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PM Modi @ 76: नरेंद्र मोदी की अनदेखी छाप... NITI Aayog, Digital India और शासन में बड़े बदलाव

INT News17 September 2026 at 09:34 am

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है. ऐसे मौके पर चर्चा अक्सर उनके कार्यकाल के बड़े फैसलों, चुनावी उपलब्धियों, विदेश यात्राओं और चर्चित योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है. लेकिन किसी लंबे राजनीतिक कार्यकाल को समझने का एक दूसरा तरीका भी है—यह देखना कि उसके दौरान राज्य की संस्थाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और शासन के तरीके में क्या बदलाव आए.

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को इसी नजरिये से देखें तो कहानी केवल बड़ी घोषणाओं की नहीं है. इसमें कुछ ऐसे संस्थागत और प्रशासनिक बदलाव भी हैं, जिनका असर रोजमर्रा के शासन पर पड़ा है.

प्रधानमंत्री से आगे: शासन की मशीनरी में बदलाव

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार ने प्रशासन और नीति-निर्माण की संरचना में कई बदलावों पर जोर दिया. इनमें सबसे प्रतीकात्मक बदलाव था योजना आयोग की जगह नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना.

1 जनवरी 2015 को नीति आयोग अस्तित्व में आया. सरकार ने इसे नीति-निर्माण, रणनीतिक सलाह और केंद्र-राज्य सहयोग के लिए एक नए संस्थागत ढांचे के रूप में पेश किया. नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं.

इस बदलाव को केवल नाम बदलने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा. नीति आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों में इसे cooperative federalism यानी सहकारी संघवाद को बढ़ाने वाली संस्था के रूप में परिभाषित किया गया है.

योजना आयोग से नीति आयोग तक क्या बदला?

पुराने मॉडल में योजना आयोग की भूमिका संसाधनों और योजनागत प्राथमिकताओं से गहराई से जुड़ी थी. इसके विपरीत नीति आयोग को सरकार के लिए एक policy think tank और strategic advisory institution के रूप में विकसित किया गया.

इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि राज्यों को विकास संबंधी नीति-चर्चा में अधिक प्रत्यक्ष भूमिका देने के लिए Governing Council को मंच बनाया गया.

यानी बदलाव केवल एक संस्था के खत्म होने और दूसरी के बनने का नहीं था. यह उस सोच में बदलाव का प्रयास भी था कि केंद्र और राज्य विकास के एजेंडे को किस तरह साथ लेकर चलें.

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जब सरकार कानून बनाती ही नहीं, पुराने कानून हटाती भी है

शासन में बदलाव का एक कम चर्चित पहलू obsolete यानी अप्रचलित कानूनों को हटाने की प्रक्रिया रही है.

भारत में दशकों से चले आ रहे कई कानून ऐसे थे जिनकी उपयोगिता समय के साथ समाप्त हो चुकी थी. विधि आयोग और विधायी विभाग ने ऐसे कानूनों की पहचान और निरसन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई. उदाहरण के लिए, विधि आयोग की रिपोर्टों ने कई पुराने कानूनों को repeal करने की सिफारिश की थी.

विधायी विभाग की आधिकारिक जानकारी में 2014 के बाद अप्रचलित और redundant कानूनों को हटाने के लिए विधायी पहल का उल्लेख मिलता है. जून 2026 तक निरस्त कानूनों की सूची भी विधायी विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध है.

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि शासन का मतलब केवल नए नियम बनाना नहीं है. कभी-कभी बेकार हो चुके नियमों को हटाना भी प्रशासनिक सुधार का हिस्सा होता है.

हाईवे और एयरपोर्ट दिखते हैं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कम दिखता है

भारत में विकास की तस्वीर अक्सर एक्सप्रेसवे, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और पुलों से बनाई जाती है. लेकिन पिछले दशक में एक दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेजी से विकसित हुआ— Digital Public Infrastructure.

DigiLocker इसका एक उदाहरण है. डिजिटल इंडिया के अनुसार, इसका उद्देश्य दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराना और paperless governance को बढ़ावा देना है.

डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की सरकारी सूची में DigiLocker, India Stack Global, API Setu, Common Services Centres और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म शामिल हैं.

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तकनीक केवल सरकारी कार्यालयों के भीतर इस्तेमाल होने वाली चीज नहीं रही. वह नागरिक और राज्य के बीच संपर्क का माध्यम बनने लगी.

पहले किसी प्रमाणपत्र, दस्तावेज या सरकारी सेवा के लिए कार्यालय जाना सामान्य अनुभव था. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस प्रक्रिया के कई हिस्सों को ऑनलाइन कर दिया.

