Friday, 7 August 2026
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National Handloom Day 2026: आधुनिकता के धागों से संवर रही बिहार की हथकरघा विरासत, हजारों बुनकरों को मिल रहा रोजगार

INT News7 August 2026 at 10:32 am

National Handloom Day 2026: बदलती जीवनशैली और फैशन के दौर में बिहार की पारंपरिक हथकरघा कला अपनी पहचान बचाने के साथ-साथ नए स्वरूप में भी उभर रही है. राज्य सरकार की योजनाओं, वित्तीय सहायता और आधुनिक तकनीक के समन्वय से हथकरघा उद्योग को नई गति मिल रही है. गया का पटवा टोली, भागलपुर का सिल्क और मधुबनी की हस्तकला आज हजारों परिवारों की आजीविका का आधार बन चुके हैं. वहीं बिहार की युवा पीढ़ी, मॉडल और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर भी पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को अपनाकर इसे नई पहचान दिला रहे हैं.

भागलपुरी सिल्क और बावन बूटी की बढ़ी मांग

राजधानी पटना समेत पूरे बिहार में पारंपरिक वस्त्रों की मांग लगातार बढ़ रही है. 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के बाद स्थानीय बुनकरों के उत्पादों को नया बाजार मिला है. बिहार म्यूजियम की स्मारिका दुकान पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. यहां नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी खादी साड़ियां, भागलपुरी सिल्क और खादी कॉटन के वस्त्रों की अच्छी बिक्री हो रही है.

कैदियों के हस्तनिर्मित उत्पाद भी बन रहे आकर्षण

बिहार म्यूजियम की स्मारिका दुकान में राज्य के विभिन्न कारागारों में बंद कैदियों द्वारा तैयार हस्तनिर्मित उत्पाद भी बेचे जा रहे हैं. इससे उन्हें सम्मानजनक आजीविका और हुनर को पहचान मिल रही है. इन उत्पादों की कीमत 700 रुपये से लेकर 7000 रुपये तक है.

भागलपुर में 5.28 करोड़ रुपये का मेगा हथकरघा क्लस्टर

भागलपुर में 5.28 करोड़ रुपये की लागत से मेगा हथकरघा क्लस्टर विकसित किया गया है. यहां आधुनिक डाई हाउस, डिजाइन स्टूडियो, उत्पाद विकास केंद्र और 10 ब्लॉक स्तरीय क्लस्टर स्थापित किए गए हैं. इससे बुनकरों को आधुनिक तकनीक और बेहतर उत्पादन सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं.

डिजिटल प्लेटफॉर्म से बढ़ा बाजार

बुनकरों को राष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए इंडिया हैंडमेड पोर्टल और जेम (GeM) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए गए हैं. वहीं बुनकर मुद्रा योजना के तहत वर्ष 2023-24 में 32 बुनकरों को 23.90 लाख रुपये तथा वर्ष 2025-26 में सात बुनकरों को 8.50 लाख रुपये का ऋण दिया गया.

मधुबनी में 400 करोड़ रुपये की टेक्सटाइल-लेदर फैक्ट्री

मधुबनी के पंडौल में 400 करोड़ रुपये की लागत से टेक्सटाइल एवं लेदर फैक्ट्री की शुरुआत की गई है. इससे करीब 12 हजार लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है. चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना के अनुसार बिहार में 7,216 हथकरघा बुनकर और 5,631 संबद्ध कर्मचारी हैं. यानी कुल 12,847 लोग इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.

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गया का पटवा टोली बना वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र

गया का पटवा टोली बिहार के वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र है, जिसे 'बिहार का मैनचेस्टर' कहा जाता है. यहां लगभग 11 हजार पावरलूम, एक हजार औद्योगिक इकाइयां और सैकड़ों हैंडलूम संचालित हैं. यहां गमछा, बेडशीट, धोती, पीतांबरी और गद्दे के खोल का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. यहां निर्मित वस्त्र पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और दक्षिण-पूर्वी राज्यों तक भेजे जाते हैं. इस क्षेत्र से 35 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला है.

हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने वाली प्रमुख योजनाएं

बुनकर मुद्रा योजना: रियायती दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिससे बुनकर कच्चा माल और उपकरण खरीद सकें.

राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम: प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, शेड निर्माण और क्लस्टर विकास में सहायता दी जाती है.

हाथकरघा संवर्धन सहायता योजना: आधुनिक करघे और उपकरण खरीदने पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है.

कच्चा माल सहायता योजना: बुनकरों को रियायती दर पर गुणवत्तापूर्ण धागा उपलब्ध कराया जाता है.

डिजिटल मार्केटिंग प्लेटफॉर्म: जेम, इंडिया हैंडमेड पोर्टल और राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय मेलों के माध्यम से उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है.

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