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AI से घर बैठे हो सकेगी आंखों की जांच:अगले 5 साल में बढ़ेगा इस्तेमाल, विशेषज्ञ बोले- मायोपिया से बच्चों को बचाने आउटडोर एक्टिविटी जरूरी
आंखों की बीमारी का पता लगाने के लिए अब मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचने की मजबूरी कम हो सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से दूरदराज के गांवों में भी आंखों की स्क्रीनिंग और बीमारी की शुरुआती पहचान आसान बनाने की दिशा में काम हो रहा है। आने वाले 5 साल में नेत्र रोगों के डायग्नोसिस में AI का इस्तेमाल और बढ़ने की उम्मीद है।रविवार को इंदौर में मध्यप्रदेश स्टेट ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी की 49वीं वार्षिक कॉन्फ्रेंस के अंतिम दिन विशेषज्ञों ने यह बात कही। तीन दिन तक चली इस कॉन्फ्रेंस में देशभर के नेत्र रोग विशेषज्ञों ने आंखों की बीमारियों के आधुनिक इलाज, नई तकनीकों और चिकित्सा क्षेत्र में AI की भूमिका पर चर्चा की। सम्मेलन में मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों से 700 से अधिक नेत्र रोग विशेषज्ञ शामिल हुए। अंतिम दिन तकनीकी सत्रों के साथ क्विज कॉम्पिटिशन और डेमो वर्कशॉप भी आयोजित की गईं।
गांवों में घर के पास हो सकेगी आंखों की स्क्रीनिंग
AI पर आयोजित सत्र में मध्यप्रदेश स्टेट ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी की सेक्रेटरी डॉ. मिता जोशी सहित विशेषज्ञों ने मौजूदा समय में इसके इस्तेमाल और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा की। डॉ. आरएस चौधरी ने बताया कि सत्र में इस बात पर फोकस रहा कि AI की मदद से स्क्रीनिंग और बीमारी की पहचान किस तरह आसान बनाई जा सकती है। डॉ. मिता जोशी ने बताया कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले कई लोगों के लिए इलाज के लिए बड़े शहरों तक पहुंचना मुश्किल होता है। आर्थिक परेशानी भी इसमें बाधा बनती है। ऐसे में AI की मदद से मरीजों की नियमित स्क्रीनिंग उनके घर के नजदीक की जा सकती है। इससे आंखों की बीमारियों की शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है और जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि आने वाले 5 साल में बीमारी की पहचान के लिए AI का इस्तेमाल और बढ़ने की संभावना है। हालांकि, मरीज की जांच और इलाज में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
बच्चों में बढ़ रहा मायोपिया का खतरा, आउटडोर एक्टिविटी जरूरी
कॉन्फ्रेंस के तकनीकी सत्र में चेन्नई के अरविंद आई इंस्टीट्यूट से आईं डॉ. नीलम माहेश्वरी ने मायोपिया यानी दूर की चीजें साफ न दिखने की समस्या पर बात की। उन्होंने कहा कि मायोपिया होने के पीछे कोई एक कारण नहीं है। यह मल्टीफैक्टोरियल बीमारी है, यानी इसके होने में कई कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। उन्होंने बदलती लाइफस्टाइल और पर्यावरण प्रदूषण को भी इसके संभावित कारणों में शामिल बताया। बच्चों में इस समस्या को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत है। कई बार बच्चों को खुद यह पता नहीं चलता कि उनकी नजर कमजोर हो रही है, इसलिए समय पर जांच जरूरी है।
डॉ. आरएस चौधरी बने सोसायटी के नए अध्यक्ष
कॉन्फ्रेंस के अंतिम दिन मध्यप्रदेश स्टेट ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी के चुनाव भी हुए। इसमें डॉ. आरएस चौधरी को अध्यक्ष चुना गया। आयोजन समिति के डॉ. सतीश प्रेमचंदानी और डॉ. अंशु खरे ने बताया कि रविवार को कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। डॉक्टरों को CPR का डेमो भी दिया
सम्मेलन के अंतिम सत्र में एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. सुबोध चतुर्वेदी ने बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) और कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) के बारे में जानकारी दी। उन्होंने CPR करने का सही तरीका डेमो के जरिए समझाया। सम्मेलन के समापन पर पीजी स्टूडेंट्स को डॉ. रमेश कृष्णा अग्रवाल अवॉर्ड भी दिए गए।