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दुर्गापूजा में साड़ी-पगड़ी पहनकर क्यों निकलते हैं संताल पुरुष? कोल्हान के गांवों में आज भी जिंदा है ये परंपरा

घाटशिला (जमशेदपुर). कोल्हान के गांवों में दुर्गा पूजा केवल पूजा-पंडालों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है. पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां के कई गांवों में षष्ठी से विजयादशमी तक संताल समाज की पारंपरिक दसई नृत्य मंडलियां भी निकलती हैं. साड़ी-धोती और पगड़ी में सजे कलाकार सिर पर मोर पंख लगाकर और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ गांव-गांव पहुंचते हैं.
दसई नृत्य को कई लोग दुर्गा पूजा या महिषासुर वध से जोड़ते हैं, लेकिन संताल समाज के जानकार इसे अपने ऐतिहासिक संघर्ष, क्रांति और इष्ट देवताओं की तलाश से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा बताते हैं. इसे भुआंग नाच के नाम से भी जाना जाता है.
साड़ी और सिर पर मोर पंख से बदलते हैं वेश
संताल समाज के बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार, दसई नृत्य की परंपरा एक ऐतिहासिक संघर्ष की स्मृति से जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, हुदुड़ दुर्गा के मारे जाने और उनकी बहनों आयनोम और काजोल के अपहरण के बाद संताल समाज के लोग अपनी पहचान छिपाकर उनकी तलाश में निकले थे. किंवदंती के अनुसार, पुरुषों ने साड़ी पहनकर, सिर पर मोर पंख लगाकर अपना वेश बदला था. भुआंग के भीतर तीर-धनुष छिपाकर वे बहनों और अन्य क्रांतिकारियों की तलाश में निकले थे. इसी परंपरा की स्मृति में आज भी दसई नृत्य में कलाकार वेश बदलकर प्रस्तुति देते हैं.
'हाय रे हाय रे' से शुरुआत, 'देहेल-देहेल' पर समापन
हेदलजुड़ी पंचायत निवासी और संताल समाज के जानकार दुलाल चंद्र हांसदा बताते हैं कि दसई नृत्य की शुरुआत 'हाय रे हाय रे...' से होती है. इसे क्रांतिकारियों के बंदी बनाये जाने के दुख का प्रतीक माना जाता है. नृत्य का समापन 'देहेल-देहेल' शब्द से होता है, जिसे आक्रमणकारियों पर विजय के संकल्प से जोड़ा जाता है. उनके अनुसार, संताली कैलेंडर में दसई कार्तिक मास का नाम है. इसी अवधि में यह नृत्य होने के कारण कई लोग इसे दुर्गा पूजा से जोड़ देते हैं, जबकि संताली समाज इसे अपनी अलग सांस्कृतिक परंपरा मानता है.
भुआंग, ढोल, थाली और घंटी से बनता है माहौल
दसई नृत्य में कलाकार पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं. पुरुष साड़ी-धोती और पगड़ी के साथ हाथों में मोर पंख लेकर नृत्य करते हैं. नृत्य में भुआंग मुख्य वाद्य यंत्र माना जाता है. इसके अलावा ढोल, थाली और घंटी का भी इस्तेमाल किया जाता है. परंपरा से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, नृत्य दल के साथ पहाड़ पर पूजा की जाती है. कुछ स्थानों पर मुर्गा और कबूतर की बलि देने तथा सिद्ध गुरु की अगुवाई में घर-घर जाकर झाड़-फूंक और टोटका करने की परंपरा भी बतायी जाती है.
पुरुषों के निकलने पर महिलाएं उतार देती हैं चूड़ी
दसई नृत्य से जुड़ी एक और परंपरा चूड़ी उतारने की है. मान्यता के अनुसार, जब दसई दल के पुरुष घर से निकलते हैं, तो परिवार की महिलाएं अपने हाथों की चूड़ियां उतार देती हैं. दल के सकुशल वापस लौटने के बाद महिलाएं दोबारा चूड़ी पहनती हैं. यह परंपरा नृत्य से जुड़े लोगों के लिए भावनात्मक महत्व रखती है.
नयी पीढ़ी से दूर होती परंपरा
संताल समाज के बुजुर्गों और लोक कलाकारों की चिंता अब इस बात को लेकर है कि नयी पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक संस्कृति से दूर होती जा रही है. उनका कहना है कि युवाओं की भागीदारी कम होने से दसई नृत्य जैसी पुरानी परंपराओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है.
कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट
बाघुड़िया पंचायत के चाड़री गांव के लोक कलाकार सीतानाथ टुडू, योगेन मुर्मू, नगेन मुर्मू, चांदूराम मुर्मू और मधु मुर्मू ने बताया कि दसई नृत्य धीरे-धीरे सीमित होता जा रहा है. दुर्गा पूजा के इन पांच दिनों के अलावा सालभर नृत्य मंडलियों को नियमित काम नहीं मिलता. ऐसे में कलाकारों को बाकी समय मजदूरी कर परिवार चलाना पड़ता है.
घाटशिला, डुमरिया, गुड़ाबांदा, मुसाबनी और चाकुलिया प्रखंड के अलावा हेदलजुड़ी, धोडांगा, कालाझोर और ठाकुरबाड़ी समेत कई गांवों में आज भी दसई नृत्य मंडलियां सक्रिय हैं. कलाकारों और बुजुर्गों का कहना है कि इस सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए नयी पीढ़ी को इससे जोड़ना जरूरी है.