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हर सवाल का जवाब AI से, क्या अपने दम पर सोचना भूल रहे हैं आज के बच्चे?

INT News3 November 2026 at 07:11 pm

आज स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पास हर सवाल का जवाब पाने का एक आसान रास्ता है. होमवर्क करना हो, असाइनमेंट तैयार करना हो, किसी सवाल का जवाब लिखना हो या फिर छुट्टी के लिए लीव एप्लीकेशन बनानी हो, बस ChatGPT या Google Gemini खोलिए और कुछ सेकेंड में काम पूरा. बच्चों के लिए यह काफी आसान हो गया है. लेकिन इस आसानी के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है. क्या AI बच्चों की पढ़ाई आसान कर रहा है या धीरे-धीरे उन्हें खुद सोचना और मेहनत करना भुला रहा है?

पहले किसी सवाल का जवाब जानने के लिए बच्चे किताबें पलटते थे, अपने दोस्तों से पूछते थे या फिर शिक्षक की मदद लेते थे. जवाब नहीं मिलता था तो दोबारा कोशिश करते थे. इस पूरी प्रक्रिया में उनका दिमाग काम करता था. लेकिन अब कई बच्चे सवाल पढ़ते ही उसका जवाब AI से मांग लेते हैं. कई बार तो पूरा असाइनमेंट ही AI तैयार कर देता है और बच्चा उसे बिना ठीक से समझे अपनी कॉपी में लिख देता है. परेशानी यहीं से शुरू होती है.

अमेरिका में हुई रिसर्च ने भी खड़े किए सवाल

अमेरिका में भी इस मुद्दे पर लगातार चर्चा हो रही है. मार्च 2025 में अमेरिकी मीडिया संस्थान Axios ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें Common Sense Media के सर्वे का हवाला दिया गया. सर्वे के मुताबिक, सितंबर 2024 तक अमेरिका के करीब 70 फीसदी किशोर कम से कम एक जनरेटिव AI टूल इस्तेमाल कर चुके थे. इनमें आधे से ज्यादा बच्चों ने बताया कि वे होमवर्क में भी AI की मदद लेते हैं. यानी AI अब बच्चों की पढ़ाई का हिस्सा बन चुका है. Axios

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के Wharton School के शोधकर्ताओं ने भी इस पर एक प्रयोग किया. इस रिसर्च में तुर्किये के करीब 1,000 हाईस्कूल के छात्रों को शामिल किया गया. छात्रों को गणित के सवाल हल करने के लिए AI की मदद दी गई. एक समूह को सामान्य ChatGPT जैसे टूल का इस्तेमाल करने दिया गया, जबकि दूसरे समूह को ऐसा AI टूल दिया गया जो सीधे जवाब देने के बजाय संकेत देकर सवाल हल करना सिखाता था.

रिसर्च में सामने आया कि AI की मदद से अभ्यास करते समय छात्रों का प्रदर्शन बेहतर हुआ. लेकिन जब उनसे AI की मदद हटा ली गई, तो सामान्य ChatGPT वाले समूह के छात्रों का प्रदर्शन उन छात्रों से भी कमजोर रहा, जिन्हें AI की मदद नहीं मिली थी. सामान्य AI टूल इस्तेमाल करने वाले छात्रों के अंक बिना AI वाले समूह की तुलना में 17 फीसदी कम रहे. वहीं, जो AI टूल सीधे जवाब देने के बजाय बच्चों को समझाकर सवाल हल करना सिखा रहा था, उसके नतीजे बेहतर थे. यह रिसर्च जून 2025 में प्रतिष्ठित जर्नल PNAS में प्रकाशित हुई. PNAS +1

इसका मतलब साफ है. अगर बच्चा AI से सिर्फ जवाब लेना सीखता है, तो AI हटने के बाद उसके लिए खुद सवाल हल करना मुश्किल हो सकता है.

चीन में भी स्कूली बच्चों पर हुई रिसर्च

चीन में भी इस विषय पर अध्ययन किया गया है. 2025 में Education and Information Technologies नाम के रिसर्च जर्नल में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ. इसमें 127 मिडिल स्कूल के छात्रों को शामिल किया गया. शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि AI चैटबॉट की मदद से असाइनमेंट पूरा करने का बच्चों की पढ़ाई, सीखने की आदत और पढ़ाई में रुचि पर क्या असर पड़ता है.

इस अध्ययन में खास तौर पर यह देखा गया कि जब बच्चे असाइनमेंट पूरा करने के लिए AI पर निर्भर होते हैं, तो उनके सीखने के तरीके में क्या बदलाव आता है. शोधकर्ताओं ने छात्रों के प्रदर्शन के साथ-साथ उनकी पढ़ाई में रुचि और अनुभव को भी समझने की कोशिश की. यह रिसर्च इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सीधे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को शामिल किया गया था. ERIC +1

ब्रिटेन के बच्चों पर हुआ प्रयोग, तीन दिन बाद सामने आया फर्क

ब्रिटेन के इंग्लैंड में 14 से 15 साल के 405 स्कूली बच्चों पर एक प्रयोग किया गया. इस रिसर्च में बच्चों को पढ़ने के लिए कुछ सामग्री दी गई. कुछ बच्चों ने AI की मदद ली, कुछ ने खुद नोट्स बनाकर पढ़ाई की और कुछ ने दोनों तरीकों का इस्तेमाल किया.

इसके तीन दिन बाद बच्चों की समझ और याद रखने की क्षमता की जांच की गई. नतीजे में सामने आया कि जिन बच्चों ने सिर्फ AI का इस्तेमाल किया था, उनकी तुलना में खुद नोट्स बनाकर पढ़ने वाले बच्चों ने बेहतर प्रदर्शन किया. जिन बच्चों ने AI के साथ नोट्स भी बनाए थे, उनका प्रदर्शन भी बेहतर रहा.

दिलचस्प बात यह थी कि ज्यादातर बच्चों को AI का इस्तेमाल करना ज्यादा आसान और अच्छा लगा, लेकिन खुद नोट्स बनाकर पढ़ने से उन्हें चीजें ज्यादा अच्छी तरह याद रहीं. यह अध्ययन अप्रैल 2026 में 'Computers & Education' जर्नल में प्रकाशित हुआ. ScienceDirect +1

यानी बच्चों को जो तरीका आसान लग रहा है, जरूरी नहीं कि वही तरीका उन्हें सबसे ज्यादा सिखा भी रहा हो.

क्या AI से दिमाग की सोचने की क्षमता पर असर पड़ सकता है?

जब कोई बच्चा खुद गणित का सवाल हल करता है, निबंध लिखता है या किसी विषय को समझने की कोशिश करता है, तो वह सिर्फ अपना होमवर्क पूरा नहीं कर रहा होता. वह सोच रहा होता है, जानकारी याद कर रहा होता है, गलतियां कर रहा होता है और उन गलतियों से सीख रहा होता है. इसी अभ्यास से उसकी सोचने, समझने और किसी समस्या का हल निकालने की क्षमता बेहतर होती है.

लेकिन अगर हर बार AI ही उसके लिए सवाल हल कर दे, जवाब लिख दे और पूरी जानकारी तैयार कर दे, तो बच्चे को खुद दिमाग लगाने का मौका कम मिलेगा. इस आदत को रिसर्च की भाषा में 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि दिमाग से होने वाला काम किसी दूसरे टूल के भरोसे छोड़ देना.

अमेरिका के MIT Media Lab में भी ChatGPT और दिमाग की सक्रियता को लेकर एक प्रयोग किया गया. इसमें 54 लोगों को SAT जैसी परीक्षा के लिए निबंध लिखने को कहा गया. कुछ लोगों ने ChatGPT की मदद ली, कुछ ने Google का इस्तेमाल किया और कुछ ने बिना किसी टूल के खुद निबंध लिखा. प्रयोग में ChatGPT इस्तेमाल करने वाले समूह में दिमाग की गतिविधि के कुछ संकेत कम पाए गए और कई प्रतिभागियों को बाद में अपना लिखा हुआ याद करने में भी परेशानी हुई.

हालांकि, यह अध्ययन मुख्य रूप से कॉलेज उम्र के लोगों पर था, इसका सैंपल छोटा था और यह उस समय किसी शोध जर्नल में प्रकाशित नहीं हुआ था. इसलिए इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ChatGPT बच्चों का दिमाग कमजोर कर रहा है. लेकिन इसने AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए. इस प्रयोग की रिपोर्ट अमेरिकी अखबार The Washington Post ने भी प्रकाशित की थी. The Washington Post

AI से दूरी नहीं, सही इस्तेमाल सीखना जरूरी

अब सवाल है कि क्या बच्चों को AI का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए? ऐसा करना सही नहीं होगा. AI बच्चों के लिए एक अच्छे शिक्षक की तरह भी काम कर सकता है. अगर किसी बच्चे को गणित का सवाल समझ नहीं आ रहा है, तो वह AI से उसका तरीका पूछ सकता है. विज्ञान का कोई कठिन विषय आसान भाषा में समझ सकता है या अंग्रेजी की गलतियां सुधार सकता है.

लेकिन फर्क इस बात से पड़ता है कि बच्चा AI से सीख रहा है या अपना काम उससे करवा रहा है. अगर बच्चा हर सवाल का जवाब कॉपी करके लिख रहा है, तो उसे असल में उस विषय की कितनी समझ आ रही है, यह सवाल बना रहेगा.

UNESCO ने भी शिक्षा में AI के इस्तेमाल को लेकर अपनी गाइडलाइन जारी की है. इसमें कहा गया है कि AI का इस्तेमाल बच्चों की उम्र के हिसाब से और शिक्षकों की निगरानी में होना चाहिए. शिक्षा में तकनीक की भूमिका बच्चों की सीखने की क्षमता को बेहतर बनाना है, न कि शिक्षक और बच्चे की अपनी सोच की जगह लेना. UNESCO

आने वाले समय में बच्चों के सामने क्या चुनौती होगी?

आज बच्चा AI से अपना होमवर्क करवा सकता है, लेकिन परीक्षा में उसे खुद जवाब देना होगा. आगे चलकर नौकरी में उसे खुद फैसले लेने होंगे, किसी मुश्किल परिस्थिति को समझना होगा और अपनी समझ से समस्या का हल निकालना होगा. उस समय AI हर जगह मौजूद हो, यह जरूरी नहीं. और अगर मौजूद भी हो, तो उसके दिए जवाब को सही या गलत समझने के लिए खुद की समझ होना जरूरी है.

इसलिए माता-पिता और स्कूलों को भी इस पर ध्यान देना होगा. बच्चों को AI से जवाब कॉपी करने के बजाय उससे सवाल समझने की आदत डालनी होगी. होमवर्क के बाद उनसे पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने क्या सीखा. स्कूलों में ऐसे असाइनमेंट होने चाहिए, जिनमें बच्चों को अपनी सोच और समझ का इस्तेमाल करना पड़े.

आखिरकार AI एक मशीन है, जो कुछ सेकेंड में हजारों शब्द लिख सकती है. लेकिन उन शब्दों का मतलब समझना, सही और गलत में फर्क करना और अपनी सोच से कोई फैसला लेना इंसान का काम है. बच्चों को AI चलाना जरूर सीखना चाहिए, लेकिन ऐसा न हो कि धीरे-धीरे AI उनका दिमाग चलाने लगे.