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रूपी सोरेन : एक खामोश तपस्या, जिसने संघर्ष की विरासत को संभाले रखा

Tribute To Rupi Soren: कुछ जीवन ऐसे होते हैं, जिनकी कहानी मंचों से नहीं कही जाती. वे इतिहास के बड़े घटनाक्रमों में पर्दे के पीछे से अपनी भूमिका निभाते हैं. समय बीत जाने के बाद उनकी खामोश तपस्या सामने आती है. रूपी सोरेन किस्कू का जीवन भी ऐसी ही एक कहानी है- त्याग, धैर्य, संघर्ष और परिवार के प्रति अटूट समर्पण की कहानी.
झारखंड आंदोलन के प्रणेता दिशोम गुरु स्व शिबू सोरेन के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष की चर्चा जब भी होगी, उस संघर्ष के पीछे मजबूती से खड़ी रूपी सोरेन की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकेगा. उन्होंने कभी अपने योगदान का शोर नहीं किया. जब पति समाज और अधिकार की लड़ाई के लिए घर से दूर जंगल-पहाड़ों में भटक रहे थे, तब रूपी सोरेन ने घर की चौखट पर रहकर उस संघर्ष की दूसरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी थी.
वर्ष 1962 में, महज 18 वर्ष की उम्र में चांडिल क्षेत्र की रहनेवाली रूपी किस्कू का विवाह शिबू सोरेन से हुआ. कम उम्र में गृहस्थी संभालने वाली रूपी सोरेन को जल्द ही ऐसे जीवन का सामना करना पड़ा, जिसमें पति का अधिकांश समय परिवार से दूर संघर्ष में बीतता था.
शिबू सोरेन अपने पिता सोबरन सोरेन की हत्या से आहत थे. महाजनी प्रथा के खिलाफ समाज को संगठित करने और आदिवासी समाज के हक-अधिकार की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने घर-द्वार छोड़ दिया. रास्ता कठिन था, परिस्थितियां विपरीत थीं और परिवार के लिए भी यह दौर आसान नहीं था. ऐसे समय में रूपी सोरेन ने घर को संभाला.
उन्होंने बड़ी बेटी अंजनी सोरेन और तीन बेटों दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन तथा बसंत सोरेन की परवरिश की. पति संघर्ष के मैदान में थे, तो वह परिवार की जिम्मेदारियां संभालने लगीं. बच्चों की जरूरतों से लेकर परिवार की चिंता तक, सब कुछ उन्होंने अपने हिस्से में लिया. लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान कभी किसी को नहीं दिखा.
उन्होंने बच्चों को केवल बड़ा नहीं किया, बल्कि उन्हें संघर्ष की भाषा समझायी. अन्याय के सामने खड़े होने का साहस दिया. अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का संस्कार दिया. स्वाभिमान के साथ जीवन जीने की सीख दी. ये संस्कार उन्हें अपनी सास सोनामनी मुर्मू से मिले थे और उन्होंने इन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाया.
संघर्ष बाहर, तपिश घर के भीतर
शिबू सोरेन का संघर्ष केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था. उसके साथ कानूनी संकट आये, आरोप आये, लंबे इंतजार के दौर आये और परिवार के लिए कठिन परिस्थितियां भी आयीं. ऐसे हर दौर में रूपी सोरेन ने धैर्य का दामन नहीं छोड़ा.
चुनाव के मैदान में बाबूलाल मरांडी से हारीं
1990 के दशक के अंत का दौर भी सोरेन परिवार और झामुमो के लिए चुनौतीपूर्ण था. इसी समय वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में झामुमो ने दुमका सीट से रूपी सोरेन किस्कू को भाजपा के कद्दावर नेता और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बाबूलाल मरांडी के खिलाफ मैदान में उतारा.
रूपी सोरेन ने चुनाव में उन्हें कड़ी टक्कर दी. बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले, जबकि रूपी सोरेन को 1,96,493 मत प्राप्त हुए. महज 4,648 मतों के अंतर से चुनाव का फैसला हुआ. यह चुनाव उनके लिए केवल एक राजनीतिक मुकाबला नहीं था. यह उस समय परिवार और आंदोलन के साथ खड़े होने की उनकी प्रतिबद्धता की सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी थी.
एक मां, जिसने आने वाली पीढ़ी को तैयार किया
समय आगे बढ़ता गया. शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर झारखंड आंदोलन से राज्य की सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा. परिवार के दूसरे सदस्य भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए. लेकिन इस पूरी यात्रा की नींव में उस महिला की तपस्या भी थी, जिसने वर्षों तक परिवार को संभालते हुए अगली पीढ़ी को तैयार किया.
रूपी सोरेन की जिंदगी को केवल शिबू सोरेन की पत्नी के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा. वह उस दौर की साक्षी थीं, जब झारखंड आंदोलन का संघर्ष घरों की दहलीज तक पहुंचा था. उन्होंने उस संघर्ष को करीब से जिया था. उन्होंने इंतजार को जिया, जिम्मेदारियों को जिया और परिवार के लिए अपने हिस्से का त्याग भी जिया. उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद कोई पद या राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि वे संस्कार हैं, जो उन्होंने अपने बच्चों में रोपे.
अब पीछे छूट गयीं स्मृतियां
किसी परिवार की यात्रा में कुछ लोग सामने दिखाई देते हैं और कुछ उसकी आत्मा की तरह भीतर मौजूद रहते हैं. रूपी सोरेन उसी दूसरी श्रेणी की थीं. उनकी उपस्थिति ने परिवार को स्थिरता दी और उनकी ममता ने संघर्ष के कठिन वर्षों को सहने की ताकत दी.
आज जब उनके जीवन को पीछे मुड़कर देखा जाता है तो महसूस होता है कि इतिहास केवल बड़े आंदोलनों, नेताओं और चुनावों से नहीं बनता. इतिहास उन अनगिनत त्यागों से भी बनता है, जिन्हें कोई मंच नहीं मिलता और जिनका कोई शोर नहीं होता. रूपी सोरेन का जीवन ऐसी ही एक खामोश तपस्या थी.
उन्होंने पति के संघर्ष को अपना संघर्ष माना, परिवार की जिम्मेदारियों को अपना धर्म समझा और बच्चों के भविष्य को अपनी सबसे बड़ी साधना बनाया. उन्होंने अपने हिस्से की कठिनाइयों को शिकायत नहीं, बल्कि परिवार की मजबूती में बदल दिया.
आज उनके जाने के बाद उनके पीछे केवल एक परिवार की स्मृतियां नहीं हैं. उनके साथ जुड़ी हैं संघर्ष के उन दिनों की अनगिनत यादें, एक मां की ममता, एक पत्नी का धैर्य और उस पीढ़ी के सपने, जिसने अपने अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. रूपी सोरेन अब स्मृतियों में हैं, लेकिन उनके जीवन की वह खामोश ताकत सोरेन परिवार की संघर्षगाथा में हमेशा महसूस होती रहेगी.
उनकी स्मृति को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उनके द्वारा संजोये गये संघर्ष, स्वाभिमान, अधिकार और परिवार को साथ लेकर चलने के संस्कार आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहें. विनम्र श्रद्धांजलि.