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चंद पैसों के लालच में उजड़ते हैं परिवार:झज्जर कोर्ट की टिप्पणी- नशा युवा पीढ़ी के लिए खतरा; जमानत खारिज, पंच के डैशबोर्ड से मिली थी स्मैक
झज्जर में चंद पैसों के लालच में नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनका काम किसी एक व्यक्ति की जिंदगी ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को बर्बादी की ओर धकेल सकता है। नशे के इसी सामाजिक खतरे को रेखांकित करते हुए झज्जर की अदालत ने स्मैक बरामदगी के मामले में आरोपी साहिल की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुखप्रीत सिंह ने कहा कि नशे की प्रवृत्ति युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है। अदालत ने जमानत पर विचार करते समय व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकारों और समाज के व्यापक हितों के बीच संतुलन को महत्वपूर्ण बताया। मामला टाटा पंच कार के डैशबोर्ड से 11.58 ग्राम स्मैक बरामद होने के पुलिस के दावे से जुड़ा है। इस मामले में थाना शहर झज्जर में स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 21 के तहत प्राथमिकी दर्ज है। डैशबोर्ड में मिली स्मैक, कार में सवार थे पांच लोग पुलिस के अनुसार, 11 सितंबर 2026 को उपनिरीक्षक जितेंद्र कुमार को सूचना मिली थी कि टाटा पंच कार में नशीला पदार्थ लेकर कुछ लोग बादली से झज्जर की ओर आ रहे हैं। इसके बाद पुलिस टीम ने बादली रोड फ्लाईओवर के पास नाकेबंदी की और कार को रोक लिया। कार में मनोज, रोबिन, नीरज, साहिल और सौरभ सवार थे। पुलिस के मुताबिक, ड्यूटी मजिस्ट्रेट एवं तहसीलदार अंशुल की मौजूदगी में कार की तलाशी ली गई। इस दौरान डैशबोर्ड में रखी सफेद रंग की पन्नी से 11.58 ग्राम स्मैक बरामद होने की बात सामने आई। इसके बाद पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर कानूनी कार्रवाई की। बचाव पक्ष की दलील- साहिल को झूठा फंसाया जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता संदीप कादियान ने दलील दी कि साहिल 11 सितंबर से हिरासत में है और उसे झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने बरामदगी के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्मैक आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी में नहीं, बल्कि कार के डैशबोर्ड से मिली थी। इसी आधार पर नियमित जमानत देने की मांग की गई। वहीं, लोक अभियोजक धीरेंद्र हुड्डा ने जमानत का विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी उसी कार में सवार था, जिसके डैशबोर्ड से स्मैक बरामद हुई थी। मामले की गंभीरता और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए अभियोजन ने जमानत नहीं देने की दलील दी। अदालत ने क्यों नहीं दी राहत? दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और मामले के अभिलेखों पर विचार करने के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुखप्रीत सिंह ने नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत की टिप्पणी का केंद्र नशे के कारोबार का सामाजिक प्रभाव रहा। अदालत ने कहा कि नशे की तस्करी से होने वाला नुकसान केवल नशे का सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसकी मार परिवार पर भी पड़ती है और युवा पीढ़ी का भविष्य प्रभावित होता है। जमानत पर निर्णय लेते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ समाज के हितों पर भी विचार करना आवश्यक है। जमानत खारिज, लेकिन दोषी करार नहीं अदालत के इस आदेश का अर्थ है कि साहिल को इस नियमित जमानत याचिका के आधार पर रिहाई नहीं मिली है। जमानत याचिका खारिज होना दोषसिद्धि नहीं है। आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय मुकदमे की सुनवाई और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही होगा।