यही वह बदलाव है जिसे अक्सर बड़ी इमारतों और परियोजनाओं की तुलना में कम दिखाई देता है, लेकिन नागरिक के रोजमर्रा के अनुभव में इसका महत्व अधिक हो सकता है.

शासन को 'मापने' की कोशिश

मोदी सरकार के शासन मॉडल में एक और प्रमुख विशेषता रही— real-time monitoring और measurable outcomes पर जोर.

सरकारी योजनाओं की प्रगति को डैशबोर्ड, डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा के जरिए ट्रैक करने की कोशिश बढ़ी है. नीति आयोग भी राज्यों और जिलों के प्रदर्शन को विभिन्न सूचकांकों और कार्यक्रमों के माध्यम से मापने की दिशा में काम करता रहा है.

Aspirational Districts Programme इसका एक उदाहरण है, जिसमें पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों के प्रदर्शन को संकेतकों के आधार पर देखने का प्रयास किया गया. नीति आयोग इसे सहकारी संघवाद और राज्यों के साथ निरंतर engagement से जोड़ता है.

इस मॉडल में सरकार के काम को केवल यह कहकर नहीं देखा जाता कि कोई योजना शुरू हुई या नहीं. सवाल यह भी होता है कि उसका परिणाम क्या निकला और उसे डेटा में कैसे मापा जाए.

राष्ट्रीय शक्ति को केवल सेना से नहीं जोड़ना

मोदी युग की एक व्यापक विशेषता यह भी रही है कि राष्ट्रीय शक्ति की चर्चा आर्थिक क्षमता, तकनीक, विनिर्माण, डिजिटल क्षमता और सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़कर की गई.

'आत्मनिर्भरता', manufacturing, startups, infrastructure और emerging technologies जैसे विषय इसी बड़े विमर्श का हिस्सा रहे हैं.

यहां एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि आर्थिक विकास को केवल GDP या रोजगार के सवाल के रूप में नहीं, बल्कि strategic resilience यानी वैश्विक संकटों के बीच देश की क्षमता बनाए रखने के संदर्भ में भी प्रस्तुत किया गया.

महामारी, supply-chain disruptions, technological competition और बदलते geopolitical equations के दौर में यह सोच और अधिक महत्वपूर्ण हुई है.

विदेश नीति से लेकर टेक्नोलॉजी तक—लंबी अवधि की सोच

मोदी सरकार की कई प्रमुख पहलों को तत्काल परिणामों से आगे लंबे समय के लक्ष्य से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है.

Digital India, infrastructure expansion, emerging technologies, manufacturing और institutional reforms जैसे क्षेत्रों में बदलाव रातोंरात दिखाई देने वाले परिणाम नहीं देते. इनका वास्तविक प्रभाव समय के साथ दिखाई देता है.

यही कारण है कि मोदी के राजनीतिक दौर का मूल्यांकन केवल चुनावी नतीजों या किसी एक बड़े फैसले से करना पर्याप्त नहीं होगा. संस्थागत बदलावों का प्रभाव अक्सर धीरे-धीरे सामने आता है.

मोदी की 'अनदेखी छाप' आखिर क्या है?

इतिहास अक्सर नेताओं को कुछ बड़ी घटनाओं के जरिए याद रखता है. लेकिन शासन की गहरी विरासत कई बार उन व्यवस्थाओं में दिखाई देती है जो किसी एक घटना से ज्यादा लंबे समय तक चलती हैं.

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में नीति आयोग के जरिए संस्थागत पुनर्गठन, अप्रचलित कानूनों को हटाने का प्रयास, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का विस्तार, डेटा-आधारित निगरानी और केंद्र-राज्य नीति संवाद जैसे कई बदलाव इसी श्रेणी में आते हैं.

इनमें से प्रत्येक पहल की अपनी उपलब्धियां, सीमाएं और आलोचनाएं हैं. लेकिन इन सबको एक साथ देखने पर एक व्यापक तस्वीर सामने आती है— भारतीय राज्य को अधिक डिजिटल, डेटा-संचालित, परिणाम-केंद्रित और रणनीतिक बनाने की कोशिश.

17 सितंबर को नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर इसलिए केवल यह सवाल नहीं कि उनके कार्यकाल में कौन-से बड़े फैसले हुए। एक दूसरा सवाल भी महत्वपूर्ण है—

उन्होंने भारतीय शासन की मशीनरी को किस तरह बदलने की कोशिश की?

क्योंकि किसी प्रधानमंत्री की राजनीतिक विरासत केवल उन फैसलों में नहीं होती जो सुर्खियां बनते हैं. कई बार असली छाप उन संस्थानों, प्रणालियों और प्रक्रियाओं में दिखाई देती है, जो सुर्खियों से दूर रहकर भी लंबे समय तक काम करती रहती हैं.

लेखक: प्रियंशी त्रिपाठी, डायरेक्टर, Geostate.Org

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