Tuesday, 13 October 2026
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बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट में राजपरिवार, बैगा, आदिवासियों की कितनी हिस्सेदारी:पूजा पद्धति पर विवाद, भवानी बहादुर बोले- परंपरा बदली, सभी समाजों को मिले प्रतिनिधित्व

INT News13 October 2026 at 07:25 am

छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर में चैत्र नवरात्रि की पंचमी भेंट के दौरान विवाद हुआ था। इसके बाद से खैरागढ़ राजपरिवार और मंदिर ट्रस्ट के बीच पूजा की परंपराओं और व्यवस्था में राजपरिवार की भूमिका को लेकर विवाद जारी है। अब राजपरिवार के सदस्य भवानी बहादुर सिंह ने ट्रस्ट में सभी समाजों को प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई है। वहीं, ट्रस्ट अध्यक्ष मनोज अग्रवाल का कहना है कि मंदिर जनता का है और यहां वैदिक और बैगा, दोनों पद्धतियों से पूजा होती है। गोंडवाना महासभा के संचालक रमेश उइके ने कहा कि पंचमी भेंट की परंपरा पूर्वजों के समय से चली आ रही है। पहले समाज से 4-5 लोग बीना ट्रस्ट को बताए भेंट करके आते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से बड़े स्तर पर इसका आयोजन हो रहा है। इस रिपोर्ट में पढ़िए मां बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट में किस समाज की कितनी भागीदारी है? पूजा पद्धतियों के इतिहास को लेकर राजपरिवार, ट्रस्ट और आदिवासी समाज का कहना है? पहले देखिए ये तस्वीरें- पंचमी भेंट में गर्भगृह में प्रवेश को लेकर विवाद पिछली चैत्र नवरात्रि की पंचमी पर गोंड समाज के लोग आंगा देव के साथ मां बम्लेश्वरी मंदिर पहुंचे थे। इस बार खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य भवानी बहादुर सिंह भी उनके साथ थे। गोंड समाज के लोग पारंपरिक तरीके से पूजा करना चाहते थे। इसी दौरान गर्भगृह में प्रवेश को लेकर विवाद हो गया। मंदिर ट्रस्ट का आरोप था कि भवानी बहादुर सिंह और उनके साथ आए लोगों ने गर्भगृह में जबरन प्रवेश किया। ट्रस्ट ने इस मामले में डोंगरगढ़ थाने में शिकायत दर्ज कराई और कार्रवाई की मांग की। ट्रस्ट का कहना था कि गर्भगृह में प्रवेश के लिए निर्धारित नियमों का पालन जरूरी है। दूसरी ओर, पंचमी भेंट में शामिल गोंड समाज के लोगों की मांग पारंपरिक पूजा पद्धति के अनुसार आंगा देव के साथ पूजा करने की थी। राजपरिवार की ओर से भी मंदिर की पुरानी परंपराओं में अपनी भूमिका की बात कही गई। 'राजपरिवार की पूजा संबंधी भूमिका सीमित कर दी गई' भवानी बहादुर सिंह का आरोप है कि समय के साथ राजपरिवार की पूजा संबंधी भूमिका सीमित कर दी गई है। उनका कहना है कि मंदिर में अलग-अलग समाजों की परंपराओं का सम्मान होना चाहिए और ट्रस्ट में भी सभी समाजों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इस घटना के बाद विवाद केवल गर्भगृह में प्रवेश तक सीमित नहीं रहा। मंदिर की पूजा पद्धति, राजपरिवार की भूमिका और ट्रस्ट में समाजों की भागीदारी जैसे सवाल भी चर्चा में आए। इन्हीं सवालों के बीच ट्रस्ट के पुराने बायलॉज में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह की सदस्यता से