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MP सरकार की 27% OBC आरक्षण याचिका में 10 खामियां:SC में सुनवाई से पहले 3 कैविएट दाखिल; हाईकोर्ट के फैसले को दी है चुनौती
मध्यप्रदेश में 27% OBC आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले ही तकनीकी अड़चनों में उलझ गया है। राज्य सरकार की ओर से जबलपुर हाईकोर्ट के 9 अक्टूबर के फैसले को चुनौती देने के लिए दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने 10 खामियां बताई हैं। इनमें दस्तावेजों की तारीखों में अंतर, अस्पष्ट प्रतियां, पेज नंबरिंग की गड़बड़ी और वकालतनामे में जरूरी औपचारिकताओं की कमी शामिल है। सरकार ने 16 अक्टूबर को याचिका दाखिल की थी। इसे डायरी नंबर 65767/2026 दिया गया है। 22 अक्टूबर को रजिस्ट्री ने आपत्तियां दर्ज कीं। इन्हें दूर किए बिना याचिका को नियमित रूप से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकेगी। फिलहाल इसे नियमित SLP नंबर भी जारी नहीं हुआ है। इसी बीच, सरकार की याचिका के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में तीन कैविएट दाखिल की गई हैं। यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन, सत्यम नंदन और रितु बड़ोले ने कैविएट के जरिए मांग की है कि हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने या कोई अन्य अंतरिम आदेश देने से पहले उनका पक्ष भी सुना जाए। दस्तावेजों से वकालतनामे तक 10 आपत्तियां सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने याचिका के कवर पेज, इंडेक्स और संबंधित दस्तावेजों पर दर्ज तारीखों में अंतर पर सवाल उठाए हैं। पेज नंबरिंग दुरुस्त करने, हाईकोर्ट के जजों के नाम दर्ज करने और पेज 1 से 11 तथा 13 की अस्पष्ट प्रतियों की जगह साफ, टाइप की हुई प्रतियां देने को कहा गया है। रंगीन चार्ट और जानकारी वाले पन्नों की चार अलग-अलग प्रतियां मांगी गई हैं। पेज 18 पर तारीख के अंतर, दूसरे आवेदनों की पेज नंबरिंग और पेज 392-393 की अस्पष्ट प्रतियों पर भी आपत्ति है। सरकार ने पैरवी के लिए कई वकील किए नियुक्त वकालतनामे में 'आइडेंटिफाइड' और 'सर्टिफाइड' जैसे जरूरी उल्लेख नहीं होने तथा दूसरे याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर छूटने की बात कही गई है। राहत संबंधी हिस्से से अतिरिक्त विवरण हटाने को भी कहा गया है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए सात अतिरिक्त महाधिवक्ता और चार उप महाधिवक्ता नियुक्त किए हैं। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह समेत कई वरिष्ठ वकील भी मामले से जुड़े हैं। हाईकोर्ट ने 14% आरक्षण रखने के दिए थे निर्देश जबलपुर हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में OBC आरक्षण 14% रखने के निर्देश दिए थे। हालांकि, 29 सितंबर 2022 तक 27% आरक्षण के आधार पर नियुक्त अभ्यर्थियों को राहत दी गई। उन्हें नौकरी से नहीं हटाया जाएगा और अतिरिक्त पदों का समायोजन आगामी तीन भर्ती प्रक्रियाओं में किया जाएगा। 29 सितंबर 2022 के बाद 14% से अधिक आरक्षण के आधार पर पद भरने की व्यवस्था स्वीकार नहीं की गई। रोके गए 13% पदों को अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से भरने की प्रक्रिया तीन महीने में पूरी करने के निर्देश दिए गए। इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया। कमलनाथ सरकार ने 2019 में 27% किया था आरक्षण तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने 2019 में OBC आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% किया था। फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई और फैसला करने के लिए मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया था। हाईकोर्ट में 5 अगस्त 2026 को सुनवाई पूरी हुई और फैसला सुरक्षित रख लिया गया। 9 अक्टूबर को डब्ल्यूपी नंबर 5901/2019, अशिता दुबे एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य और इससे जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुनाया गया। भर्तियां अटकीं तो आया 87:13 का फॉर्मूला आरक्षण का मामला अदालत में लंबित रहने के कारण मध्यप्रदेश में भर्तियों के परिणाम प्रभावित हुए। साल 2022 में सामान्य प्रशासन विभाग ने 87:13 का फॉर्मूला बनाया और MPPSC को इसके आधार पर रिजल्ट जारी करने का सुझाव दिया। इस व्यवस्था में 87% पदों पर परिणाम जारी किए जाते थे, जबकि 13% पद होल्ड रखे गए थे। ये वही पद थे, जिन्हें कमलनाथ सरकार ने OBC वर्ग के लिए 27% आरक्षण के तहत अतिरिक्त हिस्से के रूप में घोषित किया था। ----------------------- ये खबर भी पढ़ें… MP में OBC आरक्षण 27% नहीं, 14% ही रहेगा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने वाले 2019 के कानून को रद्द कर दिया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने इसे असंवैधानिक बताते हुए स्पष्ट किया कि प्रदेश में OBC को 14% आरक्षण ही मिलेगा।पूरी खबर पढ़ें