Sunday, 8 November 2026
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बिहार के इस भोजपुरी गायक ने अंग्रेजों को दी थी चुनौती; छापते थे नकली नोट, धोखा मिला तो गाने में सुनाई पूरी कहानी

INT News8 November 2026 at 08:37 pm

भोजपुरी संगीत की दुनिया में कई ऐसे नाम हैं, जिनके गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे गायक के बारे में सुना है, जिसकी जिंदगी में संगीत के साथ नकली नोट छापने का किस्सा भी जुड़ा था? कहा जाता है कि वह अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे क्रांतिकारियों की मदद के लिए अपने घर में नकली नोट छापते थे. जब अंग्रेज पुलिस को इसकी भनक लगी, तो एक जासूस संगीत सीखने के बहाने उनके घर पहुंचा. उसने कई साल तक उनका भरोसा जीता और आखिरकार उन्हें गिरफ्तार करवा दिया.

यह कहानी है भोजपुरी के मशहूर लोक गायक महेंद्र मिसिर की है. उनकी जिंदगी का यह किस्सा किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि गिरफ्तारी के बाद महेंद्र मिसिर ने उस जासूस को लेकर ही एक गाना बना दिया, जिसे आज भी याद किया जाता है.

कौन थे महेंद्र मिसिर?

महेंद्र मिसिर का जन्म 16 मार्च 1886 को बिहार के छपरा के पास मिश्रवलिया गांव में हुआ था. उन्हें भोजपुरी संगीत की दुनिया में 'पूरबी सम्राट' के नाम से जाना जाता है. उन्होंने अपने गीतों के जरिए प्यार, इंतजार और जुदाई जैसे एहसासों को आवाज दी.

उनके गीतों में आम लोगों की जिंदगी और खासकर महिलाओं के मन की बातें सुनाई देती थीं. महेंद्र मिसिर सिर्फ गायक ही नहीं, बल्कि अच्छे संगीतकार और लेखक भी थे. उन्हें हारमोनियम, तबला, सितार और सारंगी जैसे वाद्य यंत्र बजाने में महारत हासिल थी.

उनके संगीत का असर भोजपुरी के दूसरे बड़े कलाकारों पर भी पड़ा. भिखारी ठाकुर भी उनके संगीत से प्रभावित थे. भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का 'शेक्सपियर' कहा जाता है.

अंग्रेजों के खिलाफ छापते थे नकली नोट?

महेंद्र मिसिर की जिंदगी का सबसे दिलचस्प किस्सा अंग्रेजों के शासन के समय का है. परिवार के लोगों के मुताबिक, वह आजादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों की आर्थिक मदद करना चाहते थे. उस समय क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए पैसों की जरूरत होती थी.

कहा जाता है कि इसी मकसद से महेंद्र मिसिर ने अपने घर में नकली नोट छापने शुरू कर दिए थे. अल जजीरा की एक रिपोर्ट में उनके पोते रामनाथ मिसिर के हवाले से बताया गया है कि वह करीब 1915 से इस काम में लगे थे. रिपोर्ट के मुताबिक, इन पैसों से क्रांतिकारियों और उनके परिवारों की मदद की जाती थी.

संगीत सीखने के बहाने घर पहुंचा जासूस

महेंद्र मिसिर का यह काम ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका. अंग्रेज पुलिस को उन पर शक होने लगा. इसके बाद पुलिस ने उनके बारे में जानकारी जुटाने के लिए एक जासूस को उनके घर भेजा.

इस जासूस का नाम सुरेंद्रलाल घोष था. उसने गोपीचंद नाम से महेंद्र मिसिर के घर में जगह बनाई. वह खुद को संगीत सीखने का शौकीन बताकर उनके करीब आया.

गोपीचंद ने महेंद्र मिसिर से संगीत सीखा, उनके साथ तबला बजाया और धीरे-धीरे उनका भरोसा जीत लिया. बताया जाता है कि वह उनके लिए पान तक तैयार करता था. इस तरह उसने लंबे समय तक उनके घर में रहकर सारी जानकारी जुटाई.

आखिरकार, 16 अप्रैल 1924 को पुलिस ने महेंद्र मिसिर को गिरफ्तार कर लिया. जिस व्यक्ति को वह अपना संगीत साथी समझ रहे थे, वही उनकी गिरफ्तारी की वजह बना.

जासूस के धोखे पर बना दिया गाना

महेंद्र मिसिर की कहानी का सबसे खास हिस्सा उनकी गिरफ्तारी के बाद सामने आया. जब उन्हें पता चला कि गोपीचंद संगीत सीखने नहीं, बल्कि उन पर नजर रखने आया था, तो उन्होंने इस धोखे को अपने गीत में उतार दिया.

उन्होंने 'पाकल-पाकल पनवा, खियवले गोपीचनवा' नाम से एक गीत बनाया. इस गीत में उन्होंने गोपीचंद का जिक्र किया. गीत के जरिए उन्होंने बताया कि कैसे वह उन्हें पान खिलाता था, उनके करीब आया और आखिर में जेल पहुंचा दिया.

जिस जासूस ने महेंद्र मिसिर का राज अंग्रेज पुलिस तक पहुंचाया, उसे महेंद्र मिसिर ने अपने गीत के जरिए हमेशा के लिए यादगार बना दिया.

भोजपुरी फिल्म 'बिदेसिया' में भी सुनाई दिया गाना

महेंद्र मिसिर का यह गीत कई साल बाद भोजपुरी फिल्म 'बिदेसिया' में भी सुनाई दिया. 1963 में रिलीज हुई इस फिल्म में 'हंसी-हंसी पनवा खियवले बेईमानवा' गाने को मन्ना डे और महेंद्र कपूर ने आवाज दी थी.

फिल्म में गाने के बोल महेंद्र मिसिर के पुराने गीत से मिलते-जुलते थे. इस तरह उनकी जिंदगी से जुड़ा यह किस्सा संगीत के जरिए नई पीढ़ी तक भी पहुंचा.

भिखारी ठाकुर भी थे उनके संगीत से प्रभावित

महेंद्र मिसिर का योगदान सिर्फ गाने तक सीमित नहीं था. वह भोजपुरी साहित्य में भी रुचि रखते थे. उनके नाम 'अपूर्व रामायण' जैसी रचना का जिक्र मिलता है.

भोजपुरी के मशहूर कलाकार भिखारी ठाकुर भी उनके संगीत से प्रभावित थे. महेंद्र मिसिर के गीतों और पूरबी शैली का असर उस दौर के भोजपुरी संगीत पर साफ दिखाई देता है.

महेंद्र मिसिर का निधन 28 सितंबर 1946 को हुआ था. लेकिन उनके गीत आज भी भोजपुरी लोक संगीत का हिस्सा हैं. उनकी कहानी में संगीत है, प्यार और जुदाई है, अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का किस्सा है और एक ऐसे जासूस का जिक्र भी है, जिसे उन्होंने अपने गीत में अमर कर दिया.

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