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VIDEO: मलबे में अपनों को खोजता इंसान, नेपाल की त्रासदी में हजारों परिवारों का दर्द; हर ‘लापता’ के पीछे एक इंतजार

INT News28 August 2026 at 10:31 pm

Nepal Flood News : हम पहाड़ों की खूबसूरती को अक्सर दूर से देखते हैं. कैमरे के फ्रेम, पोस्टकार्ड और पर्यटन के विज्ञापनों में पहाड़ बेहद खूबसूरत नजर आते हैं. लेकिन पहाड़ की असली कहानी उसकी चोटियों में नहीं, उसकी घाटियों में लिखी जाती है. वहीं मौसम बदलता है, बर्फ पिघलती है, चट्टानें खिसकती हैं और नदियां अपना रास्ता बदल देती हैं. नेपाल में आयी भीषण आपदा ने इसी पहाड़ी जीवन की उस भयावह तस्वीर को सामने ला दिया है, जिसे दूर से देख पाना शायद संभव नहीं.

26 अगस्त से शुरू हुई इस त्रासदी में हिमालयी क्षेत्र में अचानक आयी बाढ़ और मलबे ने गांवों, सड़कों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है. नेपाल और चीन की सीमा से लगे इलाकों में हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं. 28 अगस्त तक नेपाल और चीन में मृतकों की संख्या सैकड़ों में पहुंच चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं. राहत और बचाव अभियान के बीच सीमा क्षेत्र में बनी एक बैरियर झील ने खतरे को और बढ़ा दिया, जिसके कारण कुछ समय के लिए बचाव अभियान रोकना पड़ा. बाद में स्थिति का आकलन करने के बाद अभियान दोबारा शुरू किया गया.

पहाड़ों के बीच सिर्फ पानी और मलबा नहीं बहा

इस आपदा में सिर्फ पानी नहीं बहा. किसी का घर बह गया, किसी की दुकान, किसी की रोजी-रोटी और किसी परिवार की वर्षों की मेहनत मलबे में दब गयी. लेकिन सबसे बड़ा दर्द उन परिवारों का है, जिनके अपने अब तक लापता हैं.

‘लापता’ सुनने में महज एक शब्द है, लेकिन किसी परिवार के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा होता है. इसका मतलब है दरवाजा खुला रखना, फोन की घंटी का इंतजार करना, हर आती गाड़ी और हर गुजरते व्यक्ति को उम्मीद भरी नजरों से देखना और रात में खुद से कहना- शायद वह बच गया होगा.

यही वह जगह है, जहां खबरों का आंकड़ा इंसानी पीड़ा में बदल जाता है.

हर लापता व्यक्ति के पीछे एक पूरा संसार

नेपाल की इस त्रासदी में लापता लोगों की संख्या लगातार बढ़ती रही है. अलग-अलग अपडेट में संख्या बदलती रही है, लेकिन सैकड़ों से लेकर हजारों लोगों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आयी है. इनमें स्थानीय लोग ही नहीं, दूसरे देशों से पहुंचे पर्यटक और तीर्थयात्री भी शामिल हैं.

लेकिन आंकड़े यह नहीं बताते कि इनमें किसी की मां इंतजार कर रही है, किसी की पत्नी रास्ता देख रही है, किसी पिता को बेटे की तलाश है या कोई बच्चा अपने घर लौटने वाले पिता का इंतजार कर रहा है.

नेपाल सिर्फ हिमालय नहीं, गीतों में सांस लेता देश है

नेपाल को हम अक्सर हिमालय की तस्वीरों से पहचानते हैं. लेकिन नेपाल की असली पहचान उसकी तस्वीरों से कहीं आगे उसके लोकगीतों में भी छिपी है. नेपाली लोकगीतों में पहाड़ सिर्फ दिखाई नहीं देता, वह बोला जाता है. नदी सिर्फ बहती नहीं, वह किसी की कहानी लेकर आती है. जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, वह किसी की याद बन जाता है.

‘उकाली-ओराली’ यानी चढ़ाई और उतराई के बीच ही पहाड़ी जीवन चलता है. पहाड़ के पार जाना सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है. यह एक गांव से दूसरे गांव, एक घर से दूसरे घर और एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते तक पहुंचने का रास्ता है.

इसलिए जब बाढ़ किसी सड़क या पुल को बहा देती है, तो सिर्फ सड़क नहीं टूटती. कई बार दो परिवारों, दो गांवों और दो स्मृतियों के बीच का रास्ता भी टूट जाता है.

