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जंगल-पहाड़ के बीच से निकलकर अब बन रहे शिक्षक, सेना के जवान और शोधार्थी

गुमला के सखुआपानी से विवेक चंद्र की रिपोर्ट
गुमला. नेतरहाट की तराई में बसे सखुआपानी गांव में जब भी बाइक की आवाज गूंजती है, बच्चे घरों से बाहर निकल आते हैं.उन्हें पता है "गणपति असुर आए हैं".
कभी सरकारी नौकरी में रहकर असुर समाज के बीच काम करने वाले गणपति असुर अब रिटायर हो चुके हैं. लेकिन उनका अपने समाज के उत्थान के लिए काम करने का जज्बा कम नहीं हुआ फर्क सिर्फ इतना है कि अब उनके हाथ में सरकारी फाइलें नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की चिंता है. खेती-बाड़ी के बीच समय निकालकर वह बाइक से गांव-गांव घूमते हैं, बच्चों को पढ़ने के लिए कहते हैं और अभिभावकों को समझाते हैं.
90 घर वाले सखुआपानी में बदलाव की झलक
नेतरहाट की तराई में बसे सखुआपानी की यह तस्वीर असुर समुदाय में आ रहे बदलाव की झलक है .करीब 90 घरों वाले इस गांव में 75 घर असुर परिवारों के हैं. कभी घनघोर गरीबी, अशिक्षा और सीमित संसाधनों के बीच जीवन गुजारने वाले इस समुदाय में आज कोई शिक्षक बना है तो कोई आदिम जनजाति सेना में जा कर देश की सेवा कर रहे हैं .
असुर समुदाय से आने वालेगणपति असुर कल्याण पदाधिकारी के पद सेवानिवृत्त हुए हैं. सेवानिवृत्ति के बाद वह शहर में बस सकते थे, पर वापस गांव आ गए. अब किसी परिवार का बच्चा स्कूल नहीं जा रहा हो तो उसे पढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं.
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अगली पीढ़ी को पढ़ा रही पहली पीढ़ी
गणपति के दोस्त रविनंदन असुर ने भी बदलाव को महसूस किया और अपनी बेटी को आगे पढ़ाई के लिए नागपुर भेजने का फैसला किया. सखुआपानी में टिपुन असुर, एतवा असुर, ज्योति असुर और भिखराम असुर शिक्षक हैं. उनके लिए स्कूल की नौकरी रोजमर्रा का काम हो सकती है, लेकिन असुर समाज की कहानी में इनकी भूमिका उससे कहीं बड़ी है. ये उस पहली पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिसने पढ़ाई के जरिए रोजगार का रास्ता बनाया.अब वही पीढ़ी अगली पीढ़ी को पढ़ा रही है.
आजादी के नए अर्थ को सामने रखती असुर समाज की कहानी
15 अगस्त को जब देश आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाएगा, तब असुर समुदाय की यह कहानी आजादी के नए अर्थ को सामने रखती है. उनके लिए आजादी अब सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अशिक्षा और गरीबी की पीढ़ीगत जकड़न से निकलने, बेटियों को दूर शहरों में पढ़ाने और बच्चों को अपनी पसंद का भविष्य चुनने की आजादी भी है. असुर समाज के लिए यह बदलाव एक दिन में नहीं आया. इसकी शुरुआत उन कुछ लोगों से हुई, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पढ़ाई की और नौकरी तक पहुंचे. गणपति असुर उनमें से एक हैं.