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शिक्षकों को 100 प्रतिशत वेतन देने का फैसला सुरक्षित:हाईकोर्ट में प्रोबेशन पीरियड में 70, 80 और 90 प्रतिशत वेतन देने के विरोध में लगी है याचिका
प्रदेश के ट्राइबल एजुकेशन और स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत उच्च माध्यमिक, माध्यमिक एवं प्राथमिक शिक्षकों को परिवीक्षा अवधि के दौरान 70%, 80% और 90% वेतन के स्थान पर 100 प्रतिशत वेतन दिए जाने से जुड़े मामले में जल्द फैसला आ सकता है। सोमवार को हाईकोर्ट जबलपुर में सुनवाई और बहस के बाद न्यायालय ने फैसला सुरक्षित (Heard Reserved) रख लिया है। प्रोबेशन पीरियड वाले ऐसे शिक्षकों की संख्या 35 हजार के करीब बताई जा रही है। कोर्ट में चल रहे प्रकरण Uma wanshi Others Vs. State of Madhya Pradesh में सोमवार को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता धीरज तिवारी ने पक्ष रखा और 70, 80, 90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था के विरुद्ध कानूनी एवं संवैधानिक आधारों पर दलीलें पेश कीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से न्यायालय के समक्ष कहा गया कि संबंधित शिक्षक किसी अस्थायी या मानदेय व्यवस्था के अंतर्गत नियुक्त नहीं हुए हैं, बल्कि निर्धारित पात्रता परीक्षा एवं नियमित चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद स्वीकृत नियमित पदों पर नियुक्त किए गए हैं। इसके बावजूद परिवीक्षा अवधि के प्रथम वर्ष में 70 प्रतिशत, द्वितीय वर्ष में 80 प्रतिशत तथा तृतीय वर्ष में 90 प्रतिशत वेतन दिया गया, जबकि उनसे नियमित शिक्षकों के समान पूर्ण कार्य एवं दायित्वों का निर्वहन कराया गया। परिवीक्षा अवधि के नाम पर वेतन रोकना गलत बताया याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि जब कार्य, दायित्व और जिम्मेदारियां समान हैं, तब केवल परिवीक्षा अवधि के आधार पर वेतन का एक हिस्सा रोकना समानता के संवैधानिक सिद्धांत एवं समान कार्य के लिए समान वेतन की अवधारणा के विपरीत है। यह भी कहा गया कि विधिवत चयनित एवं नियमित पद पर नियुक्त कर्मचारी को “स्टाइपेंड” या घटे हुए वेतन की व्यवस्था में रखना उचित नहीं है। पूर्व के न्यायिक निर्णयों का भी दिया गया हवाला अधिवक्ता धीरज तिवारी ने न्यायालय के समक्ष समान प्रकृति के पूर्व निर्णयों तथा 12 दिसंबर 2019 के सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र से संबंधित न्यायिक निर्णयों का भी हवाला दिया। याचिका में यह भी आधार लिया गया है कि यह परिपत्र एवं परिवीक्षा अवधि के दौरान घटे हुए वेतन की व्यवस्था का प्रश्न पूर्व में न्यायिक परीक्षण से गुजर चुका है। याचिकाकर्ताओं की ओर से न्यायालय से वर्तमान मामले में भी समान न्यायिक संरक्षण प्रदान करने की मांग की गई।