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एजुकेशन रिफॉर्म से कितनी बदलेगी बिहार की शिक्षा व्यवस्था? जानें कितना तैयार है मौजूदा सिस्टम

देशभर में शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और इससे जुड़े दूसरे मुद्दों को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है. इन सबके बीच बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिक्षा विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय चिंतन शिविर में राज्य में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने कई नई योजनाओं का ऐलान किया है. इनमें AI के जरिए छात्रों की क्षमता का आकलन, रात 11 बजे तक छात्रों की मदद, छात्रों की समस्याओं के लिए विशेष कैंप और 1,001 मॉडल स्कूल बनाने जैसी योजनाएं शामिल हैं.
लेकिन इन घोषणाओं के बीच सवाल यह है कि इनमें वास्तव में नया क्या है? मौजूदा व्यवस्था में छात्रों को जो सुविधाएं पहले से मिल रही हैं, उनसे ये नई योजनाएं कितनी अलग हैं? साथ ही, यह समझना भी जरूरी है कि इन योजनाओं को जमीन पर लागू करना कितना आसान होगा.
पहले समझिए सरकार के नए वादे और मौजूदा व्यवस्था में क्या अंतर है?
सरकार की कई घोषणाएं पूरी तरह जीरो से शुरू होने वाली व्यवस्था नहीं हैं, बिहार में पहले से ही शिकायतों के निपटारे, विभागीय कामकाज और शिक्षा से जुड़ी कई डिजिटल सेवाएं उपलब्ध हैं.
इन्फोग्राफिक से यह साफ पता चलता है कि सवाल यह नहीं है कि बिहार में डिजिटल व्यवस्था आएगी या नहीं, बल्कि यह है कि सरकार की नई योजनाएं मौजूदा डिजिटल सिस्टम को कितना बेहतर, आसान और स्टुडेंट सेंटरिक बना पाएंगी. इसलिए ये जानना भी जरूरी है कि सरकार के इस नए घोषणा में क्या नया है और क्या पुराना.
मौजूदा व्यवस्था में छात्र कहां करते है शिकायत और नया क्या बदलेगा?
बिहार में छात्रों की शिकायतों के लिए पहले से पोर्टल, हेल्पलाइन और लोक शिकायत व्यवस्था मौजूद है.
छात्र अपनी समस्या के आधार पर अलग-अलग आधिकारिक पोर्टल और हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं. स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के लिए अलग व्यवस्थाएं हैं. इसके अलावा बिहार लोक शिकायत निवारण (BPGRS) और सहयोग पोर्टल भी मौजूद हैं.
बिहार का लोक शिकायत निवारण सिस्टम 2016 से चल रहा है, जहां आम नागरिक शिकायत दर्ज कर उसकी स्थिति ऑनलाइन देख सकते हैं. पोर्टल के अनुसार अब तक 20 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुई हैं, जिनमें करीब 97.6% के निस्तारण का आंकड़ा दिया गया है. हालांकि, इनमें छात्रों की शिकायतों का अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.
सरकार अब Student Cooperation Camps के जरिए छात्रों की समस्याएं सीधे मंत्री, विधायक और अधिकारियों तक पहुंचाने की बात कर रही है. यानी जोर सिर्फ ऑनलाइन शिकायत पर नहीं, बल्कि सीधे संवाद और जल्दी समाधान पर होगा.
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नए डिजिटल एजुकेशन में छात्रों को क्या नया मिलेगा?
नई घोषणा के तहत सरकार ने 15 अगस्त से one-to-one online teaching system शुरू करने की बात कही है. इसके तहत छात्र रात 11 बजे तक ऑनलाइन शिक्षक से पढ़ाई से जुड़ी मदद ले सकेंगे. हालांकि, बिहार में डिजिटल एजुकेशन का आधार पहले से मौजूद है.
शिक्षा विभाग का e-LOTS (e-Library of Teachers and Students) कक्षा 1 से 12 तक के छात्रों के लिए डिजिटल लर्निंग कंटेंट उपलब्ध कराता है. इसमें किताबों के साथ-साथ पढ़ाई से जुड़ी दूसरी डिजिटल सामग्री भी मौजूद है.
मौजूदा व्यवस्था में छात्रों को मुख्य रूप से Digital Content उपलब्ध कराया जाता है. नई व्यवस्था में छात्र जरूरत पड़ने पर सीधे ऑनलाइन शिक्षक से व्यक्तिगत मदद ले सकेगा. यानी बदलाव Digital Content से Personal Academic Support का है.
इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि छात्रों की मांग के मुकाबले कितने शिक्षक उपलब्ध हैं.
लॉन्च के बाद इन आंकड़ों पर भी नजर होगी कि कितने छात्रों ने शिक्षक से मदद मांगी? कितने छात्रों को वास्तव में one-to-one सहायता मिली? एक शिक्षक कितने छात्रों की मदद कर पाया?
यानी योजना की सफलता सिर्फ इसके लॉन्च होने से नहीं, बल्कि छात्र को जरूरत के समय कितनी जल्दी और कितनी व्यक्तिगत मदद मिलती है, इससे तय होगी.
कंप्यूटर और इंटरनेट तक पहुंच सबसे बड़ी चुनौती
सरकार कंप्यूटर एजुकेशन और AI पर जोर दे रही है. लेकिन बिहार में इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा अभी भी एक बड़ी चुनौती है.
UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक बिहार के 38,355 सरकारी स्कूलों, जहां कक्षा VI और उससे ऊपर की पढ़ाई होती है, वहां सिर्फ 7,240 यानी 18.9% स्कूलों में ICT Lab और 9,360 यानी 24.4% स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम की सुविधा है. हालांकि इन 38,355 में 32,923 यानी 85.8% स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध है.
इन आंकड़ों से एक अहम तस्वीर सामने आती है, कई स्कूलों तक इंटरनेट तो पहुंच गया है, लेकिन कंप्यूटर-बेस्ड लर्निंग के लिए जरूरी सुविधाएं अभी काफी पीछे हैं.
हालांकि अगर बिहार के सभी सरकारी स्कूलों को जोड़कर देखें, तो 2024-25 में सिर्फ 25.2% स्कूलों में कंप्यूटर फैसिलिटी थी, जबकि देश का यह औसत 64.7% था. यानी की इस मामले में बिहार अभी बहुत पीछे है.
ऐसे में जब सरकार कहती है कि शुरुआती स्तर से कंप्यूटर एजुकेशन को मजबूत किया जाएगा, तो सवाल सिर्फ सिलेबस का नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर का भी है.
क्या हर स्कूल में पर्याप्त कंप्यूटर होंगे? क्या उन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक होंगे? क्या बिजली और इंटरनेट लगातार उपलब्ध रहेगा? और सबसे अहम, क्या छात्रों को नियमित तौर पर कंप्यूटर पर प्रैक्टिकल करने का मौका मिलेगा?
इन सवालों का जवाब जरूरी है. क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किए बिना कंप्यूटर एजुकेशन का दायरा कागज पर तो बढ़ सकता है, लेकिन छात्रों की वास्तविक डिजिटल स्किल्स में उतना बदलाव आना मुश्किल होगा.
एआई से परीक्षा और व्यवस्था में टेक्नोलॉजी की एंट्री
सरकार परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए एक अलग समिति बनाने और एआई के इस्तेमाल की बात कर रही है. यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब बिहार समेत देशभर में परीक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों का भरोसा एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है.
हालांकि, परीक्षा व्यवस्था में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पूरी तरह नया नहीं है. BPSC की मौजूदा व्यवस्था में ऑनलाइन एप्लीकेशन, ओटीआर, एग्जाम कैलेंडर और डिजिटल नोटिस जैसी सुविधाएं पहले से मौजूद हैं. यानी परीक्षा प्रक्रिया में टेक्नोलॉजी की एंट्री पहले ही हो चुकी है.
