Tuesday, 14 July 2026
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केन-बेतवा विस्थापितों का आंदोलन तेज:11वें दिन शुरू हुआ 'सूली आंदोलन';अनशनकारियों की बिगड़ी तबीयत

INT News14 July 2026 at 08:55 am

छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित विभिन्न विकास परियोजनाओं से प्रभावित विस्थापितों का आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। जय किसान संगठन के बैनर तले चल रहे 'चिता आंदोलन' के 11वें दिन प्रदर्शनकारियों ने विरोध का नया तरीका अपनाते हुए 'सूली आंदोलन' शुरू कर दिया। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर का आमरण अनशन आठवें दिन में पहुंच गया है, जबकि पांच दिन से अनशन पर बैठी पूना आदिवासी की तबीयत भी बिगड़ गई है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन उनकी मांगों की अनदेखी कर रहा है। 11वें दिन आंदोलन ने लिया नया रूप विस्थापित ग्रामीणों का आंदोलन लगातार नए चरण में प्रवेश कर रहा है। पहले चिता बनाकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया गया और अब आंदोलनकारियों ने गले में फांसी का फंदा डालकर तथा सूली पर लटककर विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि यह प्रतीकात्मक प्रदर्शन सरकार और प्रशासन को यह बताने के लिए है कि विस्थापन के कारण उनका जीवन, आजीविका और भविष्य संकट में पड़ गया है। अमित भटनागर का आमरण अनशन आठवें दिन जय किसान संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर परियोजना प्रभावितों को न्याय दिलाने और कथित भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे हैं। सोमवार को उनका अनशन आठवें दिन में प्रवेश कर गया। लगातार भूख हड़ताल के कारण उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही है। इसके बावजूद उन्होंने अनशन समाप्त करने से इनकार कर दिया है। पूना आदिवासी की तबीयत भी बिगड़ी आंदोलन में शामिल पूना आदिवासी पिछले पांच दिनों से अनशन पर हैं। सोमवार को उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद प्रशासन ने मौके पर डॉक्टर या मेडिकल टीम की कोई व्यवस्था नहीं की। उनका कहना है कि प्रशासन एक ओर सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रहा है, जबकि धरातल पर ऐसी कोई व्यवस्था नजर नहीं आ रही। पुनर्वास और मुआवजे पर उठाए गंभीर सवाल प्रदर्शनकारियों का कहना है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य विकास कार्यों के कारण उनकी कृषि भूमि और आजीविका प्रभावित हुई है, लेकिन पुनर्वास और मुआवजा प्रक्रिया में कई अनियमितताएं हैं। उनका आरोप है कि कई पात्र परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिला, जबकि पुनर्वास स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव है। उनका कहना है कि सरकार के दावे और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है। वर्षों से सुनवाई नहीं होने का आरोप विस्थापित ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी समस्याओं को लेकर शासन-प्रशासन के समक्ष गुहार लगा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला। खेती की जमीन छिनने के बाद कई परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। क्या हैं आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें? आंदोलनकारियों की मांग है कि सभी प्रभावित परिवारों को नियमों के अनुसार उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए। परियोजना से जुड़े मामलों में यदि किसी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही, विस्थापित परिवारों के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं की भी स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार आंदोलन लगातार 11वें दिन में पहुंच चुका है, लेकिन अब तक प्रशासन की ओर से किसी ठोस समाधान की घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मांगें पूरी होने तक उनका आंदोलन और आमरण अनशन जारी रहेगा।