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सीवान की सलमा खातून की कृष्ण भक्ति की अनोखी कहानी, अयोध्या में गोपाल की मूर्ति से जुड़ा मन तो वृंदावन तक खिंचा चला गया

INT News20 September 2026 at 03:44 pm

सीवान से विवेक प्रजापति की रिपोर्ट

Salma Khatoon Krishna Bhakti : धर्म और आस्था की दुनिया में कई ऐसी कहानियां होती हैं, जिनके पीछे किसी व्यक्ति के निजी अनुभव और भावनात्मक जुड़ाव की अपनी कहानी होती है. सीवान जिले के मैरवा प्रखंड के गोपालचक की रहने वाली सलमा खातून की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. मुस्लिम परिवार में जन्मीं सलमा आज भगवान कृष्ण को अपना आराध्य मानती हैं और कृष्ण भक्ति में सुकून तलाशती हैं. माला जपना, तुलसी धारण करना और राधा-कृष्ण की पूजा उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.

हालांकि, सलमा के जीवन की पहचान सिर्फ उनकी आस्था तक सीमित नहीं है. वह मैरवा की रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकादमी से जुड़ी हैं और बच्चों को खेल प्रशिक्षण भी देती हैं. उनकी जिंदगी में एक तरफ भक्ति और दूसरी तरफ खेल का मैदान है.

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अयोध्या की एक यात्रा ने बदली सोच

सलमा बताती हैं कि कृष्ण भक्ति की शुरुआत किसी योजना के तहत नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत एक यात्रा के दौरान हुई. वह पहली बार अयोध्या गयी थीं. धार्मिक परिसर में प्रवेश को लेकर उन्हें कुछ दिनों तक बाहर रहना पड़ा. इसी दौरान उनकी नजर एक दुकान पर रखी भगवान गोपाल की मूर्ति पर पड़ी.

सलमा के अनुसार, मूर्ति को देखते ही उनका ध्यान उस पर टिक गया. उन्होंने उसे हाथ में उठाया. उस समय उनके मन में उसे अपने साथ ले जाने का भाव आया. हालांकि, बाद में वह मूर्ति वहीं छोड़कर वापस लौट गयीं.

वह बताती हैं कि मूर्ति छोड़कर वहां से निकलने के बाद उनके मन में एक अजीब सा खालीपन महसूस हुआ. उन्हें लगा जैसे कोई अपना पीछे छूट गया हो. अयोध्या से लौटने के बाद भी उस मूर्ति की छवि उनके मन में बनी रही.

वृंदावन में बांके बिहारी के दर्शन के बाद बढ़ा लगाव

अयोध्या से लौटने के बाद सलमा का मन वृंदावन जाने के लिए बेचैन रहने लगा. भगवान कृष्ण से जुड़ी धार्मिक परंपराओं और वृंदावन के बारे में उनकी रुचि बढ़ती गयी.

कुछ समय बाद दिल्ली जाने का मौका मिला, तो उन्होंने अकेले वृंदावन जाने का फैसला किया. वहां पहुंचकर उन्होंने बांके बिहारी मंदिर में दर्शन किये. सलमा के अनुसार, वृंदावन का अनुभव उनके लिए बेहद भावनात्मक रहा.

दर्शन के बाद कृष्ण भक्ति के प्रति उनका लगाव और गहरा होता गया. वह बताती हैं कि भगवान कृष्ण के सामने पहुंचने पर उन्हें एक अलग तरह का सुकून महसूस होता है और रोजमर्रा की परेशानियों से उनका ध्यान हट जाता है.

‘इनके सिवा मेरा कोई नहीं है’

सलमा अपने भावनात्मक जुड़ाव को बताते हुए कहती हैं, “इनके सिवा मेरा कोई नहीं है. इनके सामने आती हूं तो सबको भूल जाती हूं.”

उनके लिए कृष्ण भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है. यह उनके निजी जीवन में सुकून और आत्मिक जुड़ाव से जुड़ा अनुभव है. वह नियमित रूप से माला जपती हैं और राधा-कृष्ण की पूजा करती हैं. तुलसी धारण करना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.

भक्ति के साथ खेल के मैदान में बच्चों को प्रशिक्षण

सलमा की जिंदगी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष खेल है. बचपन से ही खेलों में उनकी रुचि रही है. इसी रुचि ने उन्हें आगे चलकर बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित किया.

मैरवा की रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकादमी से जुड़कर वह बच्चों को खेल की बारीकियां सिखाती हैं. मैदान में वह बच्चों को नियमित अभ्यास, अनुशासन और आत्मविश्वास के लिए प्रेरित करती हैं.

उनकी दिनचर्या में एक ओर माला और कृष्ण भक्ति है, तो दूसरी ओर खेल का मैदान और बच्चों का प्रशिक्षण. दोनों ही उनके जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.

बच्चों के बीच प्रशिक्षक के रूप में अलग पहचान

स्पोर्ट्स अकादमी में बच्चों के साथ काम करते हुए सलमा की पहचान एक प्रशिक्षक के रूप में है. वह बच्चों को नियमित अभ्यास के साथ अनुशासन का महत्व समझाती हैं. उनका मानना है कि खेल केवल शारीरिक फिटनेस का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और आगे बढ़ने की भावना भी विकसित होती है.

बच्चों को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की उनकी कोशिश उनके व्यक्तित्व के एक अलग पहलू को सामने लाती है.

आस्था और अनुभव का निजी सफर

सलमा की कहानी को केवल धार्मिक पहचान के नजरिये से देखना उनके अनुभव को सीमित कर देगा. यह उनके निजी आस्था-सफर की कहानी है, जिसकी शुरुआत अयोध्या की एक यात्रा से हुई और वृंदावन में बांके बिहारी के दर्शन के बाद उनका कृष्ण से जुड़ाव और गहरा होता गया.

आज कृष्ण की पूजा, माला जप और तुलसी धारण करना उनके जीवन का हिस्सा है. वहीं दूसरी ओर वह खेल के मैदान में बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटी हैं.

कृष्ण भक्ति और खेल, दोनों से जुड़ी है जिंदगी

गोपालचक की सलमा खातून की जिंदगी में दो अलग-अलग दुनिया साथ चलती हैं. एक ओर वह कृष्ण भक्ति में अपना सुकून तलाशती हैं, तो दूसरी ओर खेल के मैदान में बच्चों को प्रशिक्षण देती हैं.

उनकी कहानी उनके व्यक्तिगत अनुभव, आस्था और सामाजिक भूमिका के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती है. सलमा के लिए कृष्ण भक्ति एक निजी अनुभूति है और बच्चों को खेल प्रशिक्षण देना उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा. यही दोनों पहलू आज उनकी पहचान का हिस्सा बन चुके हैं.