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Success Story : नक्सली खौफ से सफलता की कहानी तक पहुंचा रोहतास का नौहट्टा, जानें कैसे मजदूर की बेटी ने तय किया BPSC 70वीं का सफ़र

INT News14 October 2026 at 06:30 am

Rohtas BPSC 70th Success Story : कभी नक्सली हिंसा और लाल आतंक के लिए चर्चित रहे रोहतास जिले के नौहट्टा प्रखंड से अब एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो संघर्ष के बीच सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती है. जिस इलाके में कभी डर और अशिक्षा के कारण बेटियों की पढ़ाई बड़ी चुनौती हुआ करती थी, उसी क्षेत्र के रसूलपुर गांव की सीमा कुमारी ने अपनी मेहनत से नई पहचान बनाई है.

बेहद साधारण परिवार में पली-बढ़ीं सीमा ने BPSC 70वीं परीक्षा में 1036वीं रैंक हासिल की है. उनका चयन प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के पद पर हुआ है. इससे पहले वह बिहार पुलिस में दरोगा के पद पर भी चयनित हो चुकी हैं. मजदूरी कर परिवार चलाने वाले पिता की बेटी का यह सफर उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं.

कभी नक्सली खौफ के साये में था इलाका

रोहतास जिले का नौहट्टा प्रखंड लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों और हिंसा के कारण सुर्खियों में रहा. वर्ष 2011 तक इस इलाके में लाल आतंक का असर लोगों के जीवन पर दिखाई देता था. ऐसे माहौल में शिक्षा हासिल करना और खासकर बेटियों का आगे बढ़ना आसान नहीं था. इसी इलाके के रसूलपुर गांव की सीमा कुमारी ने अपनी मेहनत से इस तस्वीर को बदलने की कोशिश की है.

अब बेटी की सफलता की चर्चा

21 जून 1999 को जन्मीं सीमा ने आर्थिक तंगी को अपनी पढ़ाई के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया. आज BPSC में सफलता हासिल करने के बाद उनकी उपलब्धि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गई है. सीमा की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने किसी बड़े शहर के महंगे संस्थान या संपन्न परिवार के सहारे नहीं, बल्कि गांव से अपनी पढ़ाई शुरू करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं तक का सफर तय किया.

दूसरे राज्यों में मजदूरी करते थे पिता

सीमा के पिता धर्मेंद्र सिंह परिवार का खर्च चलाने के लिए दूसरे राज्यों में मजदूरी करते थे. मेहनत-मजदूरी से होने वाली कमाई से ही घर की जरूरतें पूरी होती थीं. लेकिन समय के साथ परिवार पर मुश्किलों का बोझ और बढ़ गया. रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या और ऑपरेशन के कारण धर्मेंद्र सिंह को दूसरे राज्यों में मजदूरी छोड़कर घर लौटना पड़ा. इसके बाद उन्होंने गांव में ही खेती-बारी से जुड़े मजदूरी के काम के जरिए परिवार का भरण-पोषण करना शुरू किया.

बीमारी ने बढ़ाई मुश्किलें

आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन सीमा ने पढ़ाई जारी रखने का फैसला नहीं बदला. एक तरफ परिवार की सीमित आमदनी और दूसरी तरफ अपने भविष्य को बेहतर बनाने की चुनौती थी. इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा. यही दृढ़ निश्चय आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.

गांव के स्कूल से BTech तक, ऐसे पूरी की पढ़ाई

सीमा कुमारी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव के वित्त रहित विद्यालय से की. वर्ष 2015 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की. इसके बाद 2017 में डेहरी स्थित जवाहर लाल नेहरू कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की. आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने तकनीकी शिक्षा का रास्ता चुना. BCECE परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनका दाखिला छपरा स्थित लोक नायक जयप्रकाश नारायण इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हुआ.

यहां से उन्होंने वर्ष 2021 में इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग यानी EEE में बीटेक की डिग्री हासिल की. गांव के साधारण स्कूल से इंजीनियरिंग की डिग्री तक पहुंचना उनके लिए एक अहम पड़ाव था. हालांकि, सीमा का लक्ष्य केवल डिग्री हासिल कर नौकरी पाना नहीं था. वह प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालना चाहती थीं.

