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22 साल पहले राज्यवर्धन सिंह राठौड ने रचा था कीर्तिमान, शूटिंग में जीता था ओलंपिक का पहला सिल्वर मेडल

INT News17 August 2026 at 06:10 am

Rajyavardhan Singh Rathore : 17 अगस्त 2004 भारतीय खेल इतिहास के उन खास दिनों में शामिल है, जब एथेंस ओलंपिक में एक फौजी ने अपने सटीक निशानों से पूरे देश को जश्न मनाने का मौका दिया था. मेजर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने पुरुषों की डबल ट्रैप शूटिंग स्पर्धा में सिल्वर मेडल जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया था. यह एथेंस ओलंपिक में भारत का एकमात्र पदक था और व्यक्तिगत स्पर्धा में देश के लिए पहला ओलंपिक सिल्वर मेडल भी. उनकी इस उपलब्धि को आज 22 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन वह ऐतिहासिक पल आज भी भारतीय खेल प्रेमियों की यादों में ताजा है.

17 अगस्त को शुरू हुआ मेडल का सफर

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एथेंस ओलंपिक में पुरुषों की डबल ट्रैप स्पर्धा एक ही दिन में पूरी होनी थी. प्रतियोगिता में तीन शुरुआती राउंड और फिर फाइनल राउंड था. राठौड़ ने पहले राउंड में 46 का स्कोर किया और दूसरे स्थान पर रहे. दूसरे राउंड में तेज हवा ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं और उनका स्कोर 43 रहा. इसके कारण वह छठे स्थान पर खिसक गए. लेकिन राठौड़ ने हिम्मत नहीं छोड़ी. तीसरे राउंड में उन्होंने फिर 46 का स्कोर किया और कुल 135 अंकों के साथ फाइनल के लिए क्वालीफाई कर लिया. दूसरी ओर, यूएई के शेख अहमद अल-मकतूम तीनों राउंड में 48-48 के स्कोर के साथ 144 अंक लेकर सबसे आगे थे. गोल्ड की दौड़ में उनकी स्थिति बेहद मजबूत थी.

आखिरी शॉट तक जारी रही जंग

फाइनल में राठौड़ ने शानदार वापसी की. शुरुआती 30 शॉट में सिर्फ एक निशाना चूकने के बाद वह दूसरे स्थान की दौड़ में मजबूत स्थिति में पहुंच गए. अल-मकतूम ने बेहतरीन प्रदर्शन जारी रखा और 40वें शॉट के बाद ही गोल्ड पर अपनी पकड़ पक्की कर ली. आखिरकार उन्होंने 10 अंकों के अंतर से स्वर्ण पदक जीता.अब भारत की नजर रजत पदक पर थी. राठौड़ ने आखिरी दो जोड़ियों में अपने निशाने बिल्कुल सटीक लगाए और चीन के वांग झेंग से एक अंक आगे रहते हुए रजत पदक अपने नाम कर लिया.

ओलंपिक से पहले इटली में की खास तैयारी

जनवरी 2004 के बाद राठौड़ ने विशेषज्ञों से ट्रेनिंग लेने का फैसला किया और इसके लिए वे इटली पहुंचे. वहां उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन लुका मारिनी और ओलंपिक चैंपियन रसेल मार्क से प्रशिक्षण लिया. वह रोजाना करीब 80 शॉट्स की प्रैक्टिस करते थे. उन्होंने अपनी ट्रेनिंग का पूरा कैलेंडर तक तैयार किया था-कब क्या करना है, कितनी देर अभ्यास करना है और रोज कितने शॉट लगाने हैं, सब कुछ पहले से तय था.

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सेना से शूटिंग रेंज तक पहुंची कहानी

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का खेलों से रिश्ता बचपन से था. भारतीय सैन्य अकादमी में भी वह बेहतरीन खिलाड़ियों में गिने जाते थे. लेकिन पेशेवर शूटिंग में उनका सफर काफी बाद में शुरू हुआ. साल 1998 में, 28 साल की उम्र में राठौड़ ने खेल निशानेबाजी को गंभीरता से अपनाया. भारतीय सेना ने अपनी शूटिंग टीम बनाने का फैसला किया था और राठौड़ उसका हिस्सा बने. सेना की ट्रेनिंग से मिली अनुशासन, एकाग्रता और दबाव में शांत रहने की क्षमता ने उन्हें इस खेल में तेजी से आगे बढ़ने में मदद की. 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन क्ले टारगेट चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता. इसके अलावा विश्व निशानेबाजी और शॉटगन चैंपियनशिप में भी उनके नाम पदक रहे.

बदल दी भारतीय शूटिंग की तस्वीर

17 अगस्त 2004 को जीता गया यह रजत पदक भारतीय खेलों के लिए ऐतिहासिक था. राठौड़ उस ओलंपिक में भारत के इकलौते पदक विजेता रहे. साथ ही वह व्यक्तिगत स्पर्धा में ओलंपिक रजत पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने. उनकी उपलब्धि ने देश में शूटिंग को लेकर उम्मीद और जुनून को नई दिशा दी. आने वाले वर्षों में भारतीय निशानेबाजों ने ओलंपिक और विश्व स्तर पर कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं.

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