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तीजन बाई के निधन से कोयलांचल गमगीन: बेरमो के 25 हजार मजदूरों को तीजन बाई ने किया था मंत्रमुग्ध

बेरमो से राकेश वर्मा की रिपोर्ट
Teejan Bai, बोकारो: अपनी दमदार और गरजती हुई आवाज, शानदार मंच प्रस्तुति और अनूठे अंदाज से छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी को वैश्विक पटल पर स्थापित करने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन की खबर से कोयलांचल बेरमो के लोग बेहद मर्माहत हैं. विशेष रूप से बेरमो के विभिन्न कोलियरी क्षेत्रों में रहने वाले छत्तीसगढ़, बिलासपुर, दुर्ग और चापा मूल के कोयला मजदूर तीजन बाई के अनन्य प्रशंसक रहे हैं. उनके निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताते हुए स्थानीय मजदूर नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है.
वर्ष 1980 का वो ऐतिहासिक कार्यक्रम और थम गया पूरा बेरमो
कोयलांचल के पुराने लोगों के मानस पटल पर वर्ष 1980 में बेरमो में आयोजित तीजन बाई का वह ऐतिहासिक कार्यक्रम आज भी जीवंत है. सीसीएल बीएंडके एरिया के तत्वाधान में सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत बोकारो कोलियरी अंतर्गत संडे बाजार फुटबॉल मैदान में यह आयोजन हुआ था, जिसके लिए मजदूर नेता सुजीत कुमार घोष, सामाजिक कार्यकर्ता सुबोध सिंह पवार और छत्तीसगढ़ी समाज के गुलाब सिंह सरदार खुद भिलाई जाकर तारीख तय करवाकर लाए थे. जब तीजन बाई ने हाथ में तंबूरा लेकर महाभारत की कथाओं को गीत और संगीत के जरिए अपने भावपूर्ण अंदाज में सुनाना शुरू किया, तो तारमी से लेकर पिपराडीह तक के इलाकों से उमड़े करीब 25,000 कोयला मजदूरों का हुजूम मंत्रमुग्ध हो गया था.
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गुलाब फाइल स्थित मजदूर आवास पहुंची थीं तीजन बाई
अपने बेरमो दौरे के दौरान तीजन बाई बेहद सादगी से पेश आईं और वे बोकारो कोलियरी के चार नंबर स्थित ‘गुलाब फाइल’ में मजदूर नेता गुलाब सिंह सरदार के आवास पर भी गई थीं. वहां काफी संख्या में मौजूद महिला और पुरुष कोल कटरों ने उनका पारंपरिक और भव्य स्वागत किया था. तीजन बाई ने जमीन से जुड़े इस दौरे में बेहद आत्मीयता के साथ स्थानीय छत्तीसगढ़ी भाषा में ही उन मजदूरों से बात की थी और उनके सुख-दुख को साझा किया था, जिसे लोग आज भी याद करते हैं.
जब भिलाई में अतीत का संघर्ष याद कर भावुक हुई थीं तीजन बाई
तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए वरिष्ठ मजदूर नेता सुजीत कुमार घोष और सामाजिक कार्यकर्ता सुबोध सिंह पवार ने उनके साथ जुड़ी पुरानी यादों को साझा किया. उन्होंने बताया कि जब वे कार्यक्रम का निमंत्रण देने भिलाई गए थे, तब तीजन बाई उन्हें भिलाई पावर हाउस स्टेशन के पास बने उस सेंटर पर ले गईं जिसे भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन ने ‘कला संस्कृति विकास केंद्र’ के रूप में विकसित किया था. वहां बड़े-बड़े अफसरों की बेटियां तीजन बाई से पंडवानी सीख रही थीं, जिसे देखकर तीजन बाई भावुक हो गईं और उन्होंने कहा था कि एक वक्त था जब वे रेलवे स्टेशन पर पंडवानी गाकर पेट पालती थीं तो लोग अपनी बेटियों को उनके करीब भी फटकने नहीं देते थे, और आज वही लोग कतार लगाए रहते हैं. मालूम हो कि तीजन बाई को उनकी गायकी के कारण ही भिलाई स्टील प्लांट में पहले चपरासी की नौकरी मिली थी और पद्मश्री मिलने के बाद प्रबंधन ने उन्हें उसी कला केंद्र का शीर्ष अधिकारी बना दिया था.
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