Wednesday, 28 October 2026
INTइंडियन न्यूज़ ट्रस्टजहाँ सत्य मिले विश्वास से
ताज़ा खबरें

national

Explained: सार्वजनिक महाभियोग क्या होता है? क्या जनता के फैसले से जा सकती है ज्ञानेश कुमार की कुर्सी?

INT News28 October 2026 at 01:44 pm

Public Impeachment Explained: विपक्षी इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 30 अक्टूबर को सार्वजनिक महाभियोग आयोजित करने का ऐलान किया है. कार्यक्रम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर होगा. कांग्रेस ने बताया कि दूसरे स्थानों पर आयोजन की अनुमति नहीं मिलने के बाद दिल्ली के 10 राजाजी मार्ग स्थित खरगे के घर को चुना गया है. कार्यक्रम शुक्रवार दोपहर 3:30 बजे शुरू होगा. इस बीच सवाल उठ रहा है कि क्या जनता किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने का फैसला सुना सकती है? सार्वजनिक महाभियोग और संसद की असली प्रक्रिया में क्या अंतर है? क्या 30 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार की कुर्सी जा सकती है? आइए, सवाल-जवाब के जरिए पूरा मामला समझते हैं.

सवाल: आखिर सार्वजनिक महाभियोग क्या होता है?

सार्वजनिक महाभियोग यानी Public Impeachment किसी अधिकारी के खिलाफ विरोध जताने और उसकी जवाबदेही तय करने की मांग उठाने का एक प्रतीकात्मक तरीका है. इसमें राजनीतिक दल, संगठन या नागरिक किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के कामकाज पर सवाल उठाते हैं. आरोपों को जनता के सामने रखा जाता है और संबंधित अधिकारी को पद से हटाने की मांग की जा सकती है.

हालांकि, भारत के संविधान में सार्वजनिक महाभियोग नाम की कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है. इसमें सुनाया गया कोई भी फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता. यानी जनता की सभा या प्रतीकात्मक संसद किसी संवैधानिक पदाधिकारी को सीधे उसके पद से नहीं हटा सकती.

सवाल: 30 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ क्या होने वाला है?

इंडिया गठबंधन ने 30 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सार्वजनिक महाभियोग आयोजित करने की घोषणा की है. पहले यह कार्यक्रम दिल्ली के अशोक होटल या रामलीला मैदान में आयोजित करने की योजना थी. कांग्रेस का कहना है कि वहां अनुमति नहीं मिलने के बाद अब कार्यक्रम मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर होगा.

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश के अनुसार, कार्यक्रम 30 अक्टूबर को दोपहर 3:30 बजे दिल्ली के 10, राजाजी मार्ग पर आयोजित किया जाएगा. इसमें विपक्षी दलों के नेता शामिल होंगे.

विपक्ष इस आयोजन के जरिए कथित वोट चोरी, चुनावी गड़बड़ियों और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपनी आपत्तियां उठाएगा. कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार पर संविधान के प्रावधानों और चुनावी लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोप भी लगाए हैं. हालांकि, ये विपक्ष के आरोप हैं, कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं.

इस कार्यक्रम को प्रतीकात्मक संसद या जनसुनवाई की तरह आयोजित किया जा सकता है. लेकिन इसकी कार्यवाही संसद की वास्तविक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होगी.

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का अधिकार किसके पास है?

भारत के संविधान का अनुच्छेद 324(5) मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के मामले में विशेष सुरक्षा देता है. इसके अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित 2023 के कानून की धारा 11(2) में भी यही व्यवस्था की गई है.

इसका सीधा मतलब है कि किसी राजनीतिक दल, सार्वजनिक सभा या आंदोलन के फैसले से मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी नहीं जा सकती. इसके लिए संसद में तय प्रक्रिया पूरी करनी होती है. दोनों सदनों से जरूरी समर्थन मिलने के बाद राष्ट्रपति पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं.

सवाल: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की असली प्रक्रिया कैसे शुरू होती है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी है. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत इसकी शुरुआत संसद में एक औपचारिक नोटिस देने से होती है.

इसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं. नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति तय करते हैं कि इसे स्वीकार किया जाए या खारिज.

अगर नोटिस स्वीकार होता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता को शामिल किया जाता है.

यह समिति आरोपों की जांच करती है. संबंधित पदाधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया जाता है. जांच में आरोप साबित होने पर प्रस्ताव को संसद में आगे बढ़ाया जा सकता है.

सवाल: संसद में कितने सांसदों का समर्थन मिलने पर मुख्य चुनाव आयुक्त हट सकते हैं?

संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने पर भी यही नियम लागू होता है.

इसके लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए.

