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September Rainfall : सितंबर में कम बारिश हुई तो खेत से लेकर आपकी जेब तक पड़ेगा असर, बिहार-झारखंड में किसानों की बढ़ी चिंता

September Rainfall : मानसून का आखिरी महीना किसानों के लिए काफी अहम होता है. धान, मक्का और दूसरी खरीफ फसलें इस समय बढ़ने की अवस्था में होती हैं. सितंबर में होने वाली बारिश खेत में नमी बनाए रखने में मदद करती है. इसके बाद यही नमी गेहूं, चना, मसूर और सरसों जैसी रबी फसलों की शुरुआती तैयारी में भी काम आती है. विशेषज्ञों के मुताबिक कम बारिश और मिट्टी में कम नमी होने पर रबी की बुआई का क्षेत्र और फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है.
बिहार में सबसे पहले धान पर पड़ सकता है असर
बिहार में खेती का बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर करता है. ऐसे में सितंबर में लंबे समय तक बारिश कम रही तो धान की फसल को लेकर सबसे पहले चिंता हो सकती है. खासकर उत्तर बिहार के उन इलाकों में जहां खेतों की सिंचाई बारिश और स्थानीय जल स्रोतों पर काफी निर्भर है. हालांकि अभी किसी पूरे जिले की फसल खराब होने की बात कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि सितंबर में होने वाली बारिश और स्थानीय खेतों में नमी की स्थिति काफी कुछ तय करेगी.
झारखंड की तस्वीर थोड़ी अलग है
झारखंड में सितंबर की कम बारिश की चिंता को सीधे तौर पर मुसीबत के रूप में नहीं देखा जा सकता. IMD के मुताबिक 1 जून से 3 सितंबर तक राज्य में कुल बारिश सामान्य रही और मौसमी बारिश में विचलन करीब 0% था. हालांकि इसी अवधि में 7 जिले कम बारिश वाली श्रेणी में रहे. वहीं 28 अगस्त से 3 सितंबर के बीच राज्य में सामान्य से 147% ज्यादा बारिश दर्ज हुई. यानी राज्य के अलग-अलग जिलों में पानी की स्थिति अलग हो सकती है.
किस जिले में कैसी चिंता?
बिहार में उत्तर बिहार के धान वाले जिलों में सितंबर की बारिश खास मायने रखती है. वहीं दक्षिण बिहार में मिट्टी की नमी और सिंचाई की उपलब्धता फसल की स्थिति तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी. झारखंड में भी रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा, पलामू, गढ़वा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में स्थानीय बारिश और खेतों की नमी को अलग-अलग देखकर स्थिति समझनी होगी. IMD का जिला स्तर का आंकड़ा इस तस्वीर को ज्यादा साफ करता है.
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रबी की बुआई पर कैसे पहुंचेगा असर?
सितंबर में बारिश कम होने का दूसरा बड़ा असर रबी की तैयारी पर हो सकता है. खेत में पर्याप्त नमी नहीं रही तो किसानों को बुआई के समय अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. इससे डीजल, बिजली या पंप से सिंचाई का खर्च बढ़ सकता है. खासकर छोटे किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च खेती की लागत बढ़ा सकता है. केंद्र सरकार भी खरीफ की तैयारी में पर्याप्त बारिश और मिट्टी में नमी को खेती के लिए जरूरी मानती है.
किसान की चिंता आखिर आम आदमी तक कैसे पहुंचेगी?
अगर कम बारिश के कारण किसी इलाके में फसल की पैदावार घटती है तो उसका असर सिर्फ किसान की आमदनी तक सीमित नहीं रहता. बाजार में किसी फसल की आवक कम होने पर उसकी कीमत बढ़ सकती है. हालांकि अभी यह कहना सही नहीं होगा कि सितंबर की कम बारिश से बिहार-झारखंड में खाद्य महंगाई जरूर बढ़ेगी. इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बारिश कितनी कम होती है, कौन-सी फसल प्रभावित होती है और दूसरी जगहों से बाजार में कितनी आपूर्ति आती है.
न्यूज लॉन्ड्री को दिए इंटरव्यू में पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने सितंबर में बारिश की स्थिति और उसके असर को लेकर राय दी है:
फसल की पैदावार पर निर्भरता: सितंबर की बारिश पर खरीफ फसलों की अंतिम पैदावार काफी हद तक निर्भर करेगी.
अनाज बनने की अहम अवस्था: अगस्त और सितंबर का समय फसलों में दाना (ग्रेन फॉर्मेशन) और फलियां बनने के लिए बेहद नाजुक होता है, जहां नमी का होना जरूरी है.
ज्यादा बारिश का उलटा असर: उन्होंने आगाह किया कि बारिश कम होने के खतरे के साथ-साथ अगर सितंबर में बहुत ज्यादा बारिश हो गई, तो वह खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान भी पहुंचा सकती है.
पैदावार पर सीमित असर का अनुमान: मानसून में उतार-चढ़ाव के बावजूद उनका मानना है कि कुल खाद्यान्न उत्पादन में 5% से अधिक की भारी गिरावट होने की आशंका नहीं है.
इस समय किसान क्या देखें?
अभी सबसे जरूरी है कि किसान सिर्फ पूरे राज्य के बारिश के आंकड़े देखकर फैसला न लें. अपने जिले की बारिश, खेत की नमी, फसल की अवस्था और अगले 7-10 दिन के मौसम पूर्वानुमान को साथ में देखें. केंद्र के कृषि विभाग की Crop Weather Watch Group रिपोर्ट भी फसल और मौसम की स्थिति पर नियमित आंकड़े देती है.
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