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झारखंड का यह गांव नशे को इस तरह दे रहा मात, तिलकागढ़ की कहानी हर किसी के लिए सीख

जमशेदपुर : शहरों और गांवों में बढ़ते नशे के कारोबार के बीच जमशेदपुर का एक गांव नई मिसाल पेश कर रहा है. करीब 500 घरों और 2000 की आबादी वाले जमशेदपुर प्रखंड के परसुडीह क्षेत्र के तिलकागढ़ गांव में शराब की खरीद-बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है. सबसे खास बात यह है कि यहां शराबबंदी किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि ग्रामीणों के सामूहिक संकल्प से लागू है. यही वजह है कि यह गांव आज नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता का एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है.
शराब की खरीद-बिक्री पर ग्रामीणों का सामूहिक फैसला
तिलकागढ़ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि शराबबंदी केवल कागज या घोषणा तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इसे सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में निभाते हैं. गांव में शराब खरीदना और बेचना पूरी तरह मना है. ग्रामीणों का मानना है कि शराब और नशे की वजह से परिवारों में आर्थिक परेशानी, घरेलू विवाद और सामाजिक तनाव बढ़ता है. इसलिए गांव ने नशे से दूरी बनाए रखने का निर्णय लिया है. इस नियम के पालन में गांव के छोटे-बड़े सभी लोगों की भागीदारी रहती है. ग्रामीण व्यवस्था में सामूहिक निर्णय और सामाजिक अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है. यही कारण है कि तिलकागढ़ में शराबबंदी को लेकर लोगों में जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना दिखाई देती है.
पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी की दूरदर्शी सोच का असर
तिलकागढ़ में शराबबंदी की इस व्यवस्था के पीछे पूर्व सांसद कृष्णा मार्डी की दूरदर्शी सोच को भी महत्वपूर्ण माना जाता है. उनका मानना रहा है कि गांव और समाज की वास्तविक तरक्की तभी संभव है, जब युवा नशे से दूर रहकर शिक्षा, खेल, रोजगार, सामाजिक सेवा और अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में आगे बढ़ें. युवाओं को नशे से बचाकर उन्हें बेहतर भविष्य की ओर ले जाना ही समाज को मजबूत बनाने का रास्ता है. इसी सोच ने ग्रामीणों को नशे के खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रेरित किया. गांव के लोग चाहते हैं कि यहां के युवा अपने हुनर और मेहनत के दम पर हर क्षेत्र में पहचान बनाएं तथा गांव के साथ-साथ समाज और देश का नाम रोशन करें.
बाबा तिलका माझी क्लब संभालती है गांव की व्यवस्था
गांव में सामाजिक नियमों और सामुदायिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए एक कमेटी गठित की गई है, जिसका नाम बाबा तिलका माझी क्लब है. इस कमेटी में गांव के सभी लोग सदस्य हैं. यानी गांव की व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर आधारित है. कमेटी सामाजिक गतिविधियों, ग्रामीण एकता और नियमों के पालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसके संचालन में रामचंद्र टुडू और घासीराम मुर्मू जैसे बुद्धिजीवी अहम योगदान देते हैं. दोनों ग्रामीणों को जागरूक करने और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं. कमेटी का उद्देश्य केवल शराबबंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में आपसी एकता, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना भी है.
बाबा तिलका माझी के आदर्शों पर आगे बढ़ रहा गांव
तिलकागढ़ गांव की सामाजिक व्यवस्था बाबा तिलका माझी के आदर्शों से प्रेरित है. ग्रामीणों का मानना है कि समाज की मजबूती एकता, आत्मसम्मान और सामूहिक जिम्मेदारी से आती है. यही सोच गांव की युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. नशे से दूर रहकर शिक्षा, रोजगार, खेल और सामाजिक गतिविधियों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जाता है. शहर में जहां नशे की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है, वहीं तिलकागढ़ की शराबबंदी और सामुदायिक व्यवस्था यह संदेश देती है कि यदि ग्रामीण एकजुट होकर संकल्प लें तो सामाजिक बुराइयों पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है. करीब 2000 की आबादी वाला यह गांव आज नशे के खिलाफ सामूहिक इच्छाशक्ति और सामाजिक अनुशासन की मिसाल बन रहा है. तिलकागढ़ की पहल दूसरे गांवों और शहरी बस्तियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है कि नशे के खिलाफ केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी.