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FIR में नाम नहीं, फिर भी 6 साल काटी जेल, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर लगाया 6 लाख का जुर्माना, जानिए पूरा मामला

INT News26 October 2026 at 11:35 pm

UP News: उत्तर प्रदेश के आगरा से जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां जांच में गंभीर लापरवाही सामने आने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया. अपहरण और हत्या के आरोप में एक शख्स को करीब छह साल तक जेल में रहना पड़ा, लेकिन बाद में वह बरी हो गया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को छह लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. इतना ही नहीं, अदालत ने साफ किया है कि अगर एक महीने के भीतर मुआवजे की रकम नहीं दी गई, तो सरकार को 18 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा.

अपहरण और हत्या का आरोप, छह साल तक जेल में रहा शख्स

मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का बताया गया है. अपहरण और हत्या के एक मुकदमे में अरुण उर्फ दीपक को आरोपी बनाया गया था. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह 14 नवंबर 2019 से हिरासत में था. मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसे करीब छह साल जेल में बिताने पड़े. हालांकि, बाद में वह आरोपों से बरी हो गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर जांच में हुई गंभीर लापरवाही सामने आई.

FIR में नाम नहीं, सबूतों पर भी उठे सवाल

मामले की जांच में कई गंभीर खामियां सामने आईं. शुरुआती एफआईआर में अरुण उर्फ दीपक का नाम नहीं था. वहीं, सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लेकर भी कमियां सामने आईं. जांच में हुई इन लापरवाहियों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया. अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि एक व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा, जबकि बाद में वह आरोपों से बरी हो गया.

यूपी सरकार को एक महीने में देने होंगे 6 लाख रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को अरुण उर्फ दीपक को छह लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. अदालत ने इसके लिए एक महीने का समय तय किया है. अगर सरकार निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं करती है, तो मुआवजे की रकम पर 18 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज देना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने जांच में लापरवाही पर जताई नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए जांच में हुई गंभीर लापरवाही पर नाराजगी जताई. अपहरण और हत्या जैसे गंभीर मामले में जांच की खामियों को अदालत ने महत्वपूर्ण माना. छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहने के बाद बरी हुए व्यक्ति को मुआवजा देने का आदेश जांच एजेंसियों की जवाबदेही के लिहाज से अहम है.

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