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बैतूल में सरदार विष्णुसिंह गोंड जयंती पर महारैली:पारंपरिक वेशभूषा में उमड़ा आदिवासी समाज, गोंगो पूजा के साथ हुआ समापन
बैतूल में मंगलवार को स्वतंत्रता सेनानी सरदार विष्णुसिंह गोंड की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) और आदिवासी समाज द्वारा एक महारैली का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजन शामिल हुए। महिला, पुरुष और युवा पारंपरिक वेशभूषा में रैली का हिस्सा बने, जो आदिवासी समाज की एकजुटता और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर में ऑडिटोरियम से हुई, जिसके बाद शहर में महारैली निकाली गई। रैली में पारंपरिक वाद्य यंत्रों और नारों के साथ समाज की सांस्कृतिक पहचान और एकजुटता का प्रदर्शन किया गया। जयस जिलाध्यक्ष और जिला पंचायत सदस्य संदीप धुर्वे ने रैली का नेतृत्व किया। महारैली के समापन पर सरदार विष्णुसिंह गोंड की प्रतिमा पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार गोंगो पूजा की गई। महारैली के कारण शहर के कई प्रमुख मार्गों पर यातायात प्रभावित रहा। बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी के चलते कुछ स्थानों पर जाम की स्थिति बनी, जिससे वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ा। यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस जवानों को तैनात किया गया था। 2024 में बस स्टैंड पर लगी थी प्रतिमा
उल्लेखनीय है कि बैतूल बस स्टैंड पर 11 अगस्त 2024 को स्वतंत्रता सेनानी सरदार विष्णुसिंह गोंड की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया गया था। तब से प्रतिमा स्थापना दिवस और जयंती के अवसर पर महारैली का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष भी जयस जिलाध्यक्ष संदीप कुमार धुर्वे के नेतृत्व में यह रैली निकाली गई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े थे सरदार विष्णुसिंह गोंड
सरदार विष्णुसिंह गोंड का नाम 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े प्रमुख आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल है। उन्होंने रानीपुर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था। उनके संघर्ष में साथियों के साथ थाने पर हमला करना, हथियार लूटना और थाना भवन में आग लगाना जैसी घटनाएँ शामिल हैं। रानीपुर थाने में लकड़ी के दो खंभों पर आज भी कुल्हाड़ी के निशान मौजूद हैं, जो उस दौर के संघर्ष की याद दिलाते हैं। इस जयंती समारोह के माध्यम से आयोजकों ने सरदार विष्णुसिंह गोंड के संघर्ष और बलिदान को याद किया। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराना और आदिवासी संस्कृति, परंपराओं तथा सामाजिक एकजुटता को प्रदर्शित करना था।