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संत सिंगाजी धाम में शरद पूर्णिमा पर आस्था का सैलाब:लाखों श्रद्धालुओं ने टेका मत्था, समाधि स्थल पर देशी घी चढ़ाने की परंपरा
खंडवा निमाड़ के आराध्य निर्गुणी संत सिंगाजी महाराज के समाधिस्थल पर आज रविवार को शरद पूर्णिमा के अवसर पर आस्था का सैलाब उमड़ रहा है। खंडवा से करीब 45 किलोमीटर दूर इंदिरा सागर बांध के बैकवाटर में बने टापू पर स्थित संत सिंगाजी धाम में श्रद्धालुओं और निशान यात्राओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है। शनिवार को ही करीब 50 हजार श्रद्धालु समाधि पर मत्था टेक चुके हैं। आज शरद पूर्णिमा के मुख्य पर्व पर 2 से 3 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। संत सिंगाजी महाराज के प्रति श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। मान्यता के अनुसार, भक्त यहां मन्नत मांगते हैं और समाधि पर देशी घी व नारियल अर्पित करते हैं। शरद पूर्णिमा पर मध्यप्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों के साथ आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। परंपरा के अनुसार, झाबुआ राजघराने सहित विभिन्न स्थानों से संत सिंगाजी महाराज के लिए निशान लाए जाते हैं। निशान चढ़ाने के साथ विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती होती है। धाम परिसर को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है। मुख्य पर्व पर दिनभर दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला चलेगा। चांदनी रात में विशेष पूजा-अर्चना, रातभर रहेगी रौनक शरद पूर्णिमा पर संत सिंगाजी धाम में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। रविवार को भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना की परंपरा के साथ समाधिस्थल पर भी विशेष अनुष्ठान किए जाएंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों का विशेष महत्व है। इसी मान्यता के चलते श्रद्धालु इस पर्व पर धाम पहुंचकर दर्शन करते हैं। मेले में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से दिनभर धार्मिक माहौल बना रहेगा। झाबुआ राजघराने के निशान का विशेष महत्व संत सिंगाजी मेले में निशान चढ़ाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। झाबुआ राजघराने सहित अलग-अलग स्थानों से श्रद्धालु निशान लेकर धाम पहुंचते हैं। भक्तों के लिए निशान केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि संत के प्रति आस्था और परंपरा का हिस्सा हैं। निशान यात्राओं के आने का सिलसिला जारी है। श्रद्धालु निशान अर्पित करने के बाद समाधि के दर्शन कर रहे हैं। 458 साल पुरानी समाधि, बांध बनने के बाद टापू पर स्थापित संत सिंगाजी महाराज को निमाड़ के प्रमुख निर्गुणी संतों में माना जाता है। उनकी समाधि करीब 458 साल पुरानी बताई जाती है। पहले समाधिस्थल सिंगाजी गांव के मैदान में था, लेकिन इंदिरा सागर बांध बनने के बाद पुराना स्थान डूब क्षेत्र में आ गया। इसके बाद समाधिस्थल को बांध के बैकवाटर में बने टापू पर स्थापित किया गया। अब हर साल शरद पूर्णिमा पर यहां पारंपरिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। 10 दिन तक चलता है मेला, देशी घी और नारियल चढ़ाते हैं भक्त संत सिंगाजी मेले का आयोजन करीब 10 दिनों तक होता है। हालांकि, शरद पूर्णिमा का दिन सबसे खास माना जाता है। इस दिन समाधि के दर्शन के लिए सबसे अधिक भीड़ उमड़ती है। श्रद्धालु अपनी मन्नत के अनुसार देशी घी और नारियल अर्पित करते हैं। देशी घी चढ़ाने की परंपरा के कारण मेले में बड़ी मात्रा में घी एकत्र होता है। पूर्व के आयोजनों में यहां कई क्विंटल घी अर्पित किया जा चुका है। भक्तों की आस्था और वर्षों पुरानी परंपराओं के कारण संत सिंगाजी धाम निमाड़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। खंडवा से 45 किमी दूर है धाम संत सिंगाजी महाराज का समाधिस्थल खंडवा जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित है। इंदिरा सागर बांध के बैकवाटर में बने टापू तक पहुंचकर श्रद्धालु समाधि के दर्शन करते हैं। शरद पूर्णिमा के अवसर पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए मेले में दिनभर चहल-पहल बनी हुई है। शनिवार से शुरू हुआ श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला रविवार को मुख्य पर्व पर और तेज हो गया है। निशान यात्राओं और भक्तों के आगमन के साथ पूरा धाम संत सिंगाजी महाराज की भक्ति में सराबोर है। ग्राफिक्स के जरिए जानिए संत सिंगाजी के बारे में…