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रामलीला मैदान में विपक्षी एकजुटता में कितना दम? क्या 'वोट चोरी' के मुद्दे पर BJP की बढ़ेंगी मुश्किलें?

दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को INDIA गठबंधन के 21 दलों ने चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ प्रदर्शन किया. इस दौरान, लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव समेत दूसरे विपक्षी नेताओं ने सरकार और चुनाव आयोग पर हमला बोला.
लेकिन सवाल है कि क्या दिल्ली में विपक्ष की यह रैली केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित रह जाएगी या 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष इसे नई राजनीतिक रणनीति बनाने में सफल रहेगा?
एकजुटता दिखाने में कितनी सफल रही INDIA गठबंधन?
रामलीला मैदान की रैली का पहला राजनीतिक संदेश विपक्षी एकता से जुड़ा है. INDIA गठबंधन में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल और कई क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं. इन सभी दलों के अपने-अपने राज्यों में अलग राजनीतिक हित और चुनावी महत्वाकांक्षाएं हैं. ऐसे में राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और दूसरे प्रमुख नेताओं का एक मंच पर आना राजनीतिक रूप से अहम है.
इस रैली के जरिए विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे पर सभी दल एक साथ खड़े हो सकते हैं. हालांकि, गठबंधन के सभी घटक दल इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए. ऐसे में इसे पूरी तरह एकजुटता का प्रदर्शन कहना सही नहीं होगा.
अगर पिछले चुनावों पर नजर डालें तो विपक्षी एकता की तस्वीर मिली-जुली रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सीटों का तालमेल बनाया. इसका नतीजा यह रहा कि INDIA गठबंधन ने राज्य की 80 सीटों में से 43 पर जीत दर्ज की. जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच चुनावी तालमेल नहीं बन पाया और नतीजा उसके पक्ष में नहीं रहा. बिहार में भी 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के गठबंधन को अपेक्षित चुनावी सफलता नहीं मिली क्योंकि तालमेल की कमी रही.
इन उदाहरणों से साफ है कि विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती साझा मुद्दों पर साथ आने के साथ-साथ चुनावी मैदान में भी तालमेल बनाए रखने की है. रामलीला मैदान की रैली ने निश्चित रूप से विपक्ष को एक साझा मंच दिया है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब गठबंधन के दल सीटों के बंटवारे, नेतृत्व और चुनावी रणनीति पर एकमत होंगे.
फिलहाल तो इसे विपक्षी एकता की दिशा में एक राजनीतिक पहल कहा जा सकता है, न कि गठबंधन की सभी मुश्किलों के खत्म होने का संकेत.
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BJP के लिए 'वोट चोरी' का मुद्दा राजनीतिक चुनौती क्यों है?
रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली से BJP के सामने चुनावी निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक चुनौती खड़ी हुई है.
विपक्ष का आरोप है कि BJP चुनाव जीतने के लिए मतदाता सूची में हेरफेर का सहारा ले रही है. कांग्रेस का दावा है कि एसआईआर (SIR) के नाम पर विपक्ष समर्थक मतदाताओं, खासकर गरीबों, अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जबकि कुछ जगहों पर फर्जी या संदिग्ध नाम जोड़े जा रहे हैं.
रैली में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में करीब 13.5 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए. उन्होंने दावा किया कि इसका असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है और BJP को इसका राजनीतिक फायदा मिल रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह महिलाओं, युवाओं और दलितों के वोट छीनने की कोशिश कर रहे हैं.
BJP ने इन आरोपों को खारिज किया है. पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित और जरूरी प्रक्रिया है.BJP ने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने और चुनावी हार की आशंका के चलते भ्रम फैलाने का आरोप भी लगाया है.
इसलिए, BJP के सामने चुनौती केवल विपक्ष की रैली का राजनीतिक जवाब देना नहीं है. उसे मतदाता सूची में नाम हटाए जाने के आधार, पुनरीक्षण की पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों को लेकर उठ रहे सवालों का भी जवाब देना होगा.
हालांकि, विपक्ष के प्रदर्शन से अलग दिल्ली में इसी दिन BJP ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों की याद में मार्च आयोजित किया. BJP ने इस मौके पर कांग्रेस के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और 1984 के दंगों में उसकी भूमिका को लेकर सवाल उठाए. इसके जरिए पार्टी ने विपक्ष के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े अभियान के जवाब में कांग्रेस के अतीत को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाया.
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2029 के चुनाव पर क्या पड़ सकता है असर?
रामलीला मैदान की रैली को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष की राजनीतिक तैयारी के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इससे चुनावी नतीजों का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी. INDIA गठबंधन के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह इस मुद्दे को लगातार उठाते हुए आम मतदाताओं से जोड़ पाएगा. दूसरी तरफ, BJP के लिए यह जरूरी होगा कि वह मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े सवालों का तथ्यात्मक जवाब दे और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर जनता का भरोसा बनाए रखें.