समाचार · छत्तीसगढ़
हत्या के दोषी की दया याचिका पर हाईकोर्ट का इनकार:जेल नियमों में पुनर्विचार का प्रावधान नहीं; छात्र की हत्या में मिली थी सजा
बिलासपुर हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ जेल नियमों के तहत एक बार दया याचिका खारिज होने के बाद उस पर पुनर्विचार का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कैदी ने अपनी दया याचिका पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। दरअसल, बिलासपुर के कुदुदंड निवासी नीरज माली उर्फ गोलू को वर्ष 2001 में एक छात्र की हत्या और बलवे के मामले में अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ उसकी अपील हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट से भी खारिज हो गई थी, जिससे उसकी सजा बरकरार रही। सजा बरकरार रहने के बाद कैदी नीरज ने संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर कर शेष सजा माफ करने की गुहार लगाई थी। हालांकि, मार्च 2023 में यह दया याचिका खारिज कर दी गई थी। इसके बाद जुलाई 2023 में कैदी की पत्नी ने पारिवारिक परिस्थितियों और लंबी हिरासत का हवाला देते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए आवेदन दिया। गृह (जेल) विभाग ने नियमों का हवाला देकर इस आवेदन को अमान्य कर दिया था। कैदी ने गृह विभाग के इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उसने तर्क दिया कि वह वर्ष 1999 से विभिन्न अवधियों में लंबे समय तक जेल में रह चुका है। साथ ही, जेल अधीक्षक और कलेक्टर ने भी उसकी रिहाई की सकारात्मक सिफारिश की थी। कैदी ने मानवीय आधार पर राहत की मांग करते हुए बताया था कि उसके बहन और पिता का निधन हो चुका है, और घर में बूढ़ी मां और बच्चों की जिम्मेदारी उस पर है। वहीं, राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि कैदी ने केवल 9 साल, 2 महीने और 25 दिन की ही वास्तविक सजा काटी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जेल नियमावली के नियम 775 में दया याचिका पर पुनर्विचार का कोई प्रावधान नहीं है। माफी देने का अधिकार राज्यपाल को हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की पत्नी द्वारा दिया गया आवेदन एक नई दया याचिका नहीं, बल्कि पुराने फैसले को बदलने की मांग थी, जिसकी अनुमति जेल नियम नहीं देते। कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत माफी देने का अधिकार केवल संवैधानिक प्राधिकारी यानी राज्यपाल के पास सुरक्षित है, हाईकोर्ट इसमें अपनी मर्जी से फैसला नहीं बदल सकता। क्या है मामला पेशी से लौट रहे सीएमडी के छात्र सीपत के ग्राम पिपरा निवासी दलबीर सिंह की बिलासपुर जिला कोर्ट के सामने हत्या कर दी गई थी। 6 सितंबर 1999 को दिनदहाड़े हुए हत्याकांड में कुदुदंड निवासी नीरज माली उर्फ, संजय उर्फ संजू पाण्डेय और राजा दुबे शामिल थे। आरोपियों ने धारदार हथियार से हमला कर हत्या कर दी थी। इस मामले में जिला कोर्ट ने वर्ष 2001 में आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी।