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इंदौर की ट्रैफिक व्यवस्था पर हाईकोर्ट सख्त:सुधार नहीं हुआ तो गृह विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से बुलाएंगे
शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने मंगलवार को सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन, यातायात पुलिस के अमले की कमी, बंद पड़े CCTV कैमरों, कम समय के ग्रीन सिग्नल, सड़कों के गड्ढों, जलभराव और खराब डिजिटल व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि यातायात व्यवस्था में जल्द सुधार नहीं हुआ तो गृह विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने के लिए कहा जा सकता है। यह याचिका राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अजय बागड़या और एडवोकेट शिरीन सिलावट उपस्थित हुए। कोर्ट ने बताया - आंखों के सामने रेड लाइट तोड़ी
सुनवाई के दौरान जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने यह सुनवाई वर्ष 2019 से लंबित जनहित याचिका में की है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने इंदौर की यातायात व्यवस्था को लेकर अपना अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि शहर में खुलेआम रेड लाइट का उल्लंघन होता दिखाई देता है, लेकिन उल्लंघन करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आती। उन्होंने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक मोटर साइकिल सवार रेड लाइट तोड़कर सड़क पार करते हुए उनकी कार के ठीक बगल में आकर खड़ा हो गया। कोर्ट ने इस अनुभव के जरिए शहर में यातायात नियमों के पालन और उनके प्रभावी प्रवर्तन की स्थिति पर सवाल उठाया। सुधार नहीं हुआ तो प्रमुख सचिव गृह को बुलाने के संकेत
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यातायात व्यवस्था की मौजूदा स्थिति को लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि ट्रैफिक पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ तो प्रमुख सचिव, गृह विभाग को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में बुलाया जा सकता है। सुनवाई में एडिशनल डीसीपी ट्रैफिक विक्रम सिंह रघुवंशी को भी विभाग की कमियों के संबंध में व्यक्तिगत रूप से स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाया गया है। कोर्ट ने यातायात विभाग से स्वीकृत पदों, वर्तमान में उपलब्ध पुलिस बल, रिक्त पदों और स्टाफ की वास्तविक कमी का विस्तृत ब्योरा मांगा। 2013 में ही 800 से ज्यादा अतिरिक्त ट्रैफिक स्टाफ की जरूरत बताई थी
सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि वर्ष 2013 के आकलन में इंदौर की यातायात व्यवस्था के लिए 800 से अधिक अतिरिक्त यातायात कर्मियों की आवश्यकता बताई गई थी। इसके बावजूद वर्तमान में भी स्वीकृत पदों का बड़ा हिस्सा खाली है। कोर्ट ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए जानना चाहा कि पर्याप्त पुलिस बल के अभाव में शहर की यातायात व्यवस्था और नियमों का प्रभावी पालन कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है। पुलिस बल कम, CCTV भी बंद... फिर ट्रैफिक निगरानी कैसे?
यातायात पुलिस के स्टाफ की कमी के बीच CCTV कैमरों से निगरानी बढ़ाने की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। लेकिन कोर्ट के सामने यह जानकारी आई कि शहर में लगे अधिकांश CCTV कैमरे फिलहाल काम नहीं कर रहे हैं। इस पर व्यवस्था को लेकर मूल सवाल खड़ा हुआ कि जब सड़क पर पर्याप्त ट्रैफिक पुलिसकर्मी नहीं हैं और निगरानी के लिए लगाए गए CCTV भी काम नहीं कर रहे हैं, तो यातायात नियमों का उल्लंघन रोकने और कार्रवाई करने का प्रभावी सिस्टम क्या है? 20-23 सेकंड की ग्रीन लाइट पर भी कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई में शहर के कुछ व्यस्त चौराहों पर ग्रीन सिग्नल की अवधि को लेकर भी सवाल उठा। कोर्ट के समक्ष बताया गया कि कुछ चौराहों पर ग्रीन सिग्नल महज 20 से 23 सेकंड का है। व्यस्त चौराहों पर इतनी कम अवधि के ग्रीन सिग्नल से वाहनों की कतार और यातायात दबाव बढ़ने की स्थिति पर कोर्ट ने चिंता जताई। गड्ढे और जलभराव भी बने ट्रैफिक के लिए चुनौती
हाईकोर्ट ने सड़कों पर मौजूद गड्ढों और बारिश के दौरान होने वाले जलभराव को भी सिर्फ नागरिक सुविधा नहीं, बल्कि यातायात और सड़क सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा माना। कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि नगर निगम के मोबाइल ऐप में ऐसी सरल व्यवस्था क्यों नहीं है, जिसमें नागरिक गड्ढे या जलभराव की तस्वीर सीधे अपलोड कर शिकायत दर्ज करा सकें और संबंधित विभाग तत्काल कार्रवाई कर सके। ट्रैफिक वेबसाइट-सर्वर की खराबी से ऑनलाइन चालान भरने में भी परेशानी
सुनवाई में यातायात विभाग की डिजिटल व्यवस्था को लेकर भी स्थिति सामने आई। बताया गया कि संबंधित वेबसाइट और सर्वर ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसके कारण कई बार नागरिक ऑनलाइन ट्रैफिक चालान तक जमा नहीं कर पा रहे हैं। यानी शहर में मैदानी अमले की कमी के साथ डिजिटल निगरानी और ऑनलाइन सेवाओं की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। नगर निगम ने सुनवाई की सुबह ही जवाब दाखिल किया सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि इंदौर नगर निगम ने अपना जवाब सुनवाई की सुबह ही दाखिल किया। इसके चलते कोर्ट के पास जवाब को विस्तार से पढ़ने और उसका परीक्षण करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। 2019 से हाईकोर्ट की निगरानी, फिर भी समस्या जस की तस इंदौर की यातायात व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट वर्ष 2019 से लगातार निर्देश देता आ रहा है। इसके बावजूद मंगलवार की सुनवाई में एक बार फिर लगभग वही बुनियादी समस्याएं सामने आईं। 14 अक्टूबर 2019 : कोर्ट ने ट्रैफिक सिग्नल 24 घंटे चालू रखने और व्यस्त समय में प्रमुख चौराहों पर यातायात पुलिसकर्मियों की तैनाती के निर्देश दिए थे। 7 मई 2026: यातायात पुलिस में स्टाफ की कमी, सिग्नलों के ऑटोमेशन और अंतरिम व्यवस्था के लिए स्वयंसेवकों की मदद लेने के मुद्दे पर कोर्ट ने निर्देश दिए। 19 जून 2026 : कोर्ट ने तत्काल यातायात व्यवस्था सुधारने के कदम उठाने और जरूरत पड़ने पर स्काउट्स एवं NCC कैडेट्स की मदद लेने की बात कही थी। नगर निगम को 36 ऑटोमेटेड ट्रैफिक सिग्नल चालू करने के लिए भी त्वरित कदम उठाने को कहा गया था। 18 अगस्त 2026 : स्टाफ की कमी, कमजोर प्रवर्तन, बंद CCTV, सिग्नल की अवधि, गड्ढे, जलभराव और डिजिटल सिस्टम की खामियां फिर कोर्ट के सामने आईं। अब सवाल सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, जवाबदेही का भी वर्षों से जारी न्यायिक निगरानी के बावजूद यातायात व्यवस्था की वही समस्याएं दोबारा सामने आने पर अब कोर्ट का फोकस जवाबदेही और निर्देशों के क्रियान्वयन पर दिखाई दिया। कोर्ट के सख्त रुख का संकेत साफ है यदि अगली बार भी जमीनी स्तर पर सुधार नजर नहीं आया तो जिम्मेदार अधिकारियों को खुद कोर्ट के सामने जवाब देना पड़ सकता है।