Monday, 6 July 2026
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मोरीवाले बाबा दरगाह मामले में हाईकोर्ट सख्त:याचिका खारिज कर लगाया ₹15 हजार का जुर्माना; कलेक्टर को कार्रवाई का अधिकार, जांच जारी रहेगी

INT News6 July 2026 at 09:32 pm

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने मोरीवाले बाबा दरगाह से जुड़े विवादित निर्माण मामले में दायर याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 15 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। जस्टिस संदीप एन. भट्ट की सिंगल बेंच ने कहा कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है और यह कार्रवाई लंबित जांच को प्रभावित एवं विलंबित करने के उद्देश्य से की गई प्रतीत होती है। कोर्ट ने यह आदेश 3 जुलाई को दिया है। दरगाह ख्वाजा सुल्तान मोहम्मद चिश्ती उर्फ मोरीवाले बाबा की ओर से दायर याचिका में 16 जून 2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें एसडीओ द्वारा ऑर्डर-7 रूल-11 सीपीसी के तहत प्रस्तुत आवेदन खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि कलेक्टर और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को इस मामले में कार्रवाई का अधिकार नहीं है, तथा मध्यप्रदेश सार्वजनिक स्थान (धार्मिक भवन एवं गतिविधियों का विनियमन) अधिनियम, 2001 के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। दरगाह परिसर में 14 दुकानों के निर्माण पर सवाल सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 1986 में केवल 360.21 वर्गमीटर क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन बाद में परिसर में 14 दुकानों सहित अन्य निर्माण कर लिए गए। अदालत ने पूछा कि इन निर्माणों की अनुमति का कोई दस्तावेज उपलब्ध है या नहीं, लेकिन याचिकाकर्ता ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी पाया कि संबंधित भूमि मूल रूप से नगर निगम और बाद में आईडीए के अधिकार क्षेत्र में रही है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता संपत्ति पर अपना वैध अधिकार, स्वामित्व या हित साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्यप्रदेश सार्वजनिक स्थान (धार्मिक भवन एवं गतिविधियों का विनियमन) अधिनियम, 2001 के प्रावधान इस मामले पर लागू होते हैं और कलेक्टर को जांच और कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने माना कि प्रशासन द्वारा की जा रही जांच विधिसम्मत है और उसे रोकने का कोई आधार नहीं बनता। याचिका दायर करने की वैधता पर भी उठे सवाल कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि याचिका दायर करने वाले व्यक्ति के पास समिति की ओर से अधिकृत होने का कोई वैध दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं था। इस कारण याचिका की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ। कोर्ट ने पूर्व के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी संस्था या समिति की ओर से याचिका दायर करने के लिए विधिवत अधिकृत प्रस्ताव आवश्यक होता है। न्यायिक समय की बर्बादी बताया कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस प्रकार की कार्यवाही से न केवल प्रशासनिक जांच प्रभावित होती है बल्कि कोर्ट का बहुमूल्य समय भी व्यर्थ होता है। हालांकि भारी जुर्माना लगाने के बजाय कोर्ट ने 15 हजार रुपए का दंड लगाया, जिसे सात दिन के भीतर इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। हाईकोर्ट ने अंततः याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और प्रशासनिक जांच को जारी रखने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।