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पाकिस्तानी जासूस भोपाल से भेजता था ई-मेल:शादी करके बसना चाहता था, जेल से छूटा तो 14 महीने पाकिस्तान ने नागरिक नहीं माना
क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि भोपाल में सिटी बैंक में नौकरी करने वाला अब्दुल समी अचानक पुलिस की जांच के रडार पर आ गया। पुलिस को इनपुट मिला था कि वह पाकिस्तानी जासूस साजिद मुनीर है। राजस्थान में पकड़े गए एजाजुल हसन ने पूछताछ के दौरान उसका नाम बताया था। 25 मई 2004 को भोपाल क्राइम ब्रांच ने उसे एक इंटरनेट कैफे से गिरफ्तार किया। वह भोपाल का निवासी होने का दावा कर रहा था। उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज थे। वह अब्दुल सलाम के घर रह रहा था और खुद को उसका बेटा बताता था। सिटी बैंक में नौकरी करने वाले इस युवक की गर्लफ्रेंड थी और सगाई भी हो चुकी थी, लेकिन पुलिस की नजर में भारतीय पहचान के पीछे एक पाकिस्तानी नागरिक छिपा था। सवाल यह था कि वह भोपाल में किस मकसद से आया था? क्या वह वाकई जासूसी कर रहा था? और अगर हां, तो उसने यहां रहते हुए कौन-सी जानकारियां जुटाईं? आगे की कहानी में पढ़िए इनके जवाब… साजिद मुनीर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने उसके दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों की जांच शुरू की। उसके पास से मिले दस्तावेजों में सैन्य क्षेत्र का नक्शा, दक्षिण कमान से जुड़ी जानकारी और कुछ दूसरे संदिग्ध कागजात शामिल बताए गए। जांच एजेंसियों को संदेह था कि इनका इस्तेमाल भारत से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां पाकिस्तान तक पहुंचाने के लिए किया जा रहा था। पुलिस की जांच में सामने आया कि मुनीर इंटरनेट कैफे जाकर ई-मेल के जरिए सूचनाएं भेजता था। इंटेलिजेंस को मिली कई अहम जानकारी ई-मेल अकाउंट की जांच में कुछ ऐसी जानकारियां मिलीं, जिनसे जांचकर्ताओं का संदेह बढ़ गया। अकाउंट खोलने पर ‘Welcome Mohammad’ लिखा दिखाई देता था। इसके इनबॉक्स में दो ई-मेल भी मौजूद थे। अकाउंट बनाने वाले की जानकारी में नाम ‘मिस्टर मोहम्मद साबिद’, पता पाकिस्तान और पेशा ‘चेयरमैन’ दर्ज था। रिपोर्ट्स में पासवर्ड का भी जिक्र किया गया था। हालांकि, केवल इन जानकारियों के आधार पर जासूसी नेटवर्क की पुष्टि नहीं की जा सकती थी। इसलिए पुलिस ने दूसरे दस्तावेजों और जांच के दौरान मिले इनपुट के साथ इनकी पड़ताल की। पाकिस्तान से भारत आने तक की कहानी जांच के दौरान साजिद मुनीर की पृष्ठभूमि भी सामने आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रहीमयार खान जिले का रहने वाला था। उस पर पाकिस्तान में एक रेंजर और एक व्यापारी की हत्या का आरोप था। बताया गया कि पुलिस से बचने के दौरान वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के संपर्क में आया। ISI ने उसे पाकिस्तान में पुलिस कार्रवाई से बचाने का भरोसा दिया। इसके बदले उसे भारत में जासूसी करने के लिए तैयार किया