले भिंड के कैप्टन बादशाह खान की जुबानी जंग की कहानी बता रहे हैं। इस लड़ाई को जीतना आसान नहीं था, क्योंकि 5.5 हजार फीट ऊंची बर्फीली पहाड़ी पर 12 घंटे की चढ़ाई में 80 जवानों में से सिर्फ 40 ही चोटी तक पहुंच सके थे। कैप्टन बादशाह खान युद्ध की यादों की तस्वीर को शब्दों में बयां करते हुए कहते हैं कारगिल युद्ध को 27 साल बीत चुके हैं, लेकिन मेरे लिए उस जंग का हर पल आज भी उतना ही ताजा है। वो कहते हैं आंखें बंद करता हूं तो 5.5 हजार फीट ऊंची बर्फीली जुवैर हिल, दुश्मन की गोलियों की आवाज और साथियों के साथ चोटी पर तिरंगा फहराने का वह दृश्य सामने आ जाता है। वह सिर्फ पहाड़ पर कब्जे की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हर कदम पर जिंदगी और मौत के बीच फैसला लेने की जंग थी। शाम पांच बजे शुरू हुई चढ़ाई, 12 घंटे तक बढ़ते रहे
मैं उस समय 22 ग्रेनेडियर्स में तैनात था। उस रात हमारी असली परीक्षा थी। तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह के नेतृत्व में चार्ली एचएमसी कंपनी को जुवैर हिल पोस्ट पर कब्जे का लक्ष्य मिला। हमने शाम करीब 5 बजे चढ़ाई शुरू की। चढ़ाई आसान न थी। कई जगह रस्सियों के सहारे ऊपर बढ़ना पड़ा। बर्फीली पहाड़ी पर पैर जमाना मुश्किल था। ठंड इतनी ज्यादा थी कि पैरों की हालत खराब हो रही थी। इसके बावजूद हम रुकना नहीं चाहते थे। सहमें पता था कि एक बार रुक गए तो शरीर भी जवाब दे सकता है और दुश्मन को हमारी स्थिति का पता चल सकता है। करीब 12 घंटे तक हम लगातार ऊपर बढ़ते रहे। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सैनिक चोटी से स्नाइपर फायर कर रहे थे। गोलियां हमारे आसपास से निकल रही थीं। हर आवाज के साथ मौत का खतरा था, लेकिन हमारे जवानों का हौसला उससे कहीं ज्यादा मजबूत था। हमारे जवान एलएमजी और दूसरे हथियारों से जवाब देते हुए आगे बढ़ रहे थे। हमारा मकसद साफ था- चोटी तक पहुंचना और वहां तिरंगा फहराना। ‘नारा-ए-तकबीर’ की आवाज ने पाक सेना को कर दिया भ्रमित
जंग के दौरान एक ऐसा पल आया, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया हूं। हमारी तरफ से आर्टिलरी फायर हो रहा था। उसी दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने जोर से नारा लगाया—‘नारा-ए-तकबीर।’ हम जवानों ने जवाब में जोर से कहा—‘अल्लाह हू अकबर।’ कुछ पल के लिए पाकिस्तानी सैनिक भ्रमित हो गए। उन्हें लगा कि शायद उनकी तरफ से कोई बैकअप टीम आ रही है। हमारे लिए यही कुछ पल बेहद महत्वपूर्ण थे। दुश्मन की तरफ से फायरिंग में जो भ्रम पैदा हुआ, उसने हमें संभलने और आगे बढ़ने का मौका दे दिया। युद्ध में कई बार कुछ सेकंड भी पूरी बाजी पलट सकते हैं। उस समय हमारे लिए भी यही हुआ। हमने खुद को संभाला और आगे बढ़ते रहे। गोला-बारूद खत्म होने लगा तो समझ आया जंग कितनी कठिन है
जुवैर हिल पर पहुंचने की लड़ाई में एक समय ऐसा भी आया जब हमारा गोला-बारूद खत्म होने लगा। स्थिति बेहद कठिन थी, लेकिन हमारे कमांडर और जवानों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। लेफ्टिनेंट कर्नल अजीत सिंह ने अपनी राइफल की मैग्जीन से गोलियां निकालकर जेब में रख ली थीं। उनका मकसद साफ था कि अगर हालात और बिगड़े तो ये गोलियां हमारे ही काम आएंगी और दुश्मन के हाथ नहीं लगेंगी। हम जानते थे कि पीछे हटने का मतलब दुश्मन को फिर से मजबूत होने का मौका देना है। इसलिए हर जवान अपनी पूरी ताकत लगाकर आगे बढ़ रहा था। हेलीपैड पर कब्जा किया, पत्थरों से बनाई अस्थायी पोस्ट
जुवैर हिल पर पाकिस्तानी सेना ने हेलीपैड बना रखा था। वहां पाकिस्तानी हेलीकॉप्टर अपने जवानों को उतार रहे थे। इस हेलीपैड का इस्तेमाल कर दुश्मन अपनी स्थिति मजबूत कर रहा था। 12 घंटे की मेहनत के बाद चोटी पर पहुंचते ही सबसे पहले हमने हेलीपैड पर कब्जा किया। वहां मौजूद पत्थरों को एकत्रित कर अस्थायी पोस्ट तैयार की। यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि इससे दुश्मन की सप्लाई और मजबूती दोनों पर असर पड़ा, लेकिन इस जीत की कीमत भी बहुत बड़ी थी। जुवैर हिल पोस्ट पर कब्जे की लड़ाई में 22 ग्रेनेडियर के 18 जवान बलिदान हुए। कई साथी घायल हुए। हमने अपनी आंखों के सामने अपने साथियों को खोया, लेकिन किसी ने हिम्मत नहीं छोड़ी। घायल होकर भी लड़ते रहे शमशाद खान और जाकिर हुसैन इस लड़ाई में मेहगांव के लांस नायक शमशाद खान भी हमारे साथ थे। वे घायल होकर गिरे, लेकिन आखिरी समय तक लड़ते रहे और बलिदान हो गए। उनका साहस आज भी मुझे याद है। हरियाणा के नायक जाकिर हुसैन का एक हाथ लड़ाई के दौरान अलग हो गया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। वे एक हाथ से ही एलएमजी चलाकर दुश्मन को जवाब देते रहे। एलएमजी संभाल रहे उनके साथी रियासत अली भी इस लड़ाई में बलिदान हो गए। उन साथियों को याद करता हूं तो आज भी मन भारी हो जाता है। हमने सिर्फ एक चोटी नहीं जीती थी, हमने अपने साथियों की शहादत के बल पर तिरंगा वहां पहुंचाया था। तिरंगा फहराया तो लगा सारी तकलीफ खत्म हो गई
जब हम जुवैर हिल की चोटी पर पहुंचे और वहां तिरंगा फहराया, उस पल की खुशी शब्दों में बताना मुश्किल है। कई घंटे की चढ़ाई, बर्फ, ठंड, गोलियां, घायल साथी और मौत का डर, सब कुछ उस एक पल के सामने छोटा लग रहा था। मैंने उस समय यही महसूस किया कि हम सिर्फ अपने लिए नहीं लड़ रहे थे। हमारे पीछे पूरा देश खड़ा था। हर जवान के मन में सिर्फ एक बात थी- तिरंगा नीचे नहीं झुकना चाहिए। आज जब भारत पाकिस्तान युद्ध की बात आती है तो मेरी आंखों के सामने कारगिल युद्ध का दृश्य दिखता है और मेरी आंखों के सामने जुवैर हिल की वही बर्फीली चोटी आ जाती है। मुझे अपने उन साथियों की याद आती है, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च दिया। मैं गर्व से कहता हूं कि हम उस जंग के गवाह थे। हमने दुश्मन की गोलियों का सामना किया। बर्फीली पहाड़ियों पर चढ़ाई की और आखिरकार जुवैर हिल पर तिरंगा फहराया। हमारे लिए वही सबसे बड़ी जीत थी। 300 में से 80 जवान चुने, 40 ही चोटी तक पहुंच सके
आगे की कहानी सुनाते हुए खान कहते हैं- टीम में करीब 300 जवान थे। हम सभी मुस्लिम थे। जुवैर हिल पर चढ़ाई के लिए इनमें से 80 जवानों को चुना गया था। हमें दो दिन की विशेष ट्रेनिंग देकर तैयार किया गया। इसके बाद हम हथियार और गोला-बारूद लेकर 5.5 हजार फीट ऊंची पहाड़ी की तरफ बढ़े। जैसे-जैसे पहाड़ी के करीब पहुंचे, चारों तरफ गोलियों और बमबारी की आवाजें सुनाई देने लगीं। रस्सियों के सहारे हम ऊपर चढ़ रहे थे। हथियार और गोला-बारूद के साथ इतनी ऊंचाई पर चढ़ना बेहद मुश्किल था। गोलियां चलने के दौरान कई जवान घायल होकर वहीं गिर जाते थे। 80 जवानों में से करीब 40 ही चोटी तक पहुंच सके। सबसे मुश्किल पल वह था, जब अपने साथी को गोली लगने के बाद तड़पता हुआ वहीं छोड़कर आगे बढ़ना पड़ता था। मन कहता था कि साथी को उठाकर साथ ले जाएं, लेकिन हालात इसकी इजाजत नहीं देते थे। हमारा एक ही लक्ष्य था- किसी भी कीमत पर चोटी पर कब्जा करना। फायरिंग के बीच हम बचते-बचाते रस्सियों पर लटककर आगे बढ़ रहे थे। भारी जूतों में पैरों को पसीना आता था। जैसे ही कुछ देर रुकते, वही पसीना बर्फ बन जाता। कई घंटे तक पैर बर्फ में रहने से उनमें घाव हो गए। पैरों के घाव आज भी कारगिल की याद दिलाते हैं उस समय हुए घावों का दर्द आज भी मेरे पैरों में महसूस होता है। जब कभी ये दर्द उठता है तो मुझे जुवैर हिल की वह चढ़ाई और कारगिल की लड़ाई याद आ जाती है। दर्द जरूर होता है, लेकिन उसी के साथ एक सुकून भी मिलता है कि हमने देश के लिए वह जंग लड़ी और जुवैर हिल पर तिरंगा फहराया। मेरे लिए 15 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं है। जब भी तिरंगा लहराता देखता हूं तो मुझे जुवैर हिल की वह बर्फीली चोटी याद आती है। मुझे वे साथी याद आते हैं, जो मेरे साथ उस चोटी की ओर बढ़े थे और देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे गए। हमने उस दिन सिर्फ एक चोटी पर कब्जा नहीं किया था। हमने अपने साथियों की शहादत के बीच तिरंगा वहां पहुंचाया था। आज भी जब उस जंग को याद करता हूं तो मेरे मन में यही बात आती है- देश सबसे पहले था और तिरंगा कभी नीचे नहीं झुकना चाहिए।