Wednesday, 2 September 2026
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मोदी के बाद BJP का बॉस कौन? योगी या शाह नहीं, RSS के सामने है इससे भी बड़ा सवाल

INT News2 September 2026 at 10:39 am

नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी की राजनीति कैसी होगी? यह सवाल अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसके संभावित जवाब तलाशने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं. इसी बहस में दो नाम बार-बार सामने आते हैं- योगी आदित्यनाथ और अमित शाह.

एक के पास जनाधार, हिंदुत्व की स्वतंत्र पहचान और उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राजनीतिक आधार है. दूसरे के पास संगठन, चुनावी रणनीति और सत्ता के राजनीतिक प्रबंधन का लंबा अनुभव .

लेकिन इस पूरी बहस को सिर्फ Yogi vs Shah के रूप में देखना शायद RSS की राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है.

संघ के नजरिए से ज्यादा बड़ा सवाल यह हो सकता है कि मोदी के बाद बीजेपी को एक व्यक्ति चाहिए या ऐसा सिस्टम, जो किसी एक व्यक्ति पर निर्भर न हो.

1. RSS के लिए पहला सवाल ‘कौन?’ नहीं, ‘कैसा नेतृत्व?’ है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने एक कैडर-आधारित संगठन के रूप में की थी. इसकी राजनीतिक यात्रा बाद में जनसंघ और फिर बीजेपी तक पहुंची.

इस पूरे मॉडल में व्यक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन संगठन उससे बड़ा है.

यही वजह है कि मोदी के बाद की बीजेपी को सिर्फ किसी एक नेता के उत्तराधिकारी के रूप में देखना संघ की कार्यशैली को बहुत सरल बना देना होगा.

RSS के लिए राजनीतिक नेतृत्व का अर्थ केवल लोकप्रिय चेहरा नहीं है. उसके लिए महत्वपूर्ण है- संगठन की निरंतरता, वैचारिक दिशा, कैडर का नियंत्रण और लंबे समय तक राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की क्षमता.

यहीं से योगी और शाह की तुलना दिलचस्प हो जाती है.

योगी का मॉडल Mass Politics से आता है. उनकी पहचान मुख्यमंत्री बनने से पहले ही गोरखनाथ पीठ और हिंदुत्व की राजनीति से जुड़ी रही है.

अमित शाह का मॉडल इसके उलट Organization-driven Politics से ज्यादा जुड़ा दिखाई देता है. उनका राजनीतिक करियर संगठन, चुनाव प्रबंधन और रणनीतिक विस्तार के इर्द-गिर्द विकसित हुआ.

इसलिए RSS के सामने सवाल शायद यह नहीं है कि 'योगी या शाह?'

बल्कि सवाल यह है- 'मोदी के बाद बीजेपी को किस तरह का नेतृत्व चाहिए?'

2. योगी RSS के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं? क्योंकि उनकी ताकत ‘उधार की’ नहीं दिखती

योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पूंजी को समझने के लिए केवल मुख्यमंत्री पद को देखना पर्याप्त नहीं है.

उनकी पहली ताकत है धार्मिक-सामाजिक वैधता . गोरखनाथ पीठ के महंत के रूप में उनके पास एक ऐसा संस्थागत आधार है, जो सामान्य चुनावी राजनीति से अलग है.

दूसरी ताकत है इलेक्टोरल क्रेडिबिलिटी . गोरखपुर से लंबे समय तक सांसद रहने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी राजनीतिक पहचान बनाई.

तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण ताकत है उनकी स्वतंत्र हिंदुत्व पहचान .

यही चीज उन्हें बीजेपी के कई दूसरे नेताओं से अलग करती है.

योगी की राजनीति में हिंदुत्व केवल पार्टी लाइन का हिस्सा नहीं दिखता, बल्कि उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान का भी हिस्सा है.

यही कारण है कि उनके राजनीतिक कद को केवल संगठन द्वारा दिए गए पद से नहीं मापा जा सकता.

RSS के नजरिए से यह महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि एक ऐसा नेता जिसकी अपनी mass legitimacy और ideological identity हो, वह संगठन के लिए किसी भी सामान्य मुख्यमंत्री से अलग राजनीतिक संपत्ति बन जाता है.

लेकिन इसके साथ एक चुनौती भी है. जिस नेता की अपनी स्वतंत्र लोकप्रियता बहुत मजबूत हो, वह संगठन के लिए शक्ति भी हो सकता है और भविष्य में शक्ति-संतुलन का सवाल भी.

यहीं योगी की ताकत और RSS की संस्थागत सोच के बीच सबसे दिलचस्प संबंध बनता है.

Read more: योगी vs शाह: क्या BJP की ‘सक्सेशन पॉलिटिक्स’ में सबसे बड़ा चेहरा योगी हैं? 4 पॉइंट में समझिए

3. अमित शाह की ताकत दूसरी है: व्यक्ति नहीं, संगठन को चलाने की क्षमता

अगर योगी RSS के लिए Mass Politics का चेहरा हैं, तो अमित शाह संगठनात्मक राजनीति की ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं.

मोदी के साथ लंबे राजनीतिक सहयोग के दौरान शाह की भूमिका चुनावी रणनीति, संगठन विस्तार और सत्ता के राजनीतिक प्रबंधन से जुड़ी रही है.

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की बड़ी जीत के दौरान पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका ने उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया.

बाद में गृह मंत्री के रूप में भी वह केंद्र की सत्ता और बीजेपी के वैचारिक-राजनीतिक एजेंडे के प्रमुख चेहरों में रहे.

लेकिन RSS के नजरिए से शाह की सबसे बड़ी उपयोगिता शायद उनकी organizational understanding है.

वह उस राजनीतिक मशीनरी को समझते हैं जिसमें-

कैडर → संगठन → चुनाव → सरकार → राजनीतिक विस्तार

एक-दूसरे से जुड़े होते हैं.

यही वह क्षेत्र है जहां शाह और योगी के राजनीतिक मॉडल अलग दिखाई देते हैं.

योगी के पास जनता से सीधे जुड़ने वाला एक मजबूत राजनीतिक चेहरा है.

शाह के पास संगठनात्मक नेटवर्क और राजनीतिक रणनीति को संचालित करने का अनुभव है.

इसलिए अगर RSS की प्राथमिकता 'एक लोकप्रिय उत्तराधिकारी' की बजाय 'एक मजबूत संगठनात्मक सिस्टम' है, तो शाह मॉडल की प्रासंगिकता अलग तरह की हो जाती है.

4. असली चिंता: क्या मोदी के बाद BJP फिर ‘एक व्यक्ति’ पर निर्भर होगी?

नरेंद्र मोदी की राजनीति ने बीजेपी को एक बेहद मजबूत central leadership model दिया है.

मोदी पार्टी के सबसे बड़े राष्ट्रीय चेहरे हैं और चुनावी राजनीति में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता बीजेपी की रणनीति का केंद्रीय हिस्सा रही है.

लेकिन हर मजबूत नेतृत्व के सामने एक समय succession का सवाल आता है.

यहीं RSS की दीर्घकालिक सोच महत्वपूर्ण हो सकती है.

अगर मोदी के बाद बीजेपी किसी एक चेहरे पर अत्यधिक निर्भर हो जाती है, तो वह मॉडल भविष्य में उसी तरह की चुनौती पैदा कर सकता है जैसी हर personality-centric political system के सामने आती है.

इसके उलट अगर संघ एक ऐसी नेतृत्व व्यवस्था विकसित करता है जिसमें कई नेता अलग-अलग भूमिकाएं निभाएं, तो किसी एक व्यक्ति के कमजोर पड़ने का असर पूरे संगठन पर कम हो सकता है.

यानी-

Modi Model = Strong Central Face

के मुकाबले

Post-Modi Model = Strong Organization + Multiple Leaders

की संभावना पर भी विचार करना होगा.

इसी संदर्भ में बीजेपी के भीतर नए चेहरों का उभरना महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है.

उदाहरण के लिए, जनवरी 2026 में नितिन नवीन का BJP का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना इसी नजरिए से देखा जा सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि RSS ने योगी या शाह को नकार दिया है, लेकिन इससे निश्चित रूप से एक वैकल्पिक संभावना सामने आती है.

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5. इसलिए ‘योगी vs शाह’ नहीं, असली कहानी है RSS का ‘Post-Modi Political Architecture’

यहीं इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु सामने आता है.

योगी और शाह को दो संभावित उत्तराधिकारियों के रूप में देखने से कहानी आसान जरूर हो जाती है, लेकिन शायद पूरी तस्वीर सामने नहीं आती.

RSS के नजरिए से दोनों नेताओं की उपयोगिता अलग-अलग है.

योगी आदित्यनाथ के पास है-

Mass Appeal + Hindutva Identity + Electoral Base + Administrative Experience

जबकि अमित शाह के पास है-

Organization + Electoral Strategy + Political Management + Institutional Experience

इसलिए RSS के सामने संभवतः तीन रास्ते हो सकते हैं.

पहला—Mass Leader Model:

मोदी के बाद किसी एक बेहद लोकप्रिय चेहरे को राष्ट्रीय नेतृत्व का केंद्र बनाया जाए.

दूसरा—Organization-driven Model:

नेतृत्व का केंद्र व्यक्ति से ज्यादा संगठन और सामूहिक निर्णय व्यवस्था हो.

तीसरा—Hybrid Model:

एक लोकप्रिय राष्ट्रीय चेहरा हो, लेकिन उसके पीछे संगठनात्मक शक्ति और कई प्रभावशाली नेताओं का मजबूत नेटवर्क भी मौजूद रहे.

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क्या RSS एक और सर्वशक्तिशाली चेहरा तैयार करेगा?

या फिर ऐसा नेतृत्व मॉडल बनाएगा जिसमें योगी, शाह और नई पीढ़ी के कई नेता मिलकर पार्टी के अलग-अलग हिस्सों को संभालें?

यही वह जगह है जहां योगी आदित्यनाथ की कहानी सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाती है.

क्योंकि योगी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं हैं. वह बीजेपी के भीतर Mass Leader Model की संभावित सबसे मजबूत अभिव्यक्तियों में से एक हैं.

और अमित शाह सिर्फ एक संभावित उत्तराधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि Organization-driven Model की ताकत के प्रतिनिधि के रूप में देखे जा सकते हैं.

इसलिए लड़ाई अगर है भी, तो सिर्फ दो नेताओं के बीच नहीं है. यह असल में उस सवाल की लड़ाई है कि-

'मोदी के बाद बीजेपी को कौन चलाएगा?' से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है- 'मोदी के बाद बीजेपी चलेगी कैसे?;

और इस सवाल का जवाब तय करने में RSS की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है.