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Form 6 विवाद: चुनाव आयोग ने वापस लिया अपना फैसला, नए मतदाताओं के फॉर्म से अलग हुआ SIR घोषणा पत्र

INT News4 November 2026 at 10:57 am

Form 6 Controversy: भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन Form 6 में बड़ा नीतिगत बदलाव किया है. आयोग ने अपने आधिकारिक पोर्टल 'ECINet' पर Form 6 के साथ अनिवार्य रूप से जोड़े गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े घोषणा पत्र (Declaration) को अब पूरी तरह अलग कर दिया है. यह व्यवस्था उन राज्यों में भी लागू कर दी गई है, जहां SIR की प्रक्रिया वर्तमान में चल रही है. इस कदम के साथ ही Form 6 के प्रारूप को लेकर आयोग के भीतर और बाहर उठा विवादित फैसला पूरी तरह पलट गया है.

क्या था SIR घोषणा पत्र और इस पर क्यों हुआ विवाद?

ऑनलाइन Form 6 में सेक्शन J और K के बीच एक अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया था. इसमें नए आवेदक के लिए तीन में से किसी एक विकल्प को चुनना अनिवार्य कर दिया गया था:

आवेदक का नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुई पिछली SIR मतदाता सूची में दर्ज था.

आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी सूची में शामिल था.

न तो आवेदक का और न ही उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR सूची में था.

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इस सवाल का जवाब दिए बिना ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म जमा (सबमिट) करना तकनीकी रूप से असंभव था. आलोचकों और कानूनी जानकारों का तर्क था कि यह शर्त नए वोटरों के लिए गैर-जरूरी बाधा खड़ी कर रही थी. अब आयोग के ताजा आदेश के बाद यह घोषणा Form 6 का अनिवार्य हिस्सा न होकर एक अलग दस्तावेज के रूप में उपलब्ध रहेगी.

दो चुनाव आयुक्तों ने बताया था 'गैरकानूनी और अनधिकृत'

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के दो चुनाव आयुक्तों, विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू, ने इस संशोधन पर तीखी आपत्तियां दर्ज कराई थीं.

16 मई को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी आधिकारिक टिप्पणी में स्पष्ट किया था कि बिना वैधानिक कानूनी संशोधन के Form 6 के मूल प्रारूप में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता.

इसके बाद 13 अगस्त को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को सीधे तौर पर ‘अनधिकृत और गैरकानूनी’ करार देते हुए इसे तत्काल प्रभाव से हटाने के निर्देश दिए थे.

दोनों आयुक्तों का वैधानिक तर्क था कि Form 6 का प्रारूप ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ (Registration of Electors Rules, 1960) के तहत तय है. नियमों के अनुसार, इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव या संशोधन करने का वैधानिक अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग अपने स्तर पर इसका प्रारूप नहीं बदल सकता.

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सुप्रीम कोर्ट में आयोग का हलफनामा: 6 सप्ताह में 3 बार बदला रुख

चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में जानकारी दी कि उसकी इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने 21 अक्टूबर को इस घोषणा पत्र को Form 6 से अलग करने का अंतिम फैसला लिया.

आयोग ने अदालत में सफाई दी कि दोनों दस्तावेजों को एक साथ रखने का मकसद केवल प्रक्रिया को आसान बनाना था, ताकि आवेदक एक ही OTP और सिंगल ई-सिग्नेचर से पूरी प्रक्रिया पूरी कर सकें; अलग रखने पर दो OTP और दो ई-हस्ताक्षर की आवश्यकता पड़ती. व्यापक विचार-विमर्श और प्राप्त सुझावों के बाद अब इन्हें अलग कर दिया गया है.

गौरतलब है कि पिछले छह हफ्तों के दौरान आयोग ने इस मुद्दे पर तीन बार अपना रुख बदला:

शुरुआती विरोध के बाद लागू

मई में दोनों आयुक्तों की असहमति के बावजूद जुलाई में इसे ऑनलाइन पोर्टल से जोड़ा गया.

26 सितंबर का फैसला

विवाद बढ़ने पर 26 सितंबर की पूर्ण आयोग बैठक के बाद तय किया गया कि जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां से इसे हटा दिया जाए, लेकिन जहां SIR जारी है, वहां यह लागू रहेगा.

अक्टूबर में पूर्ण वापसी

12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने संशोधित Form 6 को कोई कानूनी हरी झंडी नहीं दी है. इसके बाद 21 अक्टूबर को आयोग ने बैकफुट पर आते हुए इसे सभी राज्यों में फॉर्म से पूरी तरह अलग कर दिया.

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10 महीने में 14 बार दर्ज हुईं आपत्तियां

आयोग की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर सामने आई जांच रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि पिछले 10 महीनों में आयुक्त संधू और जोशी ने आयोग के नाम पर लिए गए विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं. ये मामले मुख्य रूप से मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने व जोड़ने, अपीलों की प्रक्रिया और आईटी सॉफ्टवेयर के संचालन से संबंधित थे. इनमें से पांच आपत्तियां सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भेजी गई थीं.

इसके अलावा 28 जुलाई को जारी एक प्रशासनिक आदेश—जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारियों के कार्य आवंटन और आईटी फाइलों का नियंत्रण बदला गया था—पर भी दोनों आयुक्तों ने कड़ा ऐतराज जताया और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा, जिसके बाद अगले ही दिन उस आदेश को संयुक्त रूप से रद्द करना पड़ा था.

प्रशासनिक कार्यप्रणाली और बैठकों के नियमों में सुधार

आंतरिक मतभेदों के बाद आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में कई बड़े सुधार लागू किए हैं:

बैठकों का आधिकारिक एजेंडा अब पहले से सभी सदस्यों के साथ साझा किया जाएगा और बैठक के बाद विस्तृत कार्यवृत्त (मिनट्स) जारी होंगे.

आयोग के अधिकारियों की किसी भी विदेश यात्रा के लिए अब आयोग की पूर्व औपचारिक मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है.

नए IT सिस्टम और ECINet का स्वतंत्र ऑडिट

महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के अधीन तैयार होने वाले सभी नए आईटी मॉड्यूल अब पहले वरिष्ठ अधिकारियों की समिति और फिर आयोग की मंजूरी के बाद ही लागू होंगे.

14 अक्टूबर को एक उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का गठन किया गया, जो 'ECINet' सॉफ्टवेयर के वैधानिक नियमों के अनुपालन की जांच करेगी. इस समिति में वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त, चार राज्यों के सीईओ और आईआईटी बॉम्बे व आईआईएससी बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हैं.

यह कदम दोनों आयुक्तों द्वारा मतदाता सूची डेटाबेस के अत्यधिक केंद्रीकरण पर जताई गई चिंताओं के बाद उठाया गया है.

फील्ड अफसरों को अधिकार और नए मतदाता अभियान

महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की सिफारिशों के आधार पर ECINet में सुधार कर फील्ड स्तर के अधिकारियों (ERO और DEO) को अधिक अधिकार दिए गए हैं. अब मामूली तकनीकी त्रुटियों के लिए मतदाताओं की व्यक्तिगत पेशी अनिवार्य नहीं होगी और बीएलओ घर जाकर दस्तावेज ले सकेंगे.

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वहीं, गोवा में ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 97 वैध मतदाताओं के नाम सॉफ्टवेयर की तकनीकी बाधा के कारण रुकने का मामला सामने आने के बाद उन्हें भी राहत दी गई है; इनमें से 88 लोगों के Form 6 स्वीकार कर लिए गए हैं. इसके साथ ही आयोग ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर शुरू किया है, ताकि 2027 में 18 वर्ष के होने वाले युवाओं को बिना किसी अतिरिक्त घोषणा पत्र के आसानी से मतदाता सूची में जोड़ा जा सके.