Wednesday, 28 October 2026
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इंदौर नगर निगम के अधिकारी पर हाई कोर्ट सख्त:₹1 लाख खुद भरेंगे, सरकारी खजाने से नहीं होगी वसूली; हट चुकी धाराओं से हॉस्पिटल पर कार्रवाई

INT News28 October 2026 at 07:55 pm

कानून की किताब में जिन धाराओं को 2020 में ही हटा दिया गया था, उन्हीं के आधार पर इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी ने बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर के खिलाफ आदेश जारी कर दिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो नगर निगम को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। इस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने कड़ी नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारी पर 1 लाख रुपए की कॉस्ट लगा दी। कोर्ट ने निर्देश दिए कि यह राशि नगर निगम के खजाने से नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारी से वसूली जाए। जस्टिस संदीप नटवरलाल भट्ट ने बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अधिकारियों को अपने अधिकारों का इस्तेमाल प्रचलित कानून के अनुसार करना चाहिए। निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर आदेश जारी करना गंभीर कानूनी चूक है। ऐसी गलती के कारण याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट आना पड़ा और न्यायालय का समय भी खर्च हुआ। आदेश और लेजर रिपोर्ट वापस लेने पर सहमति बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड ने नगर निगम के 30 सितंबर 2026 के आदेश और इसके आधार पर 7 अक्टूबर को जारी लेजर रिपोर्ट को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से सीनियर एडवोकेट मनोज मुंशी ने संबंधित अधिकारी के निर्देश पर कोर्ट को बताया कि विवादित आदेश प्रथम दृष्टया कानून के विरुद्ध है और निगम इसे वापस ले रहा है। कोर्ट ने आदेश और लेजर रिपोर्ट वापस लेने संबंधी निगम के कथन को रिकॉर्ड पर लिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आदेश वापस लेने से अधिकारी की गंभीर कानूनी चूक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हट चुकी थीं नगर निगम अधिनियम की तीन धाराएं कोर्ट ने पाया कि विवादित आदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 143, 146 और 153 के आधार पर जारी किया गया था, जबकि ये धाराएं वर्ष 2020 में ही विलोपित की जा चुकी थीं। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि नगर निगम जैसी वैधानिक संस्था के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के मौजूदा प्रावधानों की जानकारी रखें और उन्हीं के अनुसार निर्णय लें। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी ने कानूनी प्रावधानों की समुचित जांच किए बिना यांत्रिक तरीके से आदेश पारित किया। इसके कारण अस्पताल को न्याय के लिए हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा। कोर्ट ने ऐसी स्थिति को निराशाजनक बताते हुए भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होने की अपेक्षा जताई। ₹75 हजार विधिक सेवा प्राधिकरण, ₹25 हजार अस्पताल को हाईकोर्ट ने कुल 1 लाख रुपए की कॉस्ट तय करते हुए इसके भुगतान का ब्योरा भी स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की गलत कार्यवाही से पैदा होने वाली मुकदमेबाजी का आर्थिक बोझ अनावश्यक रूप से सार्वजनिक धन पर नहीं डाला जाना चाहिए। कॉस्ट लगाने का उद्देश्य ऐसी गलतियों को रोकना और अधिकारियों को उनके कानूनी दायित्वों के प्रति जवाबदेह बनाना है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने पैरवी की। नगर निगम की ओर से सीनियर एडवोकेट मनोज मुंशी और एडवोकेट शशांक श्रीवास्तव उपस्थित हुए।