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बंगाल: SIR की अपील सुनने वाले जजों ने PAN और ID प्रूफ देने से किया इनकार, जानें चुनाव आयोग से क्यों ठनी?

West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में मतदाताओं की अपीलों पर फैसले लेने वाले न्यायाधीशों और चुनाव आयोग के बीच मतभेद गहरा गए हैं. जिन जजों को मतदाताओं की अपीलों पर फैसला सुनाने की जिम्मेदारी मिली है, उनसे अब चुनाव आयोग दस्तावेज मांग रहा है. अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने जजों से ऑनलाइन आदेश जारी करने के लिए पैन कार्ड और सरकारी पहचानपत्र समेत कई दस्तावेज मांगे हैं. इस विवाद का असर मतदाताओं की अपीलों के निपटारे पर पड़ रहा है.
जजों को देने होंगे PAN कार्ड और पहचानपत्र!
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने जजों को डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट बनवाने के लिए कहा है. इसके लिए संबंधित एजेंसी ने 28 अक्टूबर को एक ईमेल भेजा था. इसमें जजों से पैन कार्ड, सरकारी पहचानपत्र, फोटो, मोबाइल नंबर और ईमेल की जानकारी मांगी गई.
दस्तावेज देने के बाद वीडियो कॉल से भी होगी जांच
जजों को पहले अपने मोबाइल नंबर और ईमेल पर आने वाला OTP डालकर पहचान की पुष्टि करनी होगी. इसके बाद वीडियो के जरिए भी जांच होगी. इस दौरान उन्हें अपना असली पैन कार्ड और सरकारी पहचानपत्र कैमरे के सामने दिखाना होगा. यानी ऑनलाइन फैसलों पर हस्ताक्षर करने की सुविधा पाने के लिए जजों को पहचान सत्यापन की पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा.
जजों और चुनाव आयोग के बीच विवाद क्यों हुआ?
यह मामला 21 सितंबर को शुरू हुआ था. उस दिन चुनाव आयोग ने अपने ऑनलाइन पोर्टल पर आधार कार्ड से पहचान की पुष्टि करने की व्यवस्था जोड़ी थी. जजों को इस व्यवस्था पर आपत्ति थी. उन्होंने 24 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर इसे हटाने की मांग की. लेकिन उनकी मांग के बाद भी यह व्यवस्था नहीं हटाई गई. इसके चलते जजों ने पोर्टल पर लॉगइन करना बंद कर दिया. हालांकि वे ऑफलाइन काम करते रहे.
38 लाख से ज्यादा अपीलें, केवल 1.26 लाख का फैसला
इस विवाद का सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जिन्होंने वोटर लिस्ट से नाम हटने या नाम जोड़ने को लेकर शिकायत की है. चुनाव आयोग ने सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं. इनमें से 10 सितंबर तक सिर्फ 1.26 लाख अपीलों का निपटारा हो पाया था. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पोर्टल को लेकर विवाद के कारण जज ऑनलाइन अंतिम फैसले जारी नहीं कर पा रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने जजों को दी थी जिम्मेदारी
पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की जांच को लेकर चुनाव आयोग और तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच विवाद था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को आदेश दिया कि मतदाताओं की पात्रता से जुड़े मामलों की जांच न्यायिक अधिकारी करेंगे. इन अधिकारियों ने 60.06 लाख मतदाताओं के मामलों की जांच की. इसके बाद 27.16 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए. जिन लोगों को इस फैसले पर आपत्ति थी, उनके लिए अपील करने की व्यवस्था बनाई गई. इसी काम के लिए विशेष न्यायाधिकरणों में जजों को जिम्मेदारी सौंपी गई.
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