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कैलाश यात्रा के लिए यात्री क्यों करते हैं नेपाल रूट का उपयोग? जानिए भारत से कितना अलग है यह रास्ता

नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने बड़ी तबाही मचाई है. इस आपदा का असर कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ा है. यह इलाका नेपाल से तिब्बत होते हुए कैलाश मानसरोवर जाने वाला प्रमुख रास्ता है.
लेकिन सवाल ये है कि जब कैलाश यात्रा भारत से होकर जाती है और इसके लिए दो-दो रास्ते अधिकृत हैं तो नेपाल का यह इलाका कैलाश यात्रा के लिए इतना अहम क्यों है और भारत से जाने वाली यात्रा से कितनी अलग है?
नेपाल होकर कैलाश जाने वाला रूट अहम क्यों है?
कैलाश जाने के लिए मुख्य तौर पर तीन रास्तों का उपयोग किया जाता है. इसमें उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा, सिक्किम का नाथुला दर्रा और नेपाल के रास्ते भी यात्री कैलाश जाते हैं.
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे के रास्ते कैलाश यात्रा आयोजित की जाती है. गौर करने वाली बात है कि इन दोनों मार्गों पर निजी एजेंसियां कैलाश यात्रा संचालित नहीं करतीं.
जानकारी के लिए बता दें कि भारत सरकार की ओर से आयोजित आधिकारिक कैलाश मानसरोवर यात्रा नेपाल के रास्ते नहीं होती है.
लेकिन लिपुलेख दर्रा और नाथुला दर्रे के अलावा नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने का विकल्प भी मौजूद है, जिसे निजी टूर ऑपरेटर संचालित करते हैं.
इसमें यात्री आम तौर पर काठमांडू पहुंचते हैं और वहां से सड़क या हेलीकॉप्टर के जरिए तिब्बत की ओर जाते हैं.
सड़क वाला प्रमुख रास्ता काठमांडू से रसुवा होते हुए रसुवागढ़ी सीमा चौकी तक जाता है. इसके बाद चीन के तिब्बत क्षेत्र में जिरोंग होते हुए यात्रा कैलाश की तरफ आगे बढ़ती है.
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कैलाश यात्रा के लिए रसुवागढ़ी इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
रसुवागढ़ी नेपाल और चीन के बीच एक अहम सीमा क्षेत्र है. कैलाश मानसरोवर जाने वाले विदेशी यात्रियों के लिए यह रास्ता काफी लोकप्रिय है.
नेपाल के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में 13,523 यात्री रसुवागढ़ी सीमा से कैलाश मानसरोवर की ओर गए. यह संख्या पिछले वित्त वर्ष के 11,387 यात्रियों से करीब 19 फीसदी ज्यादा है.
यानी यह सिर्फ स्थानीय आवाजाही का रास्ता नहीं, बल्कि धार्मिक पर्यटन और सीमा-पार यात्रा का महत्वपूर्ण गलियारा है.
नेपाल से कैलाश यात्रा का रूट क्या है?
नेपाल वाला सड़क मार्ग आम तौर पर काठमांडू से शुरू होता है. यात्री सड़क के जरिए रसुवा और रसुवागढ़ी पहुंचते हैं. सीमा पार करने के बाद तिब्बत में जिरोंग से होते हुए दारचेन तक यात्रा जारी रहती है. इसके बाद कैलाश पर्वत की परिक्रमा का पैदल हिस्सा शुरू होता है.
दूसरा रास्ता नेपालगंज और सिमिकोट-हिल्सा वाला हेलीकॉप्टर मार्ग है. इसमें काठमांडू से नेपालगंज, फिर छोटे विमान से सिमिकोट और उसके बाद हेलीकॉप्टर से हिल्सा पहुंचा जाता है. वहां से तिब्बत में आगे सड़क मार्ग से यात्रा होती है.
इन रास्तों के लिए सामान्य भारतीय पासपोर्ट के अलावा चीन का ग्रुप वीजा और तिब्बत ट्रैवल परमिट जैसे दस्तावेज जरूरी होते हैं, इसलिए भी यह यात्रियों में ज्यादा लोकप्रिय है.
भारत सरकार की कैलाश यात्रा नेपाल वाले रास्ते से कैसे अलग है?
विदेश मंत्रालय की आधिकारिक यात्रा सिर्फ भारतीय नागरिकों के लिए है.
आवेदक के पास वैध भारतीय पासपोर्ट होना चाहिए और उम्र 1 जनवरी को 18 से 70 साल के बीच होनी चाहिए.
इसके अलावा शारीरिक और चिकित्सकीय रूप से फिट होना जरूरी है.
चयन सीधे पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर नहीं होता. आवेदन के बाद कंप्यूटरीकृत ड्रॉ के जरिए यात्रियों का चयन और रूट-बैच का आवंटन किया जाता है. चयनित यात्रियों को दिल्ली में मेडिकल जांच से गुजरना पड़ता है.
भारत सरकार द्वारा आयोजित आधिकारिक यात्रा के लिए विदेशी नागरिक और ओसीआई कार्डधारक इस सरकारी यात्रा के लिए पात्र नहीं हैं.
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नेपाल वाले रास्ते का उपयोग कौन करते हैं?
आसान भाषा में कहें तो भारत सरकार द्वारा आयोजित आधिकारिक यात्रा में सभी नागरिकों को मौका नहीं मिलता है.
इसलिए कई भारतीय नागरिक और विदेशी नागरिक नेपाल वाले रास्ते का उपयोग करते हैं.
इसके साथ ही इस रास्ते में निजी टूर ऑपरेटरों को भी यात्रा करवाने की छूट रहती है, तो यात्री इसका उपयोग करते हैं.
नेपाल वाला रास्ता सरकारी कैलाश मानसरोवर यात्रा से अलग है. निजी टूर ऑपरेटरों के जरिए भारतीय और दूसरे देशों के यात्री नेपाल से तिब्बत जा सकते हैं.
क्यों खास है कैलाश मानसरोवर यात्रा
करीब 6,600 मीटर ऊंचा कैलाश पर्वत हिंदू धर्म में भगवान शिव से जुड़ा माना जाता है. बौद्ध और जैन परंपराओं में भी इसका विशेष धार्मिक महत्व है. कैलाश के पास स्थित मानसरोवर झील भी श्रद्धालुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
यही धार्मिक महत्व हर साल बड़ी संख्या में यात्रियों को इस दुर्गम हिमालयी क्षेत्र तक खींच लाता है.