पटना में सेल्फ स्टडी कर शुरू की तैयारी

बीटेक पूरा करने के बाद सीमा ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की. वर्ष 2022 से वह पटना में रहकर सेल्फ स्टडी करने लगीं. सीमित संसाधनों के बीच अपनी तैयारी को आगे बढ़ाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी.

पहले बनीं दरोगा

उनकी मेहनत का पहला बड़ा परिणाम वर्ष 2024 में सामने आया, जब उनका चयन बिहार पुलिस में दरोगा के पद पर हुआ. इसके बाद उन्हें शिवहर जिला आवंटित किया गया. इस सफलता ने उनके आत्मविश्वास को और मजबूत किया, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना जारी रखा.

सीमा के लिए दरोगा के पद पर चयन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, मगर उन्होंने आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी जारी रखी. आखिरकार BPSC 70वीं परीक्षा में 1036वीं रैंक हासिल कर उन्होंने एक और बड़ी सफलता अपने नाम कर ली.

BPSC में 1036वीं रैंक

BPSC 70वीं परीक्षा के परिणाम ने सीमा कुमारी के लंबे संघर्ष को नई पहचान दी. परीक्षा में 1036वीं रैंक हासिल करने के बाद उनका चयन प्रखंड कल्याण पदाधिकारी के पद पर हुआ है. फिलहाल सीमा पटना स्थित बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान यानी बिपार्ड में पांच महीने का प्रशिक्षण ले रही हैं.

प्रखंड कल्याण पदाधिकारी की जिम्मेदारी

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वह अपने पद से जुड़ी जिम्मेदारियों को संभालेंगी. एक ऐसे परिवार से आने वाली सीमा के लिए यह उपलब्धि खास मायने रखती है, जहां पिता को परिवार चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ी और आर्थिक परिस्थितियों से लगातार जूझना पड़ा. उनकी सफलता दिखाती है कि मुश्किल हालात में भी शिक्षा और मेहनत के जरिए आगे बढ़ने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं.

मां और बहन का मिला साथ

सीमा की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उनकी मां गृहिणी हैं, जबकि उनकी बहन ममता कुमारी शिक्षिका हैं. परिवार के सहयोग और हौसला बढ़ाने से सीमा को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने की ताकत मिली. इसके अलावा पड़ोसी गांव बंजारी की सुप्रिया आनंद से भी उन्हें प्रेरणा मिली.

गांव की दूसरी बेटी से भी मिली प्रेरणा

सुप्रिया ने BPSC में सफलता हासिल कर अंचलाधिकारी का पद पाया था. अपने आसपास की एक बेटी को प्रशासनिक सेवा में आगे बढ़ते देखकर सीमा का भी हौसला बढ़ा. कई बार किसी दूसरे की सफलता यह भरोसा दिलाती है कि अपने हालात चाहे जैसे हों, मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बनाया जा सकता है. सीमा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. उन्होंने अपने आसपास की सफलता से प्रेरणा ली और अपनी मेहनत से एक नई उपलब्धि हासिल की.

रोहतास की बेटियों के लिए प्रेरणा बनीं सीमा

सीमा कुमारी की कहानी केवल एक प्रतियोगी परीक्षा में सफलता पाने की कहानी नहीं है. यह उस भरोसे की कहानी है, जो कठिन परिस्थितियों में भी इंसान को आगे बढ़ने की ताकत देता है. गांव के स्कूल से पढ़ाई शुरू करने, इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने, दरोगा बनने और फिर BPSC में सफलता पाने तक उनका सफर कई पड़ावों से होकर गुजरा है. उनकी उपलब्धि नौहट्टा और आसपास के ग्रामीण इलाकों के उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो आर्थिक तंगी या संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को लेकर असमंजस में रहते हैं.

खासकर बेटियों के लिए सीमा का सफर यह संदेश देता है कि अवसर मिलने और लगातार प्रयास करने पर वे भी अपनी अलग पहचान बना सकती हैं. मजदूर पिता की बेटी से प्रखंड कल्याण पदाधिकारी बनने तक का सीमा का सफर बताता है कि परिस्थितियां किसी की शुरुआत तय कर सकती हैं, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए मेहनत, धैर्य और दृढ़ संकल्प की भूमिका बेहद अहम होती है.

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