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'सालाना 2 करोड़ लोगों की मौत हृदय संबंधी बीमारियों से':इंदौर में वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अध्यक्ष बोले- बीमारी के लिए उम्र का इंतजार न करें
हृदय रोग अब कम उम्र के लोगों के लिए भी चिंता का विषय बन रहे हैं। घंटों बैठकर काम करना, शारीरिक गतिविधियों में कमी, खानपान की बदलती आदतें और मोटापा इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं।बीमारी के लिए उम्र का इंतजार न करें। ये बातें वर्ल्ड हार्ट फेडरेशन के अध्यक्ष और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जगत नरूला ने इंदौर में कहीं। प्रेस क्लब में मीडिया से बातचीत के दौरान हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. ए.के. पंचोलिया, सीएसआई इंदौर के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप गुप्ता और उपाध्यक्ष डॉ. राकेश जैन भी मौजूद थे। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनियाभर में हर साल करीब 2 करोड़ लोगों की मौत हृदय संबंधी बीमारियों से होने का अनुमान है। यह वैश्विक मौतों का लगभग 33 प्रतिशत है। इनमें से अधिकांश मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। डॉ. नरूला के अनुसार, जीवनशैली में बदलाव और समय पर सतर्कता से हृदय रोगों और स्ट्रोक के लगभग 80 प्रतिशत असामयिक मामलों को रोका जा सकता है। पहले 50–60 की उम्र में चिंता, अब 20–40 साल के मरीज भी डॉ. राकेश जैन के अनुसार, अब कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक के मामले सामने आ रहे हैं। हार्ट अटैक के लगभग हर पांच में से एक मरीज की उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच होती है। किसी व्यक्ति को मधुमेह, उच्च रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो सकती है, लेकिन लंबे समय तक स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। कुछ लोगों में धमनियों में प्लाक जमा होने की प्रक्रिया भी वर्षों तक बिना स्पष्ट संकेत के चल सकती है। जब रक्त प्रवाह गंभीर रूप से बाधित होता है, तब हार्ट अटैक जैसी आपात स्थिति सामने आ सकती है। ऑफिस की कुर्सी से प्लेट तक डॉ. राकेश जैन ने बताया कि आज बहुत से लोग दिनभर ऑफिस में बैठकर काम करते हैं और व्यस्तता के कारण नियमित व्यायाम के लिए समय नहीं निकाल पाते। भोजन के मामले में भी घर के खाने की जगह कैंटीन, रेस्तरां और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर निर्भरता बढ़ रही है। समस्या केवल बाहर खाना खाने की नहीं है, बल्कि भोजन की गुणवत्ता और मात्रा भी महत्वपूर्ण है। अधिक नमक, चीनी, अस्वास्थ्यकर वसा और कैलोरी वाला भोजन वजन बढ़ने, रक्तचाप बिगड़ने तथा रक्त में शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि कम रहने और जरूरत से अधिक कैलोरी लेने से मोटापे का खतरा बढ़ता है। इसके साथ इंसुलिन प्रतिरोध और टाइप-2 मधुमेह जैसी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं। ये सभी हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। प्रदूषण, प्लास्टिक और मोटापा धमनियों में चुपचाप बढ़ती रुकावट डॉ. नरूला ने अपने वैज्ञानिक शोध और मेडिकल इमेजिंग के अनुभव के संदर्भ में बताया कि बीमारी को समझने के लिए शरीर में होने वाले बदलावों को शुरुआती स्तर पर पहचानना महत्वपूर्ण है। हृदय को रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियों की दीवारों में समय के साथ वसा, कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थों से प्लाक बन सकता है। इस प्रक्रिया को एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। प्लाक बढ़ने से रक्त प्रवाह प्रभावित हो सकता है। यदि प्लाक फट जाए और वहां खून का थक्का बन जाए, तो धमनी अचानक बंद हो सकती है और हार्ट अटैक हो सकता है। शोध में बीमारी का बोझ डॉ. नरूला ने बताया कि उनके शुरुआती वैज्ञानिक शोध का केंद्र बीमारी के पीछे मौजूद आणविक पैटर्न और जैविक प्रक्रियाओं को समझना था। अमेरिका में काम करने के दौरान उनके दृष्टिकोण में बदलाव आया। उन्हें समझ में आया कि वैज्ञानिक खोज का महत्व केवल प्रयोगशाला में नई जानकारी हासिल करना नहीं, बल्कि यह जानना भी है कि बीमारी समाज के किन वर्गों को सबसे अधिक प्रभावित करती है। कम आय वाले समुदायों में स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, नियमित जांच का अभाव, इलाज की लागत और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की कमी जैसी समस्याएं बीमारी का बोझ बढ़ा सकती हैं। हृदय रोगों के मामले में भी समय पर पहचान और इलाज तक पहुंच बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्राचीन ममियों और समकालीन समुदायों में एथेरोस्क्लेरोसिस से संबंधित शोध का उल्लेख करते हुए बीमारी की उत्पत्ति और उसके विकास को समझने के महत्व पर बात की। इन अध्ययनों से पता चलता है कि धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया केवल आधुनिक जीवनशैली की उपज नहीं है। हालांकि, आज की जीवनशैली और पर्यावरणीय परिस्थितियां इसके जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।