लोकसभा और राज्यसभा में संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में हो.

दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई प्रस्ताव का समर्थन करें.

दोनों सदनों को एक ही सत्र में निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है. इसके बाद राष्ट्रपति को पद से हटाने का प्रस्ताव भेजा जाता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के संवैधानिक आधार साबित कदाचार या अक्षमता हैं. इसलिए केवल आरोप लगाना या राजनीतिक विरोध करना पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है.

सवाल: क्या ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है?

हां. मार्च 2026 में विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में औपचारिक नोटिस दिए थे.

लोकसभा में 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों ने इन नोटिसों पर हस्ताक्षर किए थे. विपक्ष ने चुनाव आयोग के कथित पक्षपातपूर्ण आचरण, चुनावी गड़बड़ियों और SIR से जुड़ी शिकायतों को आधार बनाया था.

हालांकि, 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इन नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. इस तरह मार्च में शुरू की गई वह संसदीय कोशिश आगे नहीं बढ़ सकी.

अब 30 अक्टूबर को प्रस्तावित सार्वजनिक महाभियोग उससे अलग है. यह संसद में पेश किया गया औपचारिक प्रस्ताव नहीं, बल्कि विपक्ष का एक राजनीतिक विरोध कार्यक्रम है.

सवाल: क्या 30 अक्टूबर को सार्वजनिक महाभियोग के बाद ज्ञानेश कुमार की कुर्सी जा सकती है?

नहीं, केवल सार्वजनिक महाभियोग के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता.

मान लीजिए कि 30 अक्टूबर के कार्यक्रम में विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोप रखता है और उन्हें पद से हटाने का प्रतीकात्मक फैसला भी सुना देता है. तब भी उस फैसले से उनका पद अपने आप समाप्त नहीं होगा.

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद की निर्धारित प्रक्रिया, आरोपों की जांच, दोनों सदनों में विशेष बहुमत और राष्ट्रपति का आदेश जरूरी है.

इसलिए सार्वजनिक महाभियोग से राजनीतिक दबाव तो बनाया जा सकता है, लेकिन इससे किसी संवैधानिक पदाधिकारी को कानूनी रूप से पदमुक्त नहीं किया जा सकता.

सवाल: क्या दूसरे देशों में भी सार्वजनिक महाभियोग जैसे अभियान चलाए गए हैं?

अमेरिका में फरवरी 2026 में Citizens’ Impeachment अभियान से जुड़े संगठनों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ विरोध तेज किया था. लोगों से अपने सांसदों पर महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने का दबाव बनाने की अपील की गई थी.

इस अभियान का उद्देश्य नागरिकों को एकजुट करना और संसद के सदस्यों से जवाबदेही की मांग करना था. हालांकि, अमेरिका में भी नागरिकों के विरोध प्रदर्शन से राष्ट्रपति को सीधे नहीं हटाया जा सकता. उसके लिए वहां की संवैधानिक महाभियोग प्रक्रिया जरूरी है.

दक्षिण कोरिया का उदाहरण इससे अलग है. दिसंबर 2024 में तत्कालीन राष्ट्रपति यून सुक योल ने मार्शल लॉ लगाने की घोषणा की थी. इस फैसले के खिलाफ देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए.

इसके बाद 14 दिसंबर 2024 को दक्षिण कोरिया की संसद ने उनके खिलाफ औपचारिक महाभियोग प्रस्ताव पारित किया. मामला संवैधानिक अदालत पहुंचा और 4 अप्रैल 2025 को अदालत ने महाभियोग को बरकरार रखते हुए यून सुक योल को राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया.

सवाल: भारत में सार्वजनिक महाभियोग का क्या असर हो सकता है?

सार्वजनिक महाभियोग से किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाया नहीं जा सकता, लेकिन इसके जरिए विपक्ष किसी मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींच सकता है. यह राजनीतिक दबाव बनाने, आरोपों को जनता के सामने रखने और जवाबदेही की मांग उठाने का एक तरीका हो सकता है.

इंडिया गठबंधन ने 30 अक्टूबर के कार्यक्रम के बाद 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने की भी योजना बनाई है. ऐसे में विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है.

कुल मिलाकर, 30 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ होने वाला सार्वजनिक महाभियोग एक प्रतीकात्मक राजनीतिक कार्यक्रम होगा. मुख्य चुनाव आयुक्त की कुर्सी का फैसला जनता की सभा में नहीं, बल्कि संविधान के तहत निर्धारित संसदीय प्रक्रिया से ही हो सकता है.

Also Read: मल्लिकार्जुन खरगे का मोदी-शाह पर हमला, पूछा- CEC ज्ञानेश कुमार को क्यों बचा रही है सरकार?