Saturday, 24 October 2026
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दशहरे पर रावण का पुतला नहीं,नग्न प्रतिमा का होता वध:धमतरी के सोनामगर में पुजारी खडग से मिट्टी से बने सहस्त्रबाहु रावण का वध करता है

INT News24 October 2026 at 08:56 pm

वक्त बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन धमतरी जिले के सोनामगर गांव में दशहरा मनाने की परंपरा आज भी कायम है। यहां दशहरा विजयादशमी के दिन नहीं, बल्कि एकादशी को मनाया जाता है। इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि यहां बुराई के प्रतीक के रूप में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि सहस्त्रबाहु रावण की नग्न प्रतिमा बनाकर उसका वध किया जाता है। प्रतिमा का पुजारी खड्ग से वध करता है। इसके बाद श्रद्धालु प्रतिमा की मिट्टी को नोच-नोचकर अपने घर ले जाते हैं और एक-दूसरे को तिलक लगाकर जीत की खुशियां मनाते हैं। धमतरी से करीब 70 किलोमीटर दूर सिहावा क्षेत्र के सोनामगर गांव में दशहरे की इस अनोखी परंपरा को देखने हर साल दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। सुबह से ही गांव में लोगों का जुटना शुरू हो जाता है। श्रद्धालु पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के साक्षी बनने के लिए यहां पहुंचते हैं। गांव में मनाया जाने वाला यह दशहरा अपनी अलग मान्यता, पूजा-पद्धति और रावण वध की परंपरा के कारण खास पहचान रखता है। एकादशी को होता है सहस्त्रबाहु रावण का वध सोनामगर गांव में दशहरे का आयोजन एकादशी के दिन किया जाता है। यहां बुराई के प्रतीक के रूप में सहस्त्रबाहु रावण की नग्न प्रतिमा बनाई जाती है। पूजा-पाठ और मंत्रोच्चार के बाद मंदिर का पुजारी खड्ग से प्रतिमा को खंडित कर उसका वध करता है। इसके बाद प्रतिमा की मिट्टी लेने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। लोग प्रतिमा से मिट्टी निकालकर अपने घर ले जाते हैं। इसके बाद एक-दूसरे को तिलक लगाकर विजय की खुशियां मनाते हैं। इस परंपरा में प्रतिमा की मिट्टी को श्रद्धा के साथ घर ले जाने की मान्यता जुड़ी हुई है। माता चंडिका से जुड़ी है परंपरा की मान्यता स्थानीय मान्यता के अनुसार, युगों पहले वासना से ग्रसित इस असुर का वध माता चंडिका ने अपने खड्ग से किया था। माना जाता है कि तभी से यह परंपरा चली आ रही है। इलाके के लोग आज भी इस मान्यता और परंपरा के प्रति आस्था रखते हैं। रावण वध से पहले गांव के बाहर शीतला माता की साधना की जाती है। इसके बाद चांदमारी की रस्म होती है। शाम ढलने के बाद पूजा-अर्चना का दौर शुरू होता है और फिर सहस्त्रबाहु रावण की प्रतिमा के वध की परंपरा निभाई जाती है। घर-घर से लाई मिट्टी से बनाई जाती है प्रतिमा इस आयोजन की तैयारी भी परंपरागत तरीके से की जाती है। प्रतिमा बनाने के लिए गांव के घर-घर से मिट्टी लाई जाती है। अलसुबह से ही इस मिट्टी को गढ़ने का काम शुरू हो जाता है। गांव का कुम्हार पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रतिमा बनाने की जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। इस तरह प्रतिमा का निर्माण भी गांव की सामूहिक भागीदारी और पुरानी परंपरा का हिस्सा है। ग्रामीणों के सहयोग से तैयार की गई प्रतिमा के वध के साथ दशहरे का मुख्य आयोजन पूरा होता है। रावण वध के बाद माता को शांत करने की रस्म स्थानीय परंपरा के अनुसार, रावण वध के बाद माता को शांत करने के लिए कुष्मांडा की बलि दी जाती है। इसके बाद माता को शांत कर उनके अस्त्र को चरणों में रखा जाता है। देवताओं को श्रीफल भेंट कर विदाई दी जाती है। सोनामगर का दशहरा अपनी इन विशिष्ट रस्मों के कारण दूसरे स्थानों पर होने वाले दशहरा आयोजनों से अलग है। यहां प्रतिमा निर्माण से लेकर पूजा, वध और उसके बाद की रस्में एक निश्चित परंपरा के अनुसार निभाई जाती हैं। दशहरे के आयोजन में महिलाएं शामिल नहीं होतीं सोनामगर में दशहरा मनाने की एक और विशेषता यह है कि इस आयोजन में महिलाएं शामिल नहीं होतीं। गांव के लोग पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा का पालन करते हैं। एकादशी को होने वाले इस आयोजन में शामिल होने के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। समय के साथ त्योहार मनाने के तरीके भले ही बदल गए हों, लेकिन सोनामगर में दशहरे की यह परंपरा आज भी उसी तरह कायम है। सहस्त्रबाहु रावण की प्रतिमा का वध, मिट्टी को घर ले जाने की मान्यता और पूजा की विशिष्ट रस्में इस गांव के दशहरे को अलग पहचान देती हैं।