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भागवत कथा के अंतिम दिन नम हुईं श्रद्धालुओं की आंखें:माताओं को रोता देख भावुक हुए इन्द्रेश उपाध्याय, भगवान के गुणों का गान करने का संदेश
इंदौर में कथावाचक इन्द्रेश उपाध्याय की श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन भावुक माहौल देखने को मिला। करवा चौथ के व्रत में छिपे प्रेम, त्याग और समर्पण का महत्व बताते हुए उन्होंने मां के बलिदान का वर्णन किया। इस दौरान कई महिलाओं की आंखों से आंसू छलक पड़े। माताओं को भावुक देखकर इन्द्रेश उपाध्याय भी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि मां का जीवन अपने लिए कम और परिवार के लिए अधिक होता है। सात दिनों तक चली कथा में 50 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने भागवत का श्रवण किया। करवा चौथ का व्रत केवल भूखे रहने की परंपरा नहीं इन्द्रेश उपाध्याय ने कहा कि करवा चौथ का व्रत केवल भूखे-प्यासे रहने की परंपरा नहीं, बल्कि जीवनसाथी के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और परिवार के कल्याण के लिए यह व्रत रखती हैं। मां अपने बच्चों और परिवार के लिए जीवनभर त्याग करती है। व्रत का वास्तविक भाव भी यही है कि व्यक्ति अपने सुख से पहले अपनों के सुख के बारे में सोचे। अहिल्याबाई का उदाहरण देकर समझाया बहू का महत्व कथा के दौरान इन्द्रेश उपाध्याय ने देवी अहिल्याबाई होल्कर के जीवन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बहू केवल घर संभालने या रोटी बनाने के लिए ससुराल नहीं आती, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों से पूरे परिवार के कल्याण में योगदान देती है। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने कार्यों से ससुराल और परिवार का नाम पूरे देश में रोशन किया। उन्होंने अहिल्याबाई के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब एक ब्राह्मण ने उनकी प्रशंसा में ग्रंथ लिखा, तो उन्होंने उसे स्वीकार करने के बजाय भगवान की महिमा लिखने की सलाह दी। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने यश के बजाय भगवान के गुणों का गान करने का संदेश दिया। धन केवल अपने सुख के लिए नहीं, दूसरों की सेवा में भी लगाएं रुक्मिणी विवाह के प्रसंग के दौरान इन्द्रेश उपाध्याय ने धन के सदुपयोग पर बात की। उन्होंने कहा कि लक्ष्मी का संबंध भगवान नारायण से है। व्यक्ति को धन बढ़ने पर केवल अपनी सुख-सुविधाओं पर खर्च नहीं करना चाहिए, बल्कि उसका कुछ हिस्सा दान और जरूरतमंदों की सेवा में भी लगाना चाहिए। उन्होंने धन के उपयोग के आधार पर लोगों को तीन श्रेणियों में समझाया कि श्रेष्ठ व्यक्ति वही है, जो अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों के हित में भी करता है। धार्मिक आयोजनों और कथा में किया गया खर्च भी श्रद्धा के साथ सेवा का माध्यम बन सकता है। कथा सुनने कई घंटे पहले पहुंच जाते थे श्रद्धालु इन्द्रेश उपाध्याय ने इंदौर के श्रद्धालुओं के उत्साह की सराहना की। उन्होंने कहा कि सात दिनों तक कथा सुनने के लिए लोग कई घंटे पहले पहुंच जाते थे। विशेष रूप से युवाओं में भी भागवत कथा के प्रति गहरा लगाव देखने को मिला। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि व्यक्ति को अपने अच्छे कार्यों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय उन्हें ठाकुरजी की कृपा मानना चाहिए। कथा के समापन पर उन्होंने भागवत के विभिन्न प्रसंगों का सार सुनाया और जीवन में प्रेम, विनम्रता तथा सेवा का भाव बनाए रखने का संदेश दिया। देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु, आयोजकों ने जताया आभार आयोजक आशीष गोयल और अमृता गोयल ने बताया कि सात दिनों तक चली श्रीमद्भागवत कथा में देश के अलग-अलग राज्यों के साथ विदेश से भी श्रद्धालु इंदौर पहुंचे। इस दौरान 50 हजार से ज्यादा लोगों ने कथा का श्रवण किया। उन्होंने कहा कि परिवार के वरिष्ठजनों के आशीर्वाद और श्रद्धालुओं के सहयोग से आयोजन सफल हो सका। बड़ी संख्या में लोगों ने अपने व्यस्त समय से समय निकालकर कथा में भाग लिया। आयोजक परिवार ने सभी श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया।