Friday, 7 August 2026
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अतीक के बेटे अबान की आखिरी विदाई अधूरी, जेल में बंद अली-उमर नहीं कर पाएंगे दीदार

INT News7 August 2026 at 11:47 am

UP News: झांसी सड़क हादसे में अबान अहमद की मौत के बाद अली और उमर ने अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत/पैरोल मांगी थी, लेकिन अदालत ने वैधानिक प्रावधान न होने का हवाला देते हुए अर्जी खारिज कर दी.

झांसी सड़क हादसे में गई अबान की जान

उत्तर प्रदेश के झांसी में सड़क हादसे में माफिया अतीक अहमद के सबसे छोटे बेटे अबान अहमद की मौत के बाद परिवार एक और बड़े सदमे से गुजर रहा है. अबान के जनाजे को लेकर उम्मीद जताई जा रही थी कि अतीक के जीवित तीनों बेटे एक साथ नजर आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकेगा. जेल में बंद अली और उमर अपने छोटे भाई के आखिरी दीदार से भी वंचित रह जाएंगे.

भाई से मिलने जा रहा था अबान

जानकारी के मुताबिक, अबान अहमद झांसी जेल में बंद अपने बड़े भाई अली अहमद से मिलने जा रहा था. बताया जा रहा है कि वह अली के लिए दो उपन्यास भी लेकर निकला था. इसी दौरान सड़क हादसे में उसकी मौत हो गई. हादसे की सूचना मिलने पर जेल में बंद अली अहमद भावुक हो गया. बताया जाता है कि पिछले 10 महीनों में अबान अपने भाई अली से 49 बार मुलाकात कर चुका था.

पुश्तैनी कब्रिस्तान में होगा सुपुर्द-ए-खाक

पोस्टमार्टम के बाद अबान अहमद को प्रयागराज के कसारी मसारी स्थित पुश्तैनी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा. यहीं उसके पिता अतीक अहमद, चाचा अशरफ और बड़े भाई असद अहमद की कब्रें भी मौजूद हैं. परिवार को उम्मीद थी कि इस मौके पर जेल में बंद अली और उमर को अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति मिल सकती है.

कोर्ट ने खारिज की अंतरिम जमानत की अर्जी

अली अहमद और उमर ने अपने छोटे भाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अदालत में अंतरिम जमानत अथवा पैरोल की अर्जी दाखिल की थी. हालांकि, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रजनीश मिश्रा ने दोनों की याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि विचारण न्यायालय के पास इस प्रकार की अंतरिम जमानत या पैरोल देने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है. साथ ही, दोनों को सक्षम प्राधिकारी या सक्षम न्यायालय के समक्ष नियमानुसार आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई.

याचिका में क्या कहा गया था?

अर्जी में कहा गया था कि छोटे भाई अबान की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है और उसके अंतिम संस्कार में शामिल होना उनका पारिवारिक, मानवीय और धार्मिक दायित्व है. यह भी दलील दी गई कि इस्लाम में सुपुर्द-ए-खाक के समय परिवार की मौजूदगी का विशेष महत्व है और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में ऐसे पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन भी शामिल है.

अभियोजन ने किया विरोध

सरकारी पक्ष ने अदालत में दलील दी कि विचाराधीन बंदियों को अंतरिम जमानत या पैरोल देने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान नहीं है. इसी आधार पर अदालत ने दोनों की अर्जी स्वीकार करने से इनकार कर दिया. ऐसे में अली और उमर अपने छोटे भाई अबान को आखिरी विदाई भी नहीं दे पाएंगे.

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