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पत्थर शिल्प का 11 करोड़ का कारोबार:ग्वालियर के 200 कारीगरों की कला फ्रांस, स्पेन और दुबई तक पहुंची
ग्वालियर का पत्थर शिल्प देश ही नहीं, विदेशों में भी पहचान बना रहा है। स्थानीय पत्थर से देवी-देवताओं की मूर्तियों से लेकर फाइन आर्ट तैयार किए जा रहे हैं। शहर के करीब 200 कारीगर इस काम से जुड़े हैं और इससे हर साल करीब 11 करोड़ रुपए का कारोबार होने का अनुमान है। इन कलाकृतियों की मांग फ्रांस, स्पेन और दुबई जैसे देशों तक पहुंच रही है। मजबूत पत्थर में बारीक डिजाइन करना आसान राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मूर्तिकार दीपक विश्वकर्मा के अनुसार, ग्वालियर के पत्थर की खासियत इसकी मजबूती और बारीक रेशा है। यह पत्थर पानी कम सोखता है, जिससे इससे बनी मूर्तियां लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं। पत्थर में बारीक रेशे होने के कारण कारीगर मूर्तियों में जेवर, चेहरे की भाव-भंगिमा और दूसरे बारीक डिजाइन साफ तरीके से उकेर पाते हैं। ऐतिहासिक धरोहरों में भी दिखती है पत्थर की मजबूती दीपक विश्वकर्मा के मुताबिक, ग्वालियर के पत्थर की मजबूती का प्रमाण यहां की ऐतिहासिक धरोहरों में भी मिलता है। तानसेन का मकबरा, ग्वालियर किला और मोती-महल की बारीक जालियां इसकी मजबूती को दिखाती हैं। पड़ावली और मितावली के प्राचीन मंदिरों की मूर्तियां भी सैकड़ों-हजारों साल बाद सुरक्षित हैं। ये इस पत्थर के टिकाऊपन का उदाहरण हैं। फाइबर की मूर्तियों के बीच पत्थर की मांग बरकरार फाइबर की मूर्तियों का चलन बढ़ने के बावजूद पत्थर की प्रतिमाओं की मांग कम नहीं हुई है। फाइन डिटेलिंग और मजबूती के कारण कई जगहों पर इनकी मांग बनी हुई है। कारीगरों को विदेशों से भी लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं। फ्रांस में महाराजा रंजीत सिंह की प्रतिमा और पेरिस के 'मेट्रो गाइड' रोड स्टेशन पर प्रदर्शित कलाकृतियां ग्वालियर की मूर्तिशिल्प कला की विदेशों तक पहुंच का उदाहरण हैं।