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गंगा घाट से बाबाधाम तक चाय का सहारा, श्रावणी मेले में रोज 1 लाख कप की खपत का अनुमान

INT News20 August 2026 at 06:43 pm

Shravani Mela Tea Business: कंधे पर कांवर, पैरों में लंबी यात्रा की थकान और मन में बाबाधाम पहुंचने की ललक. गंगा घाट से निकलने के बाद कांवरियों के कदम लगातार आगे बढ़ते हैं. लेकिन रास्ते में जब किसी चाय की दुकान से अदरक की खुशबू और गर्म चाय की भाप आती है, तो कई कदम कुछ देर के लिए थम जाते हैं.

हाथ में आती है गर्म चाय की प्याली. दो-चार चुस्की. कुछ मिनट का आराम. फिर कांवर कंधे पर और उसी ऊर्जा के साथ गूंज उठता है... बोल बम.

सुलतानगंज के श्रावणी मेले में चाय अब सिर्फ पेय नहीं रह गयी है. कांवरियों की लंबी पैदल यात्रा के बीच यह कुछ मिनट के आराम और स्थानीय कारोबार की बड़ी वजह बन चुकी है. स्थानीय दुकानदारों के अनुमान के मुताबिक, मेला क्षेत्र में एक महीने के दौरान करीब 30 लाख कप चाय की खपत होती है. यानी औसतन हर दिन करीब एक लाख कप चाय कांवरिये और श्रद्धालु पी रहे हैं.

300 दुकानों पर दिन-रात उबलती है चाय

गंगा घाट से कांवर यात्रा शुरू होने के साथ ही सुलतानगंज के मेला क्षेत्र में चाय की दुकानों पर भी रौनक बढ़ जाती है. सुबह से देर रात तक करीब 300 दुकानों पर चाय की केतलियां लगातार चढ़ती-उतरती रहती हैं.

कई दुकानों पर स्थिति ऐसी रहती है कि एक केतली चाय पूरी तरह खत्म होने से पहले ही दूसरी चढ़ानी पड़ती है. कांवरियों की भीड़ बढ़ते ही दुकानदारों के हाथ और तेजी से चलने लगते हैं.

कोई कांवरिया खड़े-खड़े चाय खत्म करता है, तो कोई दुकान के बाहर रखी बेंच पर कुछ देर बैठकर पैरों को आराम देता है. चाय के साथ बिस्कुट और हल्का नाश्ता भी कांवरियों की पसंद बन रहा है.

एक महीने में 60 क्विंटल चायपत्ती की खपत

30 लाख कप चाय का यह आंकड़ा केवल कपों की संख्या नहीं बताता, बल्कि इसके पीछे चल रहे बड़े स्थानीय कारोबार की तस्वीर भी दिखाता है.

स्थानीय दुकानदारों से मिली जानकारी के अनुसार, एक महीने में करीब 60 क्विंटल चायपत्ती, 300 क्विंटल चीनी और 210 क्विंटल दूध चाय बनाने में खप जाता है.

इसका मतलब है कि मेला शुरू होने के साथ ही चाय दुकानदारों को दूध, चीनी और चायपत्ती का स्टॉक लगातार बढ़ाना पड़ता है. मांग में अचानक होने वाली वृद्धि को देखते हुए दुकानदार पहले से तैयारी रखते हैं.

कांवरियों के लिए चाय सिर्फ स्वाद नहीं, कुछ देर की राहत

सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा में कांवरियों के लिए हर छोटा पड़ाव मायने रखता है. गंगा में स्नान करने और कांवर में जल भरने के बाद बाबाधाम की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं के लिए रास्ते में मिलने वाली गर्म चाय कुछ मिनट का सुकून देती है.

यूपी से पहुंचे कांवरिया रमेश सिंह बताते हैं कि लगातार चलते रहने से शरीर थक जाता है. रास्ते में गर्म चाय मिल जाए तो कुछ देर बैठकर आराम करने का मौका मिल जाता है. चाय पीने के बाद फिर कांवर उठाकर आगे बढ़ने में राहत महसूस होती है.

यही वजह है कि कांवरिया पथ पर चाय की छोटी-छोटी दुकानें यात्रा का हिस्सा बन गयी हैं.

दुकानदारों के लिए साल का सबसे व्यस्त महीना

श्रावणी मेला चाय दुकानदारों के लिए सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग होता है. पूरे साल की तुलना में इस अवधि में बिक्री कई गुना बढ़ जाती है.

चाय दुकानदार दिनेश बताते हैं कि मेले में दुकान खोलते ही काम शुरू हो जाता है. सुबह से देर रात तक चाय बनती रहती है. कई बार ग्राहकों की भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि दुकानदारों को बैठने तक का समय नहीं मिलता.

कांवरियों को गर्म चाय तुरंत चाहिए होती है. इसलिए दूध, चीनी और चायपत्ती की तैयारी लगातार रखनी पड़ती है.

चाय के एक कप से जुड़ा है कई कारोबार

मेला क्षेत्र में 30 लाख कप चाय की खपत का असर केवल चाय बेचने वाले दुकानदारों तक सीमित नहीं है. इसके साथ दूध बेचने वाले, चायपत्ती और चीनी के थोक विक्रेता, किराना दुकानदार, बिस्कुट विक्रेता, पानी और नाश्ते के कारोबारी भी जुड़े हैं.

स्थानीय व्यवसायी पवन गुप्ता कहते हैं कि श्रावणी मेला में पूरे बाजार की रफ्तार कांवरियों की संख्या से तय होती है. चाय की इतनी बड़ी खपत का सीधा फायदा छोटे कारोबारियों से लेकर थोक व्यापारियों तक पहुंचता है.

चाय की मांग बढ़ने के साथ दूध, चीनी, बिस्कुट, पानी और दूसरे जरूरी सामान की बिक्री भी बढ़ जाती है. इस तरह चाय की एक प्याली मेले की स्थानीय अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों को गति देती है.

Shravani Mela Tea Business: चाय की चुस्की के बाद फिर कांवर कंधे पर

सुलतानगंज से शुरू होने वाली कांवर यात्रा में हर कदम बाबाधाम की ओर बढ़ता है. गंगा में डुबकी, कांवर में जल और फिर लंबा पैदल सफर. इस यात्रा में थकान भी है और आस्था का उत्साह भी.

इसी बीच रास्ते में मिलने वाली चाय की दुकान कुछ मिनटों के लिए कांवरिये को ठहरने का मौका देती है. गर्म प्याली हाथ में आती है, चाय की चुस्की शुरू होती है और कुछ देर के लिए पैरों को आराम मिलता है.

फिर चाय खत्म होती है. कांवर दोबारा कंधे पर उठता है. कदम आगे बढ़ते हैं और वातावरण एक बार फिर ‘बोल बम’ के जयघोष से गूंज उठता है.

श्रावणी मेले में चाय की यह छोटी-सी प्याली अब कांवरियों की बड़ी यात्रा का रोज दिखाई देने वाला हिस्सा बन चुकी है.

मेला क्षेत्र में चाय का कारोबार

ये आंकड़े स्थानीय दुकानदारों से बातचीत पर आधारित अनुमान हैं.

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