जुड़ा नियम महत्वपूर्ण हो जाता है। बायलॉज में राजा की सदस्यता उन्हीं तक सीमित ट्रस्ट की ओर से उपलब्ध कराए गए पुराने बायलॉज के एक पेज में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह की सदस्यता को लेकर नियम दर्ज है। नियम 7(1) के मुताबिक, समिति की सदस्यता डोंगरगढ़ नगर के हिंदू नागरिकों तक सीमित रखी गई थी। इसमें अपवाद के रूप में खैरागढ़ के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह को आजीवन मानद सदस्य बनाने का प्रावधान था। इस नियम में लिखा है कि राजा खुद ट्रस्ट की बैठक में शामिल हो सकते थे, लेकिन किसी प्रतिनिधि को नामित नहीं कर सकते थे। यानी यह मानद सदस्यता उन्हीं तक सीमित रखी गई थी। ट्रस्ट अध्यक्ष मनोज अग्रवाल का कहना है कि राजा ने खुद बायलॉज में यह नियम लिखवाया था और उन्होंने अपने बाद किसी को सदस्य नामित नहीं किया। हालांकि, ट्रस्ट ने उपलब्ध दस्तावेज में इस नियम का अंश ही हमें उपलब्ध कराया है। पूरी बायलॉज कॉपी नहीं होने से यह स्पष्ट नहीं है कि बाद में सदस्यता या दूसरे नियमों में कोई बदलाव किया गया था या नहीं। राजपरिवार बोला- पूजा पद्धति बदली, हमें भी मिले सम्मान भवानी बहादुर सिंह का कहना है कि मंदिर की व्यवस्था पहले राजपरिवार के पास थी। उस समय परिवार के सदस्यों को राजनीति के सिलसिले में दिल्ली और दूसरे शहरों में जाना पड़ता था। कई बार मंदिर के पुजारियों और बैगाओं को भुगतान करने में परेशानी होती थी। इसी वजह से राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह ने मंदिर की देखरेख के लिए ट्रस्ट बनाया था। भवानी बहादुर सिंह के मुताबिक, ट्रस्ट से जुड़े माणिकलाल तापड़िया और भंडारी जी ने भरोसा दिया था कि राजपरिवार के नाम से पहला ज्योति कलश हमेशा जलाया जाएगा। पंचमी और अष्टमी की पूजा में भी परिवार की भूमिका बनी रहने की बात कही गई थी। उनका कहना है कि जब तक उनकी मां और पूर्व मंत्री गीता देवी सिंह जीवित थीं, तब तक ट्रस्ट के लोग उन्हें आमंत्रित करने आते थे। उनके निधन के बाद राजपरिवार को बुलाना बंद कर दिया गया। भवानी बहादुर सिंह का दावा है कि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह के निधन से पहले परिवार ने आशंका जताई थी कि उनके जाने के बाद ट्रस्ट राजपरिवार की परंपराओं के अनुसार काम नहीं करेगा। उनके मुताबिक, इस पर राजा ने ट्रस्ट भंग करने की बात कही थी। इसके बाद ट्रस्ट के सदस्य गंगाजल और दूब हाथ में लेकर राजपरिवार को व्यवस्था से अलग नहीं करने का भरोसा देने पहुंचे थे। भवानी बहादुर सिंह का आरोप है कि अब मंदिर की पूजा पद्धति बदल दी गई है और राजपरिवार की भूमिका सीमित हो गई है। ट्रस्ट अध्यक्ष बोले- मंदिर किसी एक परिवार का नहीं ट्रस्ट अध्यक्ष मनोज अग्रवाल का कहना है कि पहले मंदिर की व्यवस्था खैरागढ़ राजपरिवार के हाथों में थी। उनके मुताबिक, 1965-66 में राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह ने मंदिर की व्यवस्था के लिए एडहॉक कमेटी बनाई थी। इसके बाद 1975 में बायलॉज तैयार कर ट्रस्ट का पंजीयन कराया गया। मनोज अग्रवाल के मुताबिक तब से हर 3 साल में चुनाव होते हैं। वे बताते हैं कि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह एक बार डोंगरगढ़ के गोल बाजार में माणिकलाल तापड़िया के यहां आए थे। उसी दौरान मंदिर के बैगा ने उनसे कहा कि मंदिर से उसका भरण-पोषण नहीं हो पा रहा है और वह अकेले व्यवस्था नहीं संभाल सकते। राजा खैरागढ़ में रहते थे, इसलिए उन्होंने नगर के लोगों को बुलाकर कमेटी बनाई। बाद में ट्रस्ट का गठन किया गया। मनोज अग्रवाल का कहना है कि जब राजा ने मंदिर की व्यवस्था ट्रस्ट को सौंपी थी, तब वहां सुविधाएं सीमित थीं। उनके मुताबिक, मंदिर के विकास में ट्रस्ट और लोगों का योगदान रहा है। वे कहते हैं कि मंदिर किसी ट्रस्टी या परिवार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता का है। राजपरिवार को दर्शन के लिए नहीं बुलाने के आरोप पर मनोज अग्रवाल का कहना है कि मंदिर में किसी को दर्शन से रोकने की बात सही नहीं है। उनके मुताबिक, भक्तों को दर्शन कराना ट्रस्ट की जिम्मेदारी है। ज्योति कलश पर भी दोनों पक्षों की अलग बात राजपरिवार के नाम से पहला ज्योति कलश नहीं जलाने के सवाल पर मनोज अग्रवाल का कहना है कि पहले राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह के नाम से पहली ज्योति जलाई जाती थी। उनके निधन के बाद किसी दिवंगत व्यक्ति के नाम से ज्योति नहीं जलाई जा सकती, इसलिए अब पहली ज्योति मां बम्लेश्वरी के नाम से जलाई जाती है। वहीं, भवानी बहादुर सिंह का कहना है कि अगर परिवार के किसी जीवित सदस्य के नाम से ज्योति नहीं जलाई जा सकती, तो राजपरिवार के नाम से ज्योति जलाने की परंपरा रखी जानी चाहिए। इस मामले में ज्योति कलश की पुरानी व्यवस्था और उसमें बदलाव के समय से जुड़े दस्तावेज सामने आने पर ही स्पष्ट होगा कि फैसला कब और किस आधार पर लिया गया था। ट्रस्ट में किस समाज के कितने सदस्य? सूची में अध्यक्ष मनोज अग्रवाल, ट्रस्टी नितिन अग्रवाल, योगेश अग्रवाल और प्रकाश बिंदल बनिया/अग्रवाल समुदाय से आते है। उपाध्यक्ष चंद्रप्रकाश मिश्रा ब्राह्मण, दूसरे उपाध्यक्ष अनिल कुमार गट्टानी और विशेष आमंत्रित सदस्य सुषमा कोठारी माहेश्वरी, कोषाध्यक्ष पीतांबर स्वामी तेलुगु ब्राह्मण और मंत्री महेंद्र परिहार ठाकुर समुदाय से आते हैं। सह-मंत्री बबलू शांडिल्य ओबीसी समुदाय से है। सूची में ट्रस्टी महेंद्र भाई पटेल को गुजराती, हरीश भंडारी और गौतम चोपड़ा को जैन, जबकि संजय श्रीवास्तव और संजीव गोमस्ता को कायस्थ समुदाय से बताया गया है। सभी समाजों को प्रतिनिधित्व देने की मांग भवानी बहादुर सिंह का कहना है कि मंदिर में ठाकुर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और आदिवासी समेत सभी समाजों के लोग आते हैं। गोंड समुदाय के लोग आंगादेव लेकर आते हैं और राजपरिवार की भी अपनी पूजा परंपरा रही है। ऐसे में उनका सुझाव है कि ट्रस्ट में सभी समाजों को जगह मिलनी चाहिए। वे चाहते हैं कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी अलग-अलग समुदायों को बारी-बारी से मिले, ताकि किसी एक वर्ग तक यह सीमित न रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सदस्यों को 5-5 वोट देने का अधिकार है और ऐसे कई सदस्य एक ही परिवार से जुड़े हैं।