गया। ISI की मदद से वह बांग्लादेश की राजधानी ढाका पहुंचा। वहां से सीमा पार कर भारत में दाखिल हुआ। सिर्फ चार महीने में अपनी पहचान बना ली दिसंबर 2003 में भारत पहुंचने के बाद उसने लगभग चार महीने भोपाल में बिताए। इतने कम समय में उसने यहां अपनी पहचान बना ली थी। उसके पास भारतीय नागरिक होने से जुड़े दस्तावेज थे, वह बैंक में नौकरी कर रहा था और निजी जिंदगी में भी उसके रिश्ते बन चुके थे। वह रोजमर्रा की जिंदगी में सामान्य युवक की तरह रह रहा था, लेकिन जांच एजेंसियों को शक था कि इस पहचान का इस्तेमाल असली मकसद छिपाने के लिए किया गया। जयपुर मॉड्यूल से जुड़ने का संदेह मुनीर की भूमिका केवल भारत में छिपकर रहने तक सीमित नहीं थी। गिरफ्तारी के समय उसके जयपुर में सक्रिय ISI मॉड्यूल के साथ काम करने की बात सामने आई थी। उसके पास से मिली एक डायरी में कथित तौर पर भारत में उसकी योजनाओं से जुड़ी जानकारियां दर्ज थीं। जांच का दायरा भोपाल से आगे बढ़ चुका था। एक तरफ फर्जी पहचान से जुड़े दस्तावेज थे, तो दूसरी तरफ संदिग्ध ई-मेल और सैन्य क्षेत्र से संबंधित कागजात। इन सभी कड़ियों को जोड़कर एजेंसियों ने पता लगाने की कोशिश की कि मुनीर किस नेटवर्क के संपर्क में था और उसे क्या जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 25 मई 2004 को गिरफ्तारी के बाद मामला कानूनी कार्रवाई तक पहुंचा। अदालत ने उसे अलग-अलग धाराओं में सात साल और पांच साल की अतिरिक्त सजा सुनाई। सजा पूरी हुई, लेकिन रिहाई नहीं मिली भोपाल की सेंट्रल जेल में साजिद मुनीर ने करीब 12 साल बिताए। जून 2016 में उसकी सजा पूरी हुई। सामान्य तौर पर किसी कैदी की सजा पूरी होने का मतलब जेल से बाहर निकलना होता है, लेकिन मुनीर के मामले में एक नई अड़चन सामने आ गई। उसे पाकिस्तानी नागरिक बताया गया था, लेकिन पाकिस्तान शुरुआत में उसे अपना नागरिक मानने और वापस लेने को तैयार नहीं था। ऐसे में भारतीय जेल में सजा पूरी करने के बाद भी उसकी रिहाई का रास्ता साफ नहीं हुआ। जेल से निकलने के बाद उसे भोपाल पुलिस के डिटेंशन सेंटर में रखा गया। यह स्थिति करीब 14 महीने तक बनी रही। इस दौरान उसके रहने, खाने-पीने और दूसरी बुनियादी जरूरतों का खर्च भोपाल पुलिस की जिला विशेष शाखा उठा रही थी। अब मामला केवल जासूसी के आरोप और सजा का नहीं रह गया था। सवाल यह था कि जिस व्यक्ति को भारतीय अदालत सजा दे चुकी थी, उसे सजा पूरी होने के बाद किस देश के हवाले किया जाए। भारत में रहना चाहता था मुनीर रिपोर्ट्स के मुताबिक, साजिद मुनीर पाकिस्तान वापस नहीं जाना चाहता था। उसने भारत में रहने की इच्छा जताई थी। उसने आशंका भी जताई थी कि पाकिस्तान लौटने पर उसे पुरानी दुश्मनी और ISI से खतरा हो सकता है, लेकिन भारत में रहने की अनुमति नहीं मिली। दूसरी ओर, पाकिस्तान की ओर से नागरिकता स्वीकार किए जाने का इंतजार जारी रहा। करीब 14 महीने तक डिटेंशन सेंटर में रहने के बाद आखिरकार पाकिस्तान उच्चायोग ने उसे अपना नागरिक स्वीकार कर लिया।