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जानिए कौन हैं अयोध्या के रितेश मिश्रा, 3000 से ज्यादा लावारिस शवों का करा चुके हैं अंतिम संस्कार, धर्म से ज्यादा इंसानियत को देते हैं महत्व

Ayodhya News : अयोध्या के रितेश मिश्रा की कहानी इंसानियत की ऐसी मिसाल है, जहां धर्म और पहचान से पहले इंसान मायने रखता है. पिछले कई वर्षों से रितेश उन लावारिस शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठा रहे हैं, जिनका कोई अपना सामने नहीं आता. अब तक वह 3000 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करा चुके हैं. खास बात यह है कि उनकी यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है. सड़क, रेलवे स्टेशन, अस्पताल या किसी दूसरी जगह जब कोई लावारिस शव मिलता है और उसके परिजनों का पता नहीं चल पाता, तो रितेश आगे आकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं. उनका प्रयास रहता है कि हिंदू व्यक्ति के शव का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज और मुस्लिम व्यक्ति के शव को मुस्लिम परंपरा के अनुसार सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाए.
मौत के बाद हर इंसान सम्मान का हकदार
रितेश का कहना है कि मौत के बाद हर इंसान सम्मान का हकदार है. जिस व्यक्ति की जिंदगी में उसका अपना कोई नहीं बचा, उसकी मृत्यु के बाद भी उसे अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए. इसी सोच के साथ वह वर्षों से इस सेवा में जुटे हुए हैं. रितेश का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है. उन्होंने बताया कि जब वह करीब चार साल के थे, तभी से नागेश्वर नाथ मंदिर की सेवा से जुड़ गए थे. इसी दौरान उनके पिता का निधन हो गया. पिता के निधन के बाद उन्होंने खुद को मंदिर की सेवा और भोलेनाथ की भक्ति में समर्पित कर दिया. बचपन से ही उन्होंने समाज में बेसहारा लोगों की स्थिति को करीब से देखा.
एक लावारिस शव ने बदल दी सोच
रितेश बताते हैं कि एक बार उन्होंने एक लावारिस शव देखा. उनके मन में सवाल उठा कि जब इस व्यक्ति का कोई अपना नहीं है, तो इसके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी कौन उठाएगा. लोगों की उदासीनता देखकर उन्होंने समाज के लिए कुछ करने का फैसला किया. धीरे-धीरे यही सोच उनकी जिंदगी का उद्देश्य बन गई. इसके बाद उन्होंने लावारिस शवों को सम्मानजनक अंतिम विदाई दिलाने की सेवा शुरू कर दी.
हिंदू-मुस्लिम दोनों के शवों को देते हैं अंतिम विदाई
रितेश के मुताबिक, अब तक वह करीब 3000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करा चुके हैं. इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग शामिल रहे हैं. उनका प्रयास रहता है कि हर व्यक्ति को उसके धर्म और परंपरा के अनुसार सम्मानजनक अंतिम विदाई मिले. रितेश की यह पहल स्थानीय स्तर पर सराहना का विषय बनी हुई है. बिना किसी स्वार्थ और भेदभाव के वर्षों से की जा रही उनकी यह सेवा इंसानियत, भाईचारे और आपसी सम्मान का संदेश देती है. रितेश का मानना है कि जिंदगी में इंसान की पहचान चाहे कुछ भी हो, लेकिन मृत्यु के बाद उसकी अंतिम विदाई सम्मान के साथ होना जरूरी है. इसी सोच के साथ वह आज भी उन लोगों के लिए खड़े हैं, जिनका इस दुनिया में अंतिम समय में कोई अपना साथ देने वाला नहीं होता.
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