अभी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल मुख्य रूप से रजिस्ट्रेशन, एडमिट कार्ड, परीक्षा संचालन, आंसर प्रोसेसिंग और रिजल्ट जैसी चीजों में होता है. नई घोषणा में एआई को असेसमेंट यानी छात्रों की क्षमता और प्रदर्शन को समझने से जोड़ने की बात है.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि छात्र ने कितने सवाल सही किए. यह भी समझने की कोशिश होगी कि वह किसी विषय को कितना समझता है, उसकी एनालिटिकल एबिलिटी कैसी है और वह किसी प्रॉब्लम को किस तरह सॉल्व करता है.
अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो परीक्षा व्यवस्था में यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है. लेकिन इसके साथ कुछ नए सवाल भी खड़े होंगे. अगर एआई ने गलत असेसमेंट किया तो छात्र अपनी शिकायत या अपील कहां करेगा? एआई के फैसले की ह्यूमन चेकिंग कौन करेगा? और एआई के लिए इस्तेमाल होने वाला छात्रों का डाटा कितना सुरक्षित रहेगा?
इसलिए परीक्षा सुधार समिति की सफलता सिर्फ एआई लागू करने से तय नहीं होगी. इसके लिए एक्यूरेसी, ट्रांसपेरेंसी और मजबूत अपील सिस्टम भी उतना ही जरूरी होगा.
लेकिन परीक्षा व्यवस्था में AI और टेक्नोलॉजी की बात तभी असरदार होगी, जब सबसे पहले परीक्षा की बुनियादी विश्वसनीयता बनी रहे. और यहीं सवाल पेपर लीक और परीक्षा सुरक्षा का आता है.
पेपर लीक को लेकर कानून पहले, रोकथाम अब?
सरकार ने परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की बात कही है. लेकिन परीक्षा पर भरोसा सिर्फ सजा देने से नहीं बनता. असली सवाल यह है कि पेपर लीक या दूसरी गड़बड़ियों को होने से पहले रोकने के लिए सिस्टम कितना मजबूत है.
क्योंकि कानून होने के बाद भी शिकायतें कम नहीं हो रही हैं. एक परीक्षा में लाखों छात्र शामिल होते हैं. ऐसे में सुरक्षा में हुई छोटी-सी चूक का असर बड़े स्तर पर दिख सकता है.
इसलिए प्रस्तावित परीक्षा सुधार कमेटी के सामने चुनौती होगी कि पूरी परीक्षा प्रक्रिया में किस तरह बदलाव लाया जाए, ताकि पेपर लीक की संभावना पहले से ही कम हो जाए.
इसके लिए गड़बड़ी रोकने से लेकर दोषियों को पकड़ने तक पूरी व्यवस्था में सुधार करना होगा. आने वाले समय में सरकार को इससे जुड़े कुछ जरूरी आंकड़े भी सार्वजनिक करने होंगे.
इन आंकड़ों से ही पता चलेगा कि परीक्षा सुधार सिर्फ सुरक्षा के नियम बढ़ाने तक सीमित रहा या सच में पूरी परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा सुरक्षित बनाया गया.
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नए मॉडल स्कूलों से सिर्फ संख्या बढ़ेगी या पढ़ाई की गुणवत्ता भी?
सरकार ने बिहार में 1,001 मॉडल स्कूल बनाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन सिर्फ स्कूलों की संख्या बढ़ने से शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं माना जा सकता.
मॉडल स्कूल की असली परीक्षा यह होगी कि क्या यहां सामान्य सरकारी स्कूलों की तुलना में छात्रों की पढ़ाई और नतीजे बेहतर होते हैं?
सरकार ने इन स्कूलों को NEET और JEE जैसी परीक्षाओं की तैयारी से जोड़ने की बात कही है. लेकिन इसके लिए सिर्फ अच्छी बिल्डिंग बनाना काफी नहीं होगा.
