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मंदसौर में गोगा नवमी पर रात में निकला भव्य जुलूस:वाल्मीकि समाज की 10 छड़ियां और झांकियां शामिल, हजारों श्रद्धालु सुबह पशुपतिनाथ गोगामेड़ी पहुंचे
मंदसौर में गोगा नवमी के मौके पर शनिवार रात वाल्मीकि समाज ने एक जुलूस निकाला। यह जुलूस जाहरवीर गोगाजी चौहान के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में निकाला गया। इसमें शहर के अलग-अलग इलाकों से 10 छड़ियां और कई झांकियां शामिल थीं। गांधी चौराहे से रात करीब 12:30 बजे शुरू हुआ यह जुलूस सुबह पशुपतिनाथ मंदिर स्थित गोगामेड़ी पहुंचकर खत्म हुआ। डीजे की धुन पर समाज के लोग भक्ति में झूमते दिखे और हजारों श्रद्धालु इसमें शामिल हुए। जुलूस गांधी चौराहे से शुरू होकर बड़े बालाजी मंदिर, नेहरू बस स्टैंड, भारत माता चौराहा, घंटाघर, सदर बाजार, मंडी गेट और वीर सावरकर पुलिया होते हुए पशुपतिनाथ पहुंचा। पूरी रात शहर में गोगाजी महाराज के जयकारे गूंजते रहे। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने जुलूस का स्वागत भी किया।
अलग-अलग इलाकों से कुल 10 छड़ियां शामिल
गोगा नवमी के इस जुलूस में मदारपुरा, देहली गेट और खानपुरा सहित शहर के अलग-अलग इलाकों से कुल 10 छड़ियां शामिल हुईं। इनमें खानपुरा क्षेत्र से दो छड़ियां थीं। समाज के लोगों ने इन छड़ियों को गोगाजी महाराज के निशान के तौर पर जुलूस में शामिल किया। छड़ियों के साथ बड़ी संख्या में समाज के लोग और श्रद्धालु जुलूस में मौजूद थे। कार्यक्रम के दौरान चौधरी नरेश परमार ने कहा कि गोगा नवमी का मकसद सनातन परंपरा के 'सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया' के भाव को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया में शांति और समृद्धि बनी रहे। उन्होंने नेपाल की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान वहां के लोगों को इस मुश्किल हालात से निकलने का आशीर्वाद दें और प्रकृति भी उनका साथ दे। समाज के लोगों के मुताबिक, गोगा नवमी जाहरवीर गोगाजी चौहान के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। लोक मान्यताओं के अनुसार, गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा में हुआ था। उन्हें वीरता, शौर्य और धर्म की रक्षा के प्रतीक के तौर पर पूजा जाता है। राजस्थान सरकार के सांस्कृतिक स्रोतों में भी गोगाजी को लोकदेवता एवं ऐतिहासिक योद्धा बताया गया है। उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को माना जाता है। समाज की मान्यता के अनुसार गोगाजी ने धर्म, धरती और गोमाता की रक्षा के लिए युद्धभूमि में अपने प्राणों की आहुति दी थी। उनकी वीरता और त्याग की स्मृति में आज भी गोगा नवमी पर छड़ी और निशान की परंपरा निभाई जाती है। 1100 साल बाद भी निभाई जा रही छड़ी की परंपरा
समाजजनों ने बताया कि गोगाजी से जुड़ी परंपराओं में छड़ी का विशेष महत्व है। वाल्मीकि समाज इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहा है। गोगाजी को कई क्षेत्रों में जाहरवीर, गोगा पीर और गोगा महाराज के नाम से भी पूजा जाता है। गोगामेड़ी, राजस्थान में स्थित उनका प्रमुख धार्मिक स्थल है, जहां गोगा नवमी के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। गोगा नवमी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। लोकमान्यता में गोगाजी को सर्पों से रक्षा करने वाले लोकदेवता के रूप में भी पूजा जाता है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश सहित कई क्षेत्रों में गोगाजी की विशेष आस्था है। गोगामेड़ी में हर वर्ष भाद्रपद के दौरान बड़ा धार्मिक आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।