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दशहरा से पहले सारण के मढ़ौरा में गूंज रही बांसुरी की तान, सदियों पुरानी कला बचाने में जुटे कारीगर

Saran News : सारण जिले के मढ़ौरा प्रखंड क्षेत्र के मिर्जापुर और आसपास के गांवों में बांसुरी बनाने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है. दशहरा मेले को लेकर इन दिनों यहां कई घरों में बांसुरी बनाने का काम तेज हो गया है. कारीगर त्योहार के दौरान होने वाली मांग को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. इसी कुटीर उद्योग से क्षेत्र के दर्जनों परिवारों की आजीविका चलती है.
कई पीढ़ियों से बांसुरी बनाना ही रोजगार का साधन
स्थानीय निवासी नूर हसन बताते हैं कि बांसुरी निर्माण का काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से चला आ रहा है. उनके अनुसार क्षेत्र के दर्जनों परिवारों के लिए यह काम सैकड़ों वर्षों से जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन रहा है. दशहरा और अन्य मेलों के दौरान बांसुरी की मांग बढ़ जाती है, जिससे कारीगरों को अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद रहती है.
बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग मिलकर तैयार करते हैं बांसुरी
बांसुरी बनाने की प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य अपनी भूमिका निभाते हैं. बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग मिलकर बांसुरी में सुराख करने, उसे तराशने और सुर को सही करने का काम करते हैं. पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव के कारण कारीगर बिना किसी आधुनिक मशीन के बांसुरी को सुरीला बनाने की बारीकियां जानते हैं.
आजमगढ़ से केरल तक पहुंचती है मढ़ौरा की बांसुरी
मिर्जापुर में तैयार होने वाली बांसुरियों की मांग केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है. कारीगरों के अनुसार यहां की बांसुरियां उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ सहित कई इलाकों के मेलों में बेची जाती हैं. केरल तक भी यहां तैयार बांसुरियां पहुंचती हैं. त्योहार और मेला सीजन इन कारीगर परिवारों के लिए बिक्री का महत्वपूर्ण समय होता है.
प्लास्टिक खिलौनों ने बढ़ायी पारंपरिक कारीगरों की चुनौती
बांसुरी निर्माण की इस परंपरा के सामने अब कई चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं. बाजार में प्लास्टिक के खिलौनों का चलन बढ़ने से पारंपरिक बांसुरी की मांग प्रभावित हुई है. कम कीमत में मिलने वाले प्लास्टिक के खिलौनों से कारीगरों को प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है.
कच्चे माल की कमी और बाढ़ से भी बढ़ी परेशानी
कारीगरों के सामने कच्चे माल की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. इसके अलावा कई क्षेत्रों में आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का असर भी इनके काम पर पड़ता है. कच्चा माल महंगा होने और समय पर उपलब्ध नहीं होने से उत्पादन और लागत दोनों प्रभावित होते हैं.
सुरीली विरासत बचाने के लिए संघर्ष कर रहे कारीगर
मढ़ौरा के इन परिवारों के लिए बांसुरी सिर्फ एक खिलौना या बिक्री का सामान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और रोजी-रोटी का आधार है. बदलते बाजार और बढ़ती चुनौतियों के बीच कारीगर इस पारंपरिक हुनर को बचाये रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि त्योहारों और मेलों में बांसुरी की मांग बढ़ेगी और उनकी सदियों पुरानी सुरीली विरासत के साथ आजीविका का यह साधन भी सुरक्षित रहेगा.