जरूरत होगी Physics, Chemistry, Biology और Mathematics के अच्छे शिक्षकों की, अच्छी लैब, लाइब्रेरी, नियमित टेस्ट, डाउट सॉल्विंग की सुविधा, डिजिटल पढ़ाई के साधन और कमजोर छात्रों के लिए अतिरिक्त क्लास की.
सरकार को यह भी बताना होगा कि इन स्कूलों में कितने शिक्षक उपलब्ध हैं, कितने छात्रों को NEET/JEE की तैयारी में मदद मिली, कितने छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाएं पास की और इनका बोर्ड रिजल्ट दूसरे सरकारी स्कूलों के मुकाबले कैसा रहा.
यानी मॉडल स्कूल की सफलता की असली कसौटी स्कूलों की संख्या नहीं, बल्कि वहां मिलने वाली पढ़ाई की गुणवत्ता और छात्रों के नतीजे होने चाहिए.
स्टूडेंट वेलफेयर डिपार्टमेंट : एक और दफ्तर या बेहतर सेवा?
सरकार ने छात्रों की मदद और उनकी समस्याओं के लिए अलग स्टूडेंट वेलफेयर डिपार्टमेंट बनाने की बात कही है.
बिहार में छात्र पहले से कई योजनाओं का फायदा लेते हैं. इनमें स्कॉलरशिप, इंसेंटिव स्कीम, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड और दूसरी मदद की योजनाएं शामिल हैं. शिक्षा विभाग के सरकारी पोर्टल पर भी इन योजनाओं के लिए अलग-अलग ऑनलाइन लिंक मौजूद हैं.
यानी छात्रों की मदद की व्यवस्था बिल्कुल नए सिरे से शुरू नहीं हो रही. असली सवाल यह है कि नया डिपार्टमेंट इन अलग-अलग योजनाओं और सेवाओं को एक जगह कैसे जोड़ेगा.
मसलन, अगर किसी छात्र को स्कॉलरशिप नहीं मिली, सर्टिफिकेट में कोई दिक्कत है, कॉलेज का वेरिफिकेशन अटका हुआ है या स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड का मामला लंबित है, तो क्या उसे हर समस्या के लिए अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे?
अगर नया डिपार्टमेंट इन सभी सेवाओं को एक सिंगल छात्र सहायता व्यवस्था में बदल देता है, जहां छात्र अपनी समस्या एक जगह दर्ज करा सके और उसका समाधान भी तय समय में मिल सके, तो यह बड़ा बदलाव होगा.
लेकिन अगर नया पद और नया दफ्तर तो बन जाए, लेकिन छात्र को अपनी पुरानी समस्याओं के लिए पहले की तरह अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने पड़े, तो बदलाव सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा.
योजना नहीं, उन्हें जमीन पर उतारना है असली परीक्षा
सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए कई बड़े ऐलान किए हैं. लेकिन इनमें से कई व्यवस्थाएं पहले से किसी न किसी रूप में मौजूद हैं. इसलिए असली चुनौती नई योजनाएं शुरू करना नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था को ज्यादा बेहतर, आसान और असरदार बनाना है.
चाहे परीक्षा सुधार हो, छात्रों की शिकायतों का समाधान, डिजिटल पढ़ाई, कंप्यूटर एजुकेशन, मॉडल स्कूल या स्टूडेंट वेलफेयर डिपार्टमेंट हर योजना की सफलता का फैसला उसके नाम या बजट से नहीं, बल्कि छात्रों को मिले वास्तविक फायदे से होगा.
सरकार को यह साफ करना होगा कि आज व्यवस्था कहां खड़ी है, बदलाव के बाद इसमें कितना सुधार हुआ और उसका फायदा कितने छात्रों तक पहुंचा.
आखिर में शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा घोषणाओं की नहीं, उनके जमीन पर उतरने की होगी. और इसका सबसे भरोसेमंद सबूत आंकड़े और छात्रों के नतीजे ही देंगे.
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