लोकगीतों में दर्ज होता है आपदा का दर्द

इतिहास को बचाने के हमारे पास कई तरीके हैं- किताबें, दस्तावेज, तस्वीरें और सरकारी रिकॉर्ड. लेकिन गांवों के पास इतिहास को बचाने का एक और तरीका है और वह है लोकगीत.

सरकारी रिकॉर्ड यह बता सकता है कि किसी बाढ़ में कितने लोगों की मौत हुई. लेकिन उस बाढ़ के बाद गांव की पहली रात कैसी थी, किस मां ने बेटे का इंतजार किया, किस घर की खिड़की देर तक खुली रही और किस रास्ते पर फिर कभी कोई नहीं गया- यह शायद कोई लोकगीत ही आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सके.

नेपाल का लोकप्रिय लोकगीत ‘रेशम फिरिरी’ पहाड़ों पर उड़ने की इच्छा और खुले आकाश की आजादी का प्रतीक रहा है. लेकिन किसी त्रासदी के बाद जब वही धुन सुनी जाती है, तो उसके अर्थ बदल जाते हैं. उड़ने की इच्छा के सामने बहता हुआ घर और मलबे में अपनों को खोजता इंसान दिखाई देने लगता है.

पहाड़ हमें सिर्फ जानकारी नहीं, समझ भी देता है

हम आज उपग्रहों से मौसम और पहाड़ों को देखते हैं. सेंसर लगाते हैं, मॉडल बनाते हैं और खतरे का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं. इसके बावजूद हिमालय बार-बार हमें याद दिलाता है कि जानकारी और समझ एक चीज नहीं है.

सदियों से पहाड़ों में रहने वाले लोगों ने मौसम, नदी, चट्टानों और रास्तों के संकेतों को पढ़ना सीखा है. आधुनिक तकनीक के साथ इस स्थानीय अनुभव को समझना भी उतना ही जरूरी है. क्योंकि पहाड़ के साथ रहने वाला इंसान कई बार उन बदलावों को महसूस कर लेता है, जिन्हें आंकड़ों में दर्ज होने में समय लग सकता है.

आपदा के बीच इंसानियत ही सबसे बड़ा सहारा

त्रासदी के बीच इंसान के पास आखिर बचता क्या है? पैसा, तकनीक और सत्ता से पहले बचता है दूसरे इंसान का हाथ.

कोई मलबे से किसी अजनबी को बाहर निकालता है. कोई अनजान परिवार के लिए खाना बनाता है. कोई रातभर सड़क पर खड़ा होकर लोगों को सुरक्षित रास्ता दिखाता है. कोई लापता व्यक्ति की तस्वीर अपने मोबाइल में संभालकर रखता है और किसी खबर की उम्मीद करता है.

आपदा हमें सिर्फ यह नहीं बताती कि प्रकृति कितनी शक्तिशाली है. वह यह भी बताती है कि इंसान कितना अकेला हो सकता है और उसी वक्त दूसरा इंसान उसके लिए कितना बड़ा सहारा बन सकता है.

त्रासदी को सिर्फ आंकड़ों में याद न करें

नेपाल की यह आपदा आने वाले वर्षों में शायद इतिहास का हिस्सा बन जाएगी. आंकड़े बदले जाएंगे, रिपोर्टें लिखी जाएंगी और मलबे के ऊपर फिर सड़कें बनेंगी. नदी फिर बहेगी, जंगल फिर हरे होंगे और पहाड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे.

लेकिन उन परिवारों के लिए यह त्रासदी कभी खत्म नहीं होगी, जिन्होंने अपने किसी अपने को खोया है या जिसकी खबर का अब भी इंतजार कर रहे हैं.

इसलिए नेपाल की इस त्रासदी को सिर्फ तबाही की कहानी बनाकर याद नहीं किया जाना चाहिए. इसे उन लोगों की कहानी की तरह याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने अपने खोये. उन लोगों की कहानी की तरह, जिन्होंने अपनों को खोजा. और उन लोगों की कहानी की तरह, जिन्होंने किसी अजनबी का हाथ पकड़कर कहा- तुम अकेले नहीं हो.

की पूरी संवेदना इस त्रासदी में जान गंवाने वाले लोगों और आज भी किसी खबर की प्रतीक्षा कर रहे उनके परिवारों के साथ है.

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