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खुद की माटी से बने दीयों से रोशन होगा बड़वानी:बड़वानी में रोज बनाए जा रहे 2 हजार से दीये; सोशल मीडिया से बढ़ा लोगों का रुझान
बड़वानी में दीपावली के लिए बाजारों में दीयों की सजावट शुरू हो गई है। रंग-बिरंगे आर्टिफिशियल और गुजरात से आए डिजाइनर दीयों के बीच स्थानीय कुम्हारों के मिट्टी के दीये 20 रुपए दर्जन बिक रहे हैं। खास बात ये है कि हर बार की तरह इस बार भी बड़वानी अपनी माटी से बने दीयों से रोशन होगा। दीपावली नजदीक आते ही कुम्हारों ने दीये बनाने का काम तेज कर दिया है। जिले के कुम्हार दिन-रात मिट्टी के दीये बना रहे हैं। साल में एक बार दीपावली पर बड़ी संख्या में इनका इस्तेमाल होता है। पहले मिट्टी के दीयों के अलावा लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। पिछले कुछ सालों में रंग-बिरंगे आर्टिफिशियल दीयों की बिक्री बढ़ने से कुम्हारों को चिंता हुई। अब सोशल मीडिया पर जागरूकता के चलते लोगों का रुझान फिर मिट्टी के दीयों की ओर बढ़ रहा है। एक महीने पहले बन रहे शहर के पानवाड़ी मोहल्ले में धोबड़िया तालाब के पास बरसों से दीये बना रहे दीपचंद प्रजापति ने बताया कि वे एक महीने से दीये बना रहे हैं। काम सुबह 4 बजे शुरू होता है। दिनभर में वे करीब 2 हजार दीये बनाते हैं। दीपचंद ने बताया कि पहले रंग-बिरंगे आर्टिफिशियल दीयों की बिक्री बढ़ने से उन्हें चिंता होने लगी थी। अब सोशल मीडिया से जागरूकता बढ़ने के कारण उनके काम में तेजी आई है। बनाने और पकाने का खर्च बढ़ा शिवकुमार गोले ने बताया कि मिट्टी के दीये बनाने और पकाने का खर्च बढ़ गया है। मेहनत के हिसाब से उन्हें आर्थिक लाभ नहीं हो पा रहा है, इसलिए इस बार वे कम दीये बना रहे हैं। उनके मुताबिक, आर्टिफिशियल दीयों के बाजार में आने से उनके काम पर असर पड़ा है, लेकिन सोशल मीडिया पर जागरूकता के कारण उनकी बिक्री में अब कमी आई है। धोबड़िया तालाब इलाके के सात-आठ परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बना रहे हैं। वे दीपावली की तैयारी गणेश चतुर्थी से शुरू करते हैं। परिवार के बच्चे, महिलाएं और बड़े सभी इस काम में जुटते हैं। हर परिवार करीब 2 से 3 हजार दीये बनाता है। मिट्टी के दाम भी बढ़े
दीये बनाने वाले गौरव गोले ने बताया कि पहले मिट्टी आसानी से और कम कीमत पर मिल जाती थी। अब एक ट्रॉली मिट्टी के लिए करीब तीन हजार रुपए खर्च करने पड़ते हैं। पहले हाथ के चाक से दीये बनते थे, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक का इस्तेमाल करना पड़ता है। इससे मेहनत कुछ कम हुई है, पर बिजली का खर्च बढ़ गया है। गौरव के मुताबिक, पहले बिजली का बिल 200 से 500 रुपए तक आता था। अब यह 1,500 से 2,000 रुपए तक पहुंच गया है। दुर्गा गोले ने बताया कि मिट्टी का दीया बनाने में कई दिन लगते हैं। पहले मिट्टी को छानकर पानी में भिगोया जाता है। फिर उसे सुखाकर अच्छी तरह गूंथा जाता है और उसमें से छोटे कंकड़-पत्थर निकाले जाते हैं।