Thursday, 29 October 2026
INTइंडियन न्यूज़ ट्रस्टजहाँ सत्य मिले विश्वास से
ताज़ा खबरें

national

रामलीला मैदान से सत्ता को चुनौती: 1975 का JP आंदोलन हो या अब INDIA ब्लॉक की महारैली, कब-कब गूंजा विरोध का बिगुल?

INT News29 October 2026 at 06:59 am

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के स्थान पर रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को विरोध-प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थल के तौर पर निर्धारित किया है. इन तीनों में रामलीला मैदान संसद और सत्ता के प्रमुख केंद्रों के अपेक्षाकृत करीब है.

रामलीला मैदान का इतिहास क्या है?

रामलीला मैदान का नाम यहां होने वाले रामलीला आयोजनों से पड़ा. यहां मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय रामलीला से जुड़ी गतिविधियां हो रही हैं. बाद में, 1930 के दशक में पुराने और नए दिल्ली के बीच स्थित एक तालाब को भरकर इस मैदान को विकसित किया गया.

समय के साथ यह मैदान धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के अलावा राजनीतिक रैलियों और जन आंदोलनों का भी प्रमुख केंद्र बन गया. यहां अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं ने बड़ी सभाएं कीं और सरकारों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई.

1975 में जेपी की रैली और इमरजेंसी

रामलीला मैदान के इतिहास में 25 जून 1975 का दिन बेहद अहम माना जाता है. उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1971 के लोकसभा चुनाव में उनके निर्वाचन को अमान्य घोषित कर दिया था. इसके बाद उनके इस्तीफे की मांग तेज हो गई थी.

उसी समय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में रामलीला मैदान में बड़ी रैली हुई. इसमें करीब एक लाख लोगों के शामिल होने का जिक्र मिलता है. जेपी ने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद पर बने रहने को चुनौती दी और सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने का आह्वान किया.

इस रैली के कुछ ही घंटों बाद देश में आपातकाल यानी इमरजेंसी लागू कर दी गई. इसके दौरान विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों की गिरफ्तारियां हुईं. नागरिक स्वतंत्रताओं पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं.

1977 में इमरजेंसी खत्म होने और लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जेपी फिर रामलीला मैदान पहुंचे. उन्होंने लोगों से लोकतंत्र और आजादी के पक्ष में मतदान करने की अपील की. इसके बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी ने जीत दर्ज की और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. इस तरह रामलीला मैदान का नाम देश के लोकतांत्रिक इतिहास के एक बड़े घटनाक्रम से जुड़ गया.

अन्ना हजारे का आंदोलन और लोकपाल की मांग

रामलीला मैदान ने 2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान फिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने प्रभावी लोकपाल कानून की मांग को लेकर अनशन किया. इससे पहले इस मुद्दे पर जंतर-मंतर पर भी प्रदर्शन हुए थे, लेकिन रामलीला मैदान में हुए 12 दिन के अनशन ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया.

इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मैदान पहुंचे. भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाए गए और देशभक्ति के गीतों के बीच आंदोलन ने एक बड़े जन अभियान का रूप ले लिया. लोकपाल कानून की मांग को लेकर हुए इस आंदोलन ने केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार पर दबाव बढ़ाया.

इसी आंदोलन से जुड़े कई नेताओं ने आगे चलकर आम आदमी पार्टी (AAP) के गठन में अहम भूमिका निभाई. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी ने 2013 में दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की. इस तरह रामलीला मैदान का आंदोलन भारतीय राजनीति में एक नए राजनीतिक विकल्प के उदय से भी जुड़ गया.

बाबा रामदेव का प्रदर्शन और आधी रात को पुलिस कार्रवाई

जून 2011 में योग गुरु बाबा रामदेव ने भी रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. उनकी मांग थी कि काले धन पर रोक लगाने और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं.

4 और 5 जून की दरम्यानी रात पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मैदान से हटाने के लिए कार्रवाई की. इस दौरान अफरातफरी मच गई. बाबा रामदेव मंच से नीचे उतरकर भीड़ में चले गए. कथित रूप से बाबा रामदेव ने महिलाओं के कपड़े पहनकर वहां से भागे, लेकिन पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कश्मीर सत्याग्रह

रामलीला मैदान का राजनीतिक इतिहास सिर्फ जेपी और अन्ना हजारे के आंदोलनों तक सीमित नहीं है. भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में यहां से कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर सत्याग्रह शुरू किया था.

उनका विरोध जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट व्यवस्था और अनुच्छेद 370 से जुड़े प्रावधानों के खिलाफ था. मुखर्जी बाद में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर पहुंचे, जहां हिरासत में रहने के दौरान 1953 में उनकी मृत्यु हो गई. यह घटनाक्रम भी भारतीय राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

किसान आंदोलन से लेकर विपक्ष की रैली तक

पिछले कुछ वर्षों में रामलीला मैदान पर कई दूसरे मुद्दों को लेकर भी प्रदर्शन हुए हैं.

किसानों और मजदूरों की मांगें: अप्रैल 2023 में मजदूर और किसान संगठनों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और मजदूरों के लिए बेहतर न्यूनतम वेतन जैसी मांगों को लेकर रैली की. मार्च 2024 में भी किसानों ने फसलों के लिए कानूनी MSP गारंटी और कर्ज माफी सहित कई मांगें उठाईं.

पुरानी पेंशन योजना: अक्टूबर 2023 में सरकारी कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया.

विपक्ष की रैली: मार्च 2024 में विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ 'लोकतंत्र बचाओ रैली' आयोजित की.

नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन: मार्च 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ मार्च निकाल रहे करीब 200 छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. वे जंतर-मंतर से रामलीला मैदान की ओर बढ़ रहे थे.

जंतर-मंतर की जगह रामलीला मैदान क्यों अहम?

दिल्ली में जंतर-मंतर लंबे समय तक विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा. लेकिन दिल्ली पुलिस ने अक्टूबर 2026 में इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा सीबीडी मैदान को वैकल्पिक स्थानों के तौर पर नामित किया.

इनमें रामलीला मैदान संसद से करीब छह किलोमीटर दूर है, जबकि बुराड़ी और सीबीडी मैदान 13 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित हैं. ऐसे में रामलीला मैदान की भौगोलिक स्थिति इसे राजनीतिक सभाओं और प्रदर्शनों के लिहाज से महत्वपूर्ण बनाती है.

ये भी पढ़ें: INDIA गठबंधन की महारैली को CJP का समर्थन, कारोबारी संगठन ने जताया विरोध; राहुल गांधी से मांगा 20